माण्डूक्य उपनिषद (संस्कृत)

ॐ इति एतदक्षरमिदँ सर्वं तस्योपव्याख्यानं भूतं भवद् भविष्यदिति सर्वमोङ्कार एव यच्चान्यत् त्रिकालातीतं तदप्योङ्कार एव  ॥१॥ सर्वं ह्येतद् ब्रह्मायमात्मा ब्रह्म सोऽयमात्मा चतुष्पात् ॥२॥ जागरितस्थानो बहिष्प्रज्ञः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः स्थूलभुग्वैश्वानरः प्रथमः पादः ॥३॥ स्वप्नस्थानोऽन्तः प्रज्ञाः सप्ताङ्ग एकोनविंशतिमुखः प्रविविक्तभुक्तैजसो द्वितीयः पादः ॥४॥ यत्र सुप्तो न कञ्चन कामं कामयते न कञ्चन स्वप्नं पश्यति तत् सुषुप्तम् । सुषुप्तस्थान एकीभूतः प्रज्ञानघन एवानन्दमयो ह्यानन्दभुक् चेतो… Continue reading माण्डूक्य उपनिषद (संस्कृत)

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माण्डूक्यकारिका

आगम प्रकरण विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ है । इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है ।1। दक्षिणनेत्ररूप द्वार में विश्व रहता है, तैजस मन के भीतर रहता है, प्राज्ञ हृदयाकाश में उपलब्ध होता है । इस प्रकार वह शरीर में तीन प्रकार से स्थित है… Continue reading माण्डूक्यकारिका

योगसूत्र

समाधि पाद अब योग विषयक अनुशासन ।1। चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है ।2। उस समय द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति होती है ।3। अन्य समय में स्वरूप वृत्ति के ही सदृश होता है ।4। क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूप से वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं ।5। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति… Continue reading योगसूत्र

भगवद् गीता

प्रथम अध्याय धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1॥ संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा॥2॥ हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों… Continue reading भगवद् गीता

अष्टावक्र गीता

पहला प्रकरण जनक ने कहा - ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ? मुक्ति कैसे होती है ? और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है ? प्रभु ! यह मुझसे कहिये ।1। अष्टावक्र ने कहा - मुक्ति चाहता है तो विषयों को विष के समान छोड़ दे और क्षमा, दया, सरलता, सन्तोष और सत्य को अमृत के… Continue reading अष्टावक्र गीता

साँख्यकारिका

तीन प्रकार के दुःखों के आघात से ही उनके निवारण के हेतु जिज्ञासा उत्पन्न होती है । लौकिक उपाय होने के कारण वह जिज्ञासा व्यर्थ है, ऐसा नहीं है, क्योंकि उनमें दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं है ।1। लौकिक उपाय की तरह वेदोक्त उपाय भी अविशुद्ध, क्षरणशील और अतिशययुक्त हैं । इसके विपरीत व्यक्त-अव्यक्त और… Continue reading साँख्यकारिका

श्वेताश्वतर उपनिषद

प्रथम अध्याय ॐ ब्रह्मवादी कहते हैं - जगत का कारण ब्रह्म कौन है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं । किसके द्वारा जीवित हैं ? कहाँ स्थित हैं ? हे ब्रह्मविद ! किसके अधीन रहकर सुख-दुःख में व्यवस्था का अनुवर्तन करते हैं ?॥१॥ काल, स्वभाव, नियति, आकस्मिक घटना, भूत और पुरुष कारण हैं, इस पर… Continue reading श्वेताश्वतर उपनिषद