कौषीतकि उपनिषद

प्रथम अध्याय गर्ग के प्रपौत्र सुप्रसिद्ध महात्मा चित्र यज्ञ करनेवाले थे। इसके लिये उन्होंने अरुण के पुत्र उद्दालक को प्रधान ऋत्विक् के रूप में वरण किया । परतु उन प्रसिद्ध उद्दालक मुनि ने स्वयं न पधारकर अपने पुत्र श्वेतकेतु को भेजा और कहा- 'वत्स ! तुम जाकर चित्रका यज्ञ कराओ । श्वेतकेतु यज्ञ में पधारकर… Continue reading कौषीतकि उपनिषद

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मैत्रायणी उपनिषद

प्रथम प्रपाठक बृहद्रथ नामक राजा को अपने शरीर की नश्वरता का विवेक जाग्रत् होने पर अतितीव्र वैराग्य उत्पन्न हो गया। इस कारण वह अपने ज्येष्ठ पुत्र को राज्य देकर वन में चला गया। वहाँ जाकर उस (राजा) ने लम्बे समय तक कठोर तप किया। वह प्रतिदिन सूर्य की ओर देखते हुए अपने दोनों हाथ ऊपर… Continue reading मैत्रायणी उपनिषद

विवेक चूड़ामणि

जो अज्ञेय होकर भी सम्पूर्ण वेदान्त के सिद्धान्त-वाक्यों से जाने जाते हैं, उन परमानन्दस्वरूप सद्गुरुदेव श्रीगोविन्दको मैं प्रणाम करता हूँ॥१॥ जीवको प्रथम तो नरजन्म ही दुर्लभ है, उससे भी पुरुषत्व और उससे भी ब्राह्मणत्वका मिलना कठिन है; ब्राह्मण होनेसे भी वैदिक धर्मका अनुगामी होना और उससे भी विद्वत्ताका होना कठिन है। [यह सब कुछ होनेपर… Continue reading विवेक चूड़ामणि

बृहदारण्यक उपनिषद

प्रथम अध्याय प्रथम ब्राह्मण ॐ उषा यज्ञसम्बन्धी अश्व का सिर है, सूर्य नेत्र है, वायु प्राण है, वैश्वानर अग्नि खुला हुआ मुख है और संवत्सर यज्ञीय अश्व का आत्मा है । द्युलोक उसका पीठ है, अन्तरिक्ष उदर है, पृथ्वी पैर रखने का स्थान है, दिशाएँ पार्श्वभाग हैं, अवान्तर दिशाएँ पसलियाँ हैं, ऋतुएँ अंग हैं, मास… Continue reading बृहदारण्यक उपनिषद

समयसार

ध्रुव, अचल और अनुपम गति को प्राप्त हुए सर्व सिद्धों का वंदन करके अहो ! श्रुतकेवलियों के द्वारा कथित यह समयसार नामक प्राभृत कहूँगा ।1। जो जीव दर्शन, ज्ञान, चारित्र में स्थित हो रहा है उसे निश्चय से स्वसमय जानो और जो पुदगलकर्म के प्रदेशों में स्थित है उसे परसमय जानो ।2। एकत्वनिश्चय को प्राप्त… Continue reading समयसार

तत्त्वार्थसूत्र

प्रथम अध्याय सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञान और सम्यक्-चारित्र- ये मोक्ष का मार्ग है ।1। तत्त्व के स्वरूप सहित अर्थ की श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन है ।2। वह स्वभाव से अथवा दूसरे के उपदेशादि से उत्पन्न होता है ।3। जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष- ये सात तत्त्व हैं ।4। नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव से उनका… Continue reading तत्त्वार्थसूत्र

माण्डूक्यकारिका

आगम प्रकरण विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ है । इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है ।1। दक्षिणनेत्ररूप द्वार में विश्व रहता है, तैजस मन के भीतर रहता है, प्राज्ञ हृदयाकाश में उपलब्ध होता है । इस प्रकार वह शरीर में तीन प्रकार से स्थित है… Continue reading माण्डूक्यकारिका