समयसार

ध्रुव, अचल और अनुपम गति को प्राप्त हुए सर्व सिद्धों का वंदन करके अहो ! श्रुतकेवलियों के द्वारा कथित यह समयसार नामक प्राभृत कहूँगा ।1।

जो जीव दर्शन, ज्ञान, चारित्र में स्थित हो रहा है उसे निश्चय से स्वसमय जानो और जो पुदगलकर्म के प्रदेशों में स्थित है उसे परसमय जानो ।2।

एकत्वनिश्चय को प्राप्त जो समय है, वह लोक में सब जगह सुन्दर है इसलिए एकत्व में बन्ध की कथा विरोध करने वाली है ।3।

सर्व लोकों को कामभोग सम्बन्धी बन्ध की कथा तो सुनने में, परिचय में और अनुभव में आ गयी है, इसलिए सुलभ है, किन्तु भिन्न आत्मा का एकत्व होना कभी न तो सुना है, न परिचय में और न अनुभव में आया है, इसलिए एकमात्र वही सुलभ नहीं है ।4।

उस एकत्वविभक्त आत्मा को आत्मा के निज वैभव से दिखाता हूँ, यदि मैं दिखाऊँ तो प्रमाण करना और यदि कहीं चूक जाऊँ तो छल नहीं ग्रहण नहीं करना ।5।

जो ज्ञायक भाव है वह अप्रमत्त भी नहीं और प्रमत्त भी नहीं है । इस प्रकार इसे शुद्ध कहते हैं, और जो ज्ञायकरूप से ज्ञात हुआ वह तो वही है, अन्य कोई नहीं ।6।

ज्ञानी के चारित्र, दर्शन, ज्ञान- ये तीन भाव व्यवहार से कहे जाते हैं, निश्चय से ज्ञान भी नहीं है, चारित्र भी नहीं है और दर्शन भी नहीं है, ज्ञानी तो एक शुद्ध ज्ञायक ही है ।7।

जैसे अनार्य को अनार्यभाषा के बिना किसी वस्तु का स्वरूप ग्रहण कराने के लिए कोई समर्थ नहीं है, उसी प्रकार व्यवहार के बिना परमार्थ का उपदेश देना अशक्य है ।8।

जो जीव निश्चय से श्रुतज्ञान के द्वारा इस केवल एक शुद्ध आत्मा को सन्मुख होकर जानता है, उसे लोक को प्रगट जानने वाले ऋषीश्वर श्रुतकेवली कहते हैं ।9।

जो जीव सर्व श्रुतज्ञान को जानता है, उसे जिनदेव श्रुतकेवली कहते हैं, क्योंकि ज्ञान सब आत्मा ही है, इसलिए वह जीव श्रुतकेवली है ।10।

व्यवहारनय अभूतार्थ है और शुद्धनय भूतार्थ है, ऐसा ऋषियों ने बताया है । जो जीव भूतार्थ का आश्रय लेता है, वह निश्चय से सम्यग्दृष्टि है ।11।

परमभावदर्शी को तो उस शुद्ध का उपदेश करने वाला शुद्धनय जानने योग्य है और जो अपरभाव में ही स्थित हैं, वे व्यवहार द्वारा उपदेश करने योग्य हैं ।12।

भूतार्थ नय से ज्ञात जीव, अजीव और पुण्य, पाप तथा आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध और मोक्ष- यह नव तत्त्व सम्यकत्व हैं ।13।

जो नय आत्मा को बन्ध रहित और पर के स्पर्श रहित, अन्यत्व रहित, चलचलता रहित, विशेष रहित, अन्य के संयोग से रहित- ऐसे पाँच भावरूप से देखता है, उसे शुद्धनय जानो ।14।

जो पुरुष आत्मा को अबद्धस्पृष्ट, अनन्य, अविशेष देखता है, वह सर्व जिनशासन को देखता है,- जो जिनशासन बाह्य द्रव्यश्रुत तथा अभ्यन्तर ज्ञानरूप भावश्रुत वाला है ।15।

