साँख्यकारिका

तीन प्रकार के दुःखों के आघात से ही उनके निवारण के हेतु जिज्ञासा उत्पन्न होती है । लौकिक उपाय होने के कारण वह जिज्ञासा व्यर्थ है, ऐसा नहीं है, क्योंकि उनमें दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं है ।1। . . . .

श्वेताश्वतर उपनिषद्

ब्रह्मवादी कहते हैं - जगत का कारण ब्रह्म कौन है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं । किसके द्वारा जीवित हैं ? कहाँ स्थित हैं ? हे ब्रह्मविद ! किसके अधीन रहकर सुख-दुःख में व्यवस्था का अनुवर्तन करते हैं ?॥१॥. . . .

धम्मपद

सारे कार्यों का प्रारम्भ मन से होता है । मन श्रेष्ठ है । सारे कार्य मनोमय हैं । मनुष्य यदि दुष्ट मन से बोलता या कार्य करता है तो दुःख उसका पीछा करता है, जिस प्रकार पहिया बैल के पैर का पीछा करता है ।1। . . . .