समयसार

ध्रुव, अचल और अनुपम गति को प्राप्त हुए सर्व सिद्धों का वंदन करके अहो ! श्रुतकेवलियों के द्वारा कथित यह समयसार नामक प्राभृत कहूँगा ।1। जो जीव दर्शन, ज्ञान, चारित्र में स्थित हो रहा है उसे निश्चय से स्वसमय जानो और जो पुदगलकर्म के प्रदेशों में स्थित है उसे परसमय जानो ।2। एकत्वनिश्चय को प्राप्त… Continue reading समयसार

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तत्त्वार्थसूत्र

प्रथम अध्याय सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञान और सम्यक्-चारित्र- ये मोक्ष का मार्ग है ।1। तत्त्व के स्वरूप सहित अर्थ की श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन है ।2। वह स्वभाव से अथवा दूसरे के उपदेशादि से उत्पन्न होता है ।3। जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष- ये सात तत्त्व हैं ।4। नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव से उनका… Continue reading तत्त्वार्थसूत्र