साधु को दर्शन, ज्ञान और चारित्र सदा सेवन करने योग्य हैं और उन तीनों को निश्चय से एक आत्मा ही जानो ।16।

जैसे कोई धन का अर्थी पुरुष राजा को जानकर श्रद्धा करता है, और फिर उसका प्रयत्नपूर्वक अनुचरण करता है ।17।

उसी प्रकार मोक्ष के इच्छुक को उस जीवरूपी राजा जानना चाहिए और फिर इसी प्रकार उसका श्रद्धान करना चाहिए तथा फिर उसी का अनुचरण करना चाहिए ।18।

जब तक इस आत्मा की कर्म और नोकर्म में ‘यह मैं हूँ’ और आत्मा में ‘यह कर्म- नोकर्म है’- ऐसी बुद्धि है, तब तक यह आत्मा अप्रतिबुद्ध है ।19।

जो पुरुष सचित्त, अचित्त अथवा मिश्र परद्रव्य को ऐसा समझता है कि- मैं यह हूँ, यह मुझ-स्वरूप हैं, मैं इसका हूँ, यह मेरा है, यह पूर्व में मेरा था, पूर्व में मैं भी इसका था, यह मेरा भविष्य में होगा, मैं भी इसका भविष्य में होऊँगा- ऐसा मिथ्या आत्मविकल्प करता है, वह मूढ़ है और जो पुरुष भूतार्थ को जानता हुआ ऐसा विकल्प नहीं करता, वह ज्ञानी है ।20-21-22।

जिसकी मति अज्ञान से मोहित है और जो अनेकानेक भावों से संयुक्त है, ऐसा जीव कहता है कि यह बद्ध और अबद्ध पुदगल द्रव्य मेरा है ।23।

सर्वज्ञ के ज्ञान द्वारा देखा गया जो सदा उपयोगलक्षणवाला जीव है, वह पुदगलद्रव्यरूप कैसे हो सकता है, जिससे यह कहता है कि ‘यह मेरा है’ ।24।

यदि जीव पुदगलद्रव्यरुप हो जाये और पुदगलद्रव्य जीवत्व को प्राप्त करे तो कह सकता है कि ‘यह पुदगलद्रव्य मेरा है’ ।25।

अप्रतिबुद्ध जीव कहता है कि- यदि जीव शरीर नहीं है तो तीर्थंकरों और आचार्यों की जो स्तुति की गई है, सभी मिथ्या है, इसलिए हम समझते हैं कि आत्मा देह ही है ।26।

व्यवहारनय तो कहता है कि जीव और शरीर एक ही हैं, किन्तु निश्चयनय अभिप्राय से जीव और शरीर कभी भी एक पदार्थ नहीं हैं ।27।

जीव से भिन्न इस पुदगलमय देह की स्तुति करके साधु ऐसा मानते हैं कि मैंने केवली भगवान् की स्तुति की और वंदना की ।28।

वह स्तवन निश्चय में योग्य नहीं है, क्योंकि शरीर के गुण केवली के नहीं होते, जो केवली के गुणों की स्तुति करता है, वह परमार्थ से केवली की स्तुति करता है ।29।

जैसे नगर का वर्णन करने पर भी राजा का वर्णन नहीं किया जाता, इसी प्रकार शरीर के गुण का स्तवन करने पर केवली के गुणों का स्तवन नहीं होता ।30।

जो इन्द्रियों को जीतकर ज्ञान स्वभाव के द्वारा अन्यद्रव्य से अधिक आत्मा को जानते हैं, जो निश्चयनय में स्थित साधु हैं वे उन्हें वास्तव में जितेन्द्रिय कहते हैं ।31।

जो मुनि मोह को जीतकर अपने आत्मा को ज्ञानस्वभाव के द्वारा अन्यद्रव्यभावों से अधिक जानता है उस मुनि को परमार्थ के जानने वाले जितमोह कहते हैं ।32।

