प्रवचनसार

॥ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-अधिकार॥ जो सुरेन्द्रों, असुरेन्द्रों और नरेन्द्रों से वन्दित हैं तथा जिन्होंने घाति कर्म-मल को धो डाला है ऐसे तीर्थ-रूप और धर्म के कर्ता श्री वर्धमानस्वामी को नमस्कार करता हूँ॥१॥ और विशुद्ध सत्तावाले शेष तीर्थंकरों को सर्व सिद्ध-भगवन्तों के साथ ही, और ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचार युक्त श्रमणों को नमस्कार करता हूँ॥२॥ उन उन… Continue reading प्रवचनसार

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नियमसार

[ जीव अधिकार ] अनंत और उत्कृष्ट है ज्ञान-दर्शन जिनका अर्थात् जिनको केवलज्ञान और केवलदर्शन प्रगट हो गये हैं; उन भगवान महावीर को नमस्कार करके मैं केवली और श्रुतकेवली द्वारा कहा गया नियमसार कहूँगा॥१॥ जैनशासन में मार्ग और मार्गफल। ऐसे दो प्रकार बताये गये हैं। उनमें मोक्ष के उपाय को मार्ग कहते हैं और मार्ग… Continue reading नियमसार

समयसार

ध्रुव, अचल और अनुपम गति को प्राप्त हुए सर्व सिद्धों का वंदन करके अहो ! श्रुतकेवलियों के द्वारा कथित यह समयसार नामक प्राभृत कहूँगा ।1। जो जीव दर्शन, ज्ञान, चारित्र में स्थित हो रहा है उसे निश्चय से स्वसमय जानो और जो पुदगलकर्म के प्रदेशों में स्थित है उसे परसमय जानो ।2। एकत्वनिश्चय को प्राप्त… Continue reading समयसार

तत्त्वार्थसूत्र

प्रथम अध्याय सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञान और सम्यक्-चारित्र- ये मोक्ष का मार्ग है ।1। तत्त्व के स्वरूप सहित अर्थ की श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन है ।2। वह स्वभाव से अथवा दूसरे के उपदेशादि से उत्पन्न होता है ।3। जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष- ये सात तत्त्व हैं ।4। नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव से उनका… Continue reading तत्त्वार्थसूत्र