अष्टावक्र गीता

पहला प्रकरण जनक ने कहा - ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ? मुक्ति कैसे होती है ? और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है ? प्रभु ! यह मुझसे कहिये ।1। अष्टावक्र ने कहा - मुक्ति चाहता है तो विषयों को विष के समान छोड़ दे और क्षमा, दया, सरलता, सन्तोष और सत्य को अमृत के… Continue reading अष्टावक्र गीता

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साँख्यकारिका

तीन प्रकार के दुःखों के आघात से ही उनके निवारण के हेतु जिज्ञासा उत्पन्न होती है । लौकिक उपाय होने के कारण वह जिज्ञासा व्यर्थ है, ऐसा नहीं है, क्योंकि उनमें दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं है ।1। लौकिक उपाय की तरह वेदोक्त उपाय भी अविशुद्ध, क्षरणशील और अतिशययुक्त हैं । इसके विपरीत व्यक्त-अव्यक्त और… Continue reading साँख्यकारिका

केन उपनिषद (संस्कृत)

प्रथम खण्ड ॐ केन इषितम् पतति प्रेषितम् मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केन इषिताम् वाचम् इमाम् वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यत् वाचः ह वाचम् स उ प्राणस्य प्राणः । चक्षुषः चक्षुः अतिमुच्य धीराः प्रेत्य अस्मात् लोकात् अमृताः भवन्ति ॥२॥ न तत्र चक्षुः गच्छति न वाक्… Continue reading केन उपनिषद (संस्कृत)

ईशावास्य उपनिषद (संस्कृत)

ॐ ईशा वास्यम् इदं सर्वम यत्किञ्च जगत्यां जगत । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम् ।।१।। कुर्वन् एव इह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः । एवं त्वयि न अन्यथा इतः अस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।। असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा आवृताः । ताँस्ते प्रेत्य अभिगच्छन्ति ये के च आत्म हनः जनाः ।।३।। अनेजत्… Continue reading ईशावास्य उपनिषद (संस्कृत)