उस जितमोह साधु के जब सब मोह क्षीण हो जाते हैं, तब निश्चय के जानने वाले निश्चय से उस साधु को क्षीणमोह कहते हैं ।33।

जिससे, अपने अतिरिक्त सर्व पदार्थों को ‘पर है’ ऐसा जानकर प्रत्याख्यान करता है, उससे, प्रत्याख्यान ‘ज्ञान ही है’ ऐसा जानना ।34।

जैसे लोक में कोई पुरुष परवस्तु को ‘यह पर है’ ऐसा जानकर उसका त्याग करता है, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष समस्त परभावों को जानकर उनको छोड़ देता है ।35।

जो यह जाने कि ‘मोह मेरा कोई भी नहीं है, एक उपयोग ही मैं हूँ’- इस प्रकार जानने को समय के जानने वाले मोहनिर्ममत्व कहते हैं ।36।

यह जाने कि ‘यह धर्म आदि द्रव्य मेरे नहीं, एक उपयोग ही मैं हूँ’- इस जानने को समय के जानने वाले धर्मनिर्ममत्व कहते हैं ।37।

निश्चय से मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, दर्शनज्ञानमय हूँ, सदा अरूपी हूँ, किंचित् मात्र भी अन्य परद्रव्य परमाणु मात्र भी मेरा नहीं है ।38।

आत्मा को न जानते हुए पर को आत्मा कहने वाले कोई मूढ़, मोही, अज्ञानी तो अध्यवसान को और कोई कर्म को जीव कहते हैं ।39।

अन्य कोई अध्यवसानों में तीव्रमन्द अनुभागगत को जीव मानते हैं और दूसरे कोई नोकर्म को जीव मानते हैं ।40।

अन्य कोई कर्म के उदय को जीव मानते हैं, कोई ‘जो तीव्रमंदतारूप गुणों से भेद को प्राप्त होता है, वह जीव है’ इस प्रकार कर्म के अनुभाग को जीव मानते हैं ।41।

कोई जीव और कर्म दोनों मिले हुओं को ही जीव मानते हैं और अन्य कोई कर्म के संयोग से ही जीव मानते हैं ।42।

इस प्रकार के तथा अन्य भी कई प्रकार के दुर्बुद्धि जीव पर को आत्मा कहते हैं । उन्हें निश्चयवादियों ने परमार्थवादी नहीं कहा है ।43।

ये सभी भाव पुदगलद्रव्य के परिणाम से उत्पन्न हुए हैं, इस प्रकार केवली जिनदेव ने कहा है, उन्हें ‘जीव है’ ऐसा कैसे कहा जा सकता है ।44।

आठों प्रकार का कर्म सब पुदगलमय है, ऐसा जिनदेव कहते हैं- जो पक्व होकर उदय में आने वाले कर्म का फल प्रसिद्ध दुःख है, ऐसा कहा है ।45।

यह सब अध्यवसान आदि भाव जीव है, इस प्रकार जिनदेव ने जो उपदेश दिया है सो व्यवहारनय दिखाया है ।46।

‘यह राजा निकला’ इस प्रकार जो सेना के समुदाय सहित उसे कहा जाता है, वह व्यवहार से कहा जाता है । उस सेना में राजा तो एक ही निकला है, इसी प्रकार अध्यवसान आदि अन्य भावों को ‘जीव है’ इस प्रकार आगम में कहा है सो व्यवहार किया है, निश्चय से उसमें जीव तो एक ही है ।47-48।

जीव को अरस, अरूप, अगन्ध, अव्यक्त, चेतनागुणयुक्त, अशब्द, किसी चिह्न से न ग्रहण होने वाला और किसी आकार से निर्दिष्ट न होने वाला जानो ।49।

जीव के वर्ण नहीं, गन्ध भी नहीं, रस भी नहीं, स्पर्श भी नहीं, रूप भी नहीं, शरीर भी नहीं, संस्थान भी नहीं और संहनन भी नहीं ।50।

