माण्डूक्यकारिका

विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ है । इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है ।1।. . . .

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योगसूत्र

अब योग विषयक अनुशासन ।1। चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है ।2। उस समय द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति होती है ।3। . . . .

भगवद् गीता

धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1॥ . . . .

अष्टावक्र गीता

जनक ने कहा - ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ? मुक्ति कैसे होती है ? और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है ? प्रभु ! यह मुझसे कहिये ।1। . . . .

साँख्यकारिका

तीन प्रकार के दुःखों के आघात से ही उनके निवारण के हेतु जिज्ञासा उत्पन्न होती है । लौकिक उपाय होने के कारण वह जिज्ञासा व्यर्थ है, ऐसा नहीं है, क्योंकि उनमें दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं है ।1। . . . .

श्वेताश्वतर उपनिषद

ब्रह्मवादी कहते हैं - जगत का कारण ब्रह्म कौन है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं । किसके द्वारा जीवित हैं ? कहाँ स्थित हैं ? हे ब्रह्मविद ! किसके अधीन रहकर सुख-दुःख में व्यवस्था का अनुवर्तन करते हैं ?॥१॥. . . .

केन उपनिषद (संस्कृत)

केन इषितम् पतति प्रेषितम् मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केन इषिताम् वाचम् इमाम् वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ . . . .