ईशावास्य उपनिषद (संस्कृत)

ॐ ईशा वास्यम् इदं सर्वम यत्किञ्च जगत्यां जगत । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम् ।।१।। कुर्वन् एव इह कर्माणि जिजीविषेच्छतँ समाः । एवं त्वयि न अन्यथा इतः अस्ति न कर्म लिप्यते नरे ।।२।। असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा आवृताः । ताँस्ते प्रेत्य अभिगच्छन्ति ये के च आत्म हनः जनाः ।।३।। अनेजत्… Continue reading ईशावास्य उपनिषद (संस्कृत)

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ईशावास्य उपनिषद

ॐ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जो भी ये जगत हैं, सब ईशा द्वारा ही व्याप्त है । उसके द्वारा त्यागरूप जो भी तुम्हारे लिए प्रदान किया गया है उसे अनासक्त रूप से भोगो । किसी के भी धन की इच्छा मत करो ॥१॥ इस लोक में करने योग्य कर्मों को करते हुए ही सौ वर्ष जीने… Continue reading ईशावास्य उपनिषद