जीव के राग भी नहीं, द्वेष भी नहीं, मोह भी विद्यमान नहीं, प्रत्यय भी नहीं, कर्म भी नहीं और नोकर्म भी उसके नहीं है ।51।

जीव के वर्ग नहीं, वर्गणा नहीं, कोई स्पर्धक भी नहीं, अध्यात्मस्थान भी नहीं और अनुभागस्थान भी नहीं है ।52।

जीव के कोई योगस्थान भी नहीं है अथवा बन्धस्थान भी नहीं है, उदयस्थान भी नहीं और कोई मार्गणास्थान भी नहीं है ।53।

जीव के स्थितिबन्धस्थान भी नहीं अथवा संक्लेशस्थान भी नहीं, विशुद्धिस्थान भी नहीं अथवा संयमलब्धिस्थान भी नहीं है ।54।

और जीव के जीवस्थान भी नहीं अथवा गुणस्थान भी नहीं है, क्योंकि यह सब पुदगलद्रव्य के परिणाम हैं ।55।

यह वर्ण से लेकर गुणस्थान पर्यन्त जो भाव कहे गए वे व्यवहारनय से तो जीव के हैं, निश्चयनय से उनमें से कोई भी जीव के नहीं हैं ।56।

इन वर्णादिक भावों के साथ जीव का सम्बन्ध दूध और पानी का एकक्षेत्र अवगाहरूप संयोगसम्बन्ध है, ऐसा जानना और वे उस जीव के नहीं हैं क्योंकि जीव उनसे उपयोगगुण से अधिक है ।57।

जैसे मार्ग में जाते हुए व्यक्ति को लुटता हुआ देखकर ‘यह मार्ग लुटता है’ इस प्रकार व्यवहारीजन कहते हैं, किन्तु कोई मार्ग तो नहीं लुटता ।58।

इसी प्रकार जीव में कर्मों और नोकर्मों का वर्ण देखकर ‘जीव का यह वर्ण है’ इस प्रकार जिनदेव ने व्यवहार से कहा है ।59।

इसी प्रकार गन्ध, रस, स्पर्श, रूप, देह, संस्थान आदि जो सब है, वे सब व्यवहार से निश्चय के देखने वाले कहते हैं ।60।

जो वर्णादि हैं वे संसार में स्थित जीवों के उस संसार में होते हैं और संसार से मुक्त हुए जीवों के निश्चय से वर्णादि कोई भी नहीं हैं ।61।

यदि ऐसा मानोगे कि यह सब भाव जीव ही है, तो जीव और अजीव का कोई भेद नहीं रहता ।62।

अथवा यदि ऐसा मानते हो कि- संसार में स्थित जीवों के ही वर्णादि हैं, तो इस कारण से संसार में स्थित जीव रुपित्व को प्राप्त हुए, ऐसा होने से, वैसा लक्षण तो पुदगलद्रव्य का होने से, हे मूढ़बुद्धि ! पुदगलद्रव्य ही जीव कहलाया और निर्वाण प्राप्त होने पर भी पुदगल ही जीवत्व को प्राप्त हुआ ।63-64।

एकेन्द्रिय, द्वीन्द्रिय, त्रीन्द्रिय, चतुरिन्द्रिय और पंचेन्द्रिय, बादर, सूक्ष्म, पर्याप्त और अपर्याप्त- ये नामकर्म की प्रकृतियाँ हैं ।65।

ये प्रकृतियाँ, जो कि पुदगलमय रूप से प्रसिद्ध हैं, उनके द्वारा करणस्वरूप होकर रचित जो जीवस्थान हैं वे जीव कैसे कहे जा सकते हैं ।66।

पर्याप्त, अपर्याप्त, सूक्ष्म और बादर आदि जितनी देह की जीवसंज्ञा कही हैं वे सब सूत्र में व्यवहार से कही हैं ।67।

