धम्मपद

सारे कार्यों का प्रारम्भ मन से होता है । मन श्रेष्ठ है । सारे कार्य मनोमय हैं । मनुष्य यदि दुष्ट मन से बोलता या कार्य करता है तो दुःख उसका पीछा करता है, जिस प्रकार पहिया बैल के पैर का पीछा करता है ।1। . . . .

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केन उपनिषद (संस्कृत)

केन इषितम् पतति प्रेषितम् मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः । केन इषिताम् वाचम् इमाम् वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ . . . .

ईशावास्य उपनिषद (संस्कृत)

ईशा वास्यम् इदं सर्वम यत्किञ्च जगत्यां जगत । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद् धनम् ।।१।। . . . .

कठ उपनिषद

प्रसिद्ध है कि फल के इच्छुक वाजश्रवा के पुत्र (उद्दालक) ने यज्ञ में अपना सारा धन दे दिया । उसका एक नचिकेता नाम का पुत्र था ॥१॥ जिस समय दक्षिणा के रूप में देने के लिए गौएँ ले जायी जा रही थीं, छोटा बालक होने पर भी उसमें श्रद्धा का आवेश हुआ । वह विचार करने लगा ॥२॥ . . . .

माण्डूक्य उपनिषद

ओम् - यह अक्षर ही सर्व है । सब उसकी ही व्याख्या है । भूत, भविष्य, वर्तमान सब ओंकार ही हैं । तथा अन्य जो त्रिकालतीत है, वह भी ओंकार ही है ॥१॥ . . . .

मुण्डक उपनिषद

सम्पूर्ण देवताओं में सबसे पहले ब्रह्मा उत्पन्न हुआ । वह विश्व का रचयिता और समस्त लोकों की रक्षा करने वाला था । उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र अथर्वा को समस्त विद्याओं की आधारभूत ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया ॥१॥ . . . .