जो यह गुणस्थान हैं वे मोहकर्म के उदय से होते हैं, ऐसा वर्णन किया गया है, वे जीव कैसे हो सकते हैं कि जो सदा अचेतन कहे गए हैं ।68।

जीव जब तक आत्मा और आस्रव- इन दोनों के अन्तर और भेद को नहीं जानता तब तक वह अज्ञानी रहता हुआ क्रोध आदि आस्रवों में प्रवर्तता है ।69।

क्रोध आदि में प्रवर्तमान उसके कर्म का संचय होता है । वास्तव में इस प्रकार जीव के कर्मों का बन्ध सर्वज्ञों ने कहा है ।70।

जब यह जीव आत्मा का और आस्रवों का अन्तर और भेद जानता है तब उसे बन्ध नहीं होता ।71।

आस्रवों की अशुचिता और विपरीतता तथा वे दुःख के कारण हैं ऐसा जानकर जीव उससे निवृत्ति करता है ।72।

ज्ञानी विचार करता है कि- निश्चय से मैं एक हूँ, शुद्ध हूँ, ममतारहित हूँ, ज्ञानदर्शन से पूर्ण हूँ, उस स्वभाव में रहता हुआ, उसमें लीन होता हुआ इन क्रोधादि आस्रवों को क्षय को प्राप्त कराता हूँ ।73।

यह आस्रव जीव के साथ निबद्ध है, अध्रुव है, अनित्य है तथा अशरण है और वे दुःखरूप हैं, दुःख ही जिनका फल है, ऐसे जानकर ज्ञानी उनसे निवृत्त होता है ।74।

जो आत्मा इस कर्म के परिणाम को तथा नोकर्म के परिणाम को नहीं करता किन्तु जानता है, वह ज्ञानी है ।75।

ज्ञानी अनेक प्रकार के पुदगल कर्म को जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्य की पर्याय में परिणमित नहीं होता, उसे ग्रहण नहीं करता और उस-रूप उत्पन्न नहीं होता ।76।

ज्ञानी अनेक प्रकार के अपने परिणाम को जानता हुआ भी निश्चय से परद्रव्य की पर्याय में परिणमित नहीं होता, उसे ग्रहण नहीं करता और उस-रूप उत्पन्न नहीं होता ।77।

ज्ञानी पुदगलकर्म का फल जो कि अनन्त है उसे जानता हुआ भी परमार्थ से परद्रव्य की पर्यायरूप, परिणमित नहीं होता, उसे ग्रहण नहीं करता और उस-रूप उत्पन्न नहीं होता ।78।

इस प्रकार पुदगलद्रव्य भी परद्रव्य के पर्यायरूप परिणमित नहीं होता, उसे ग्रहण नहीं करता और उस-रूप उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि वह अपने ही भावों से परिणमन करता है ।79।

पुदगल जीव के परिणाम के निमित्त से कर्मरूप में परिणमित होते हैं, तथा जीव भी पुदगलकर्म के निमत्त से परिणमन करता है ।80।

जीव कर्म के गुणों को नहीं करता और उसी तरह कर्म जीव के गुणों को नहीं करता, परन्तु परस्पर निमित्त से दोनों के परिणाम जानो ।81।

इस कारण से आत्मा अपने ही भाव से कर्ता है, परन्तु पुदगलकर्म से किये गए समस्त भावों का कर्ता नहीं है ।82।

निश्चयनय का ऐसा मत है कि आत्मा अपने को ही करता है और फिर आत्मा अपने को ही भोगता है, ऐसा जानो ।83।

व्यवहारनय का यह मत है कि आत्मा अनेक प्रकार के पुदगलकर्म को करता है और उसी अनेक प्रकार के पुदगलकर्म को भोगता है ।84।

यदि आत्मा इस पुदगलकर्म को करे और उसको भोगे तो वह आत्मा दो क्रियाओं से अभिन्न ठहरे ऐसा प्रसंग आता है, जो कि जिनदेव को सम्मत नहीं ।85।

क्योंकि आत्मा के भाव को और पुदगल के भाव को- दोनों को आत्मा करते हैं ऐसा वे मानते हैं, इसलिए एक द्रव्य के दो क्रियाओं के होने को मानने वाला मिथ्यादृष्टि है ।86।

और जो मिथ्यात्व कहा है वह दो प्रकार का है- एक जीवमिथ्यात्व और दूसरा अजीवमिथ्यात्व, और इसी प्रकार अज्ञान, अविरति, योग, मोह तथा क्रोध आदि कषाय- ये भाव भी जीव और अजीव के भेद से दो-दो प्रकार के हैं ।87।

जो मिथ्यात्व योग, अविरति और अज्ञान अजीव हैं सो तो पुदगलकर्म हैं, और जो अज्ञान, अविरति और मिथ्यात्व जीव हैं वह उपयोग है ।88।

अनादि से मोहयुक्त होने से उपयोग के अनादि से लेकर तीन परिणाम हैं, वे मिथ्यात्व, अज्ञान और अविरतिभाव जानना चाहिये ।89।

अनादि से ये तीन प्रकार के परिणामविकार होने से, आत्मा का उपयोग यद्यपि शुद्ध, निरञ्जन भाव है तथापि तीन प्रकार का होता हुआ वह उपयोग जिस भाव को स्वयं करता है उस भाव का वह कर्ता होता है ।90।

आत्मा जिस भाव को करता है, उस भाव का वह कर्ता होता है, उसके कर्ता होने पर पुदगलद्रव्य अपने आप कर्मरूप परिणमित होता है ।91।

जो पर को अपने रूप करता है और अपने को भी पर करता वह अज्ञानमय जीव कर्मों का कर्ता होता है ।92।

जो पर को अनेकरूप नहीं करता और अपने को भी पर नहीं करता वह ज्ञानमय जीव कर्मों का कर्ता नहीं होता ।93।

तीन प्रकार का यह उपयोग ‘मैं क्रोध हूँ’ ऐसा अपना विकल्प करता है, इसलिए आत्मा उस उपयोगरूप अपने भाव का कर्ता होता है ।94।

तीन प्रकार का यह उपयोग ‘मैं धर्मादि हूँ’ ऐसा अपना विकल्प करता है, इसलिए आत्मा उस उपयोगरूप अपने भाव का कर्ता होता है ।95।

इस प्रकार अज्ञानी अज्ञानभाव से परद्रव्यों को अपनेरूप करता है और अपने को पर करता है ।96।

इसलिए निश्चय के जानने वाले ज्ञानियों ने उस आत्मा को कर्ता कहा है- ऐसा निश्चय से जो जानता है वह सर्व कर्तृत्व को छोड़ता है ।97।

व्यवहार से जगत में आत्मा घट, पट, रथ इत्यादि वस्तुओं को और इन्द्रियों को अनेक प्रकार के क्रोधादि द्रव्यकर्मों को और शरीरादि नोकर्मों को करता है, ऐसा मानते हैं ।98।

यदि आत्मा परद्रव्यों को करे तो वह नियम से तन्मय अर्थात परद्रव्यमय हो जाये, किन्तु तन्मय नहीं है इसलिए वह उनका कर्ता नहीं है ।99।

जीव घट को नहीं करता, पट को नहीं करता, शेष कोई द्रव्यों को नहीं करता, परन्तु जीव के योग और उपयोग घटादि को उत्पन्न करने वाले निमित्त हैं, उनका कर्ता जीव होता है ।100।

जो ज्ञानावरण आदि पुदगलद्रव्यों के परिणाम हैं, उन्हें जो आत्मा नहीं करता परन्तु जानता है, वह ज्ञानी है ।101।

आत्मा जिस शुभ या अशुभ भाव को करता है उस भाव का वह वास्तव में कर्ता होता है, वह उसका कर्म होता है और वह आत्मा उसका भोक्ता होता है ।102।

जो वस्तु जिसे द्रव्य में और गुण में वर्तती है वह अन्य द्रव्य में तथा गुण में संक्रमण को प्राप्त न होती हुई वह अन्य वस्तु को कैसे परिणमन करा सकती है ।103।

आत्मा पुदगलमय कर्म में द्रव्य को तथा गुण को नहीं करता, उसमें उन दोनों को न करता हुआ वह उसका कर्ता कैसे हो सकता है ।104।

जीव निमित्तभूत होने पर कर्म बन्ध का परिणाम होता हुआ देखकर, ‘जीव ने कर्म किया’ इस प्रकार उपचार मात्र से कहा जाता है ।105।

योद्धाओं के द्वारा युद्ध किये जाने पर, ‘राजा ने युद्ध किया’ इस प्रकार लोक कहते हैं, उसी प्रकार ‘ज्ञानावरण आदि कर्म जीव ने किया’ ऐसा व्यवहार से कहा जाता है ।106।

आत्मा पुदगलद्रव्य को उत्पन्न करता है, करता है, बाँधता है, परिणमन करता है और ग्रहण करता है- यह व्यवहारनय का कथन है ।107।

जैसे राजा को प्रजा के दोष और गुणों को उत्पन्न करने वाला व्यवहार से कहा जाता है, उसी प्रकार जीव को पुदगलद्रव्य के द्रव्य-गुणों को उत्पन्न करने वाला व्यवहार से कहा गया है ।108।

चार सामान्य प्रत्यय निश्चय से बन्ध के कर्ता कहे जाते हैं, वे- मिथ्यात्व, अविरमण, कषाय और योग जानना ।109।

और फिर उनका, यह तेरह प्रकार का भेद कहा गया है- मिथ्यादृष्टि से लेकर सयोगकेवली के चरम समय पर्यन्त का, यह प्रत्यय जो कि निश्चय से अचेतन है, क्योंकि पुदगलकर्म के उदय से उत्पन्न होते हैं वे यदि कर्म करते हैं तो भला करें, उनका भोक्ता भी आत्मा नहीं है ।110-111।

क्योंकि यह ‘गुण’ नामक प्रत्यय कर्म करते हैं इसलिए जीव तो कर्मों का अकर्ता है और ‘गुण’ ही कर्मों को करते हैं ।112।

जैसे जीव के उपयोग अनन्य है उसी प्रकार क्रोध भी अनन्य हो तो इस प्रकार जीव के और अजीव के अनन्यत्व आ गया ।113।

और ऐसा होने से, इस जगत में जो जीव हैं वही नियम से उसी प्रकार अजीव सिद्ध हुआ । प्रत्यय, नोकर्म और कर्म के एकत्व में भी यही दोष आता है ।114।

अब यदि उस मत से क्रोध अन्य है और उपयोगस्वरूप आत्मा अन्य है, तो जैसे क्रोध है वैसे ही प्रत्यय, कर्म और नोकर्म भी आत्मा से अन्य ही है ।115।

यह पुदगलद्रव्य जीव में स्वयं नहीं बँधा और कर्मभाव से स्वयं नहीं परिणमता, यदि ऐसा माना जाए तो वह अपरिणामी सिद्ध होता है ।116।

और कार्मणवर्गणाएँ कर्मभाव से नहीं परिणमती होने से संसार का अभाव सिद्ध होता है, अथवा साँख्यमत का प्रसंग आता है ।117।

और जीव पुदगलद्रव्यों को कर्मभाव से परिणमाता है ऐसा माना जाए तो प्रश्न यह होता है कि स्वयं नहीं परिणमती हुई उन वर्गणाओं की चेतन आत्मा कैसे परिणमन करा सकता है ।118।

अथवा यदि पुदगलद्रव्य अपने आप ही कर्मभाव से परिणमन करता है ऐसा माना जाए तो जीव कर्म को कर्मरूप परिणमन कराता है यह कथन मिथ्या सिद्ध होता है ।119।

इसलिए जैसे नियम से कर्मरूप परिणमित पुदगलद्रव्य कर्म ही है इसी प्रकार ज्ञानावरणादिरूप परिणमित पुदगलद्रव्य ज्ञानावरणादि ही है, ऐसा जानो ।120।

साँख्य मत के अनुसार यह जीव कर्म से स्वयं नहीं बँधा है और क्रोधादि भाव से स्वयं नहीं परिणमता, यदि ऐसा है तो वह अपरिणामी सिद्ध होता है, और जीव स्वयं क्रोधादि भावरूप नहीं परिणमता होने से संसार का अभाव सिद्ध होता है ।121-122।

और पुदगलकर्म जो क्रोध है वह जीव को क्रोधरूप परिणमन कराता है, ऐसा मानो तो प्रश्न होता है कि स्वयं नहीं परिणमते हुए उस जीव को क्रोध कैसे परिणमन करा सकता है ।123।

अथवा यदि आत्मा अपने आप क्रोधभाव से परिणमता है, ऐसी यदि बुद्धि हो तो क्रोध जीव को क्रोधरूप परिणमन कराता है यह कथन मिथ्या सिद्ध होता है ।124।

अतः क्रोध में उपयुक्त आत्मा क्रोध ही है, मान में उपयुक्त आत्मा मान ही है, माया में उपयुक्त आत्मा माया है और लोभ में उपयुक्त आत्मा लोभ है ।125।

आत्मा जिस भाव को करता है उस भावरूप कर्म का वह कर्ता होता है, ज्ञानी को तो वह भाव ज्ञानमय है और अज्ञानी को अज्ञान मय है ।126।

अज्ञानी के अज्ञानमय भाव हैं इसलिए वह कर्म को करता है, और ज्ञानी के तो ज्ञानमय भाव हैं इसलिये ज्ञानी कर्म को नहीं करता ।127।

क्योंकि ज्ञानमय भावों में से ज्ञानमय ही भाव उत्पन्न होते हैं इसलिए ज्ञानियों के समस्त भाव ज्ञानमय ही होते हैं ।128।

और क्योंकि अज्ञानमय भावों में से अज्ञानमय ही भाव उत्पन्न होता है इसलिए अज्ञानियों के भाव अज्ञानमय ही होते हैं ।129।

जैसे स्वर्णमय भावों में से स्वर्णमय कुण्डल इत्यादि भाव होते हैं और लोहमय भावों में से लोहमय कड़ा इत्यादि भाव होते हैं ।130।

उसी प्रकार अज्ञानियों के अनेक प्रकार के अज्ञानमय भाव होते हैं और ज्ञानियों के सभी ज्ञानमय भाव होते हैं ।131।

जीवों के जो तत्त्व का अज्ञान है वह अज्ञान का उदय है और जीव के जो तत्त्व का अश्रद्धान है वह मिथ्यात्व का उदय है ।132।

जीवों के जो अत्यागभाव है वह असंयम का उदय है और जीवों के जो मलिन उपयोग है वह कषाय का उदय है ।133।

जीवों के जो शुभ या अशुभ प्रवृत्ति या निवृत्तिरूप चेष्टा का उत्साह है उसे योग का उदय जानो ।134।

इनको हेतुभूत होने पर जो कार्मणवर्गणागत पुदगलद्रव्य ज्ञानावरण आदि भावरूप से आठ प्रकार परिणमता है ।135।

वह कार्मणवर्गणागत पुदगलद्रव्य जब वास्तव में जीव में बँधता है तब जीव परिणामभावों का हेतु होता है ।136।

यदि पुदगलद्रव्य का जीव के साथ ही कर्मरूप परिणाम होता है ऐसा माना जाए तो इस प्रकार पुदगल और जीवद्रव्य दोनों वास्तव में कर्मत्व को प्राप्त हो जायें ।137।

परन्तु कर्मभाव से परिणाम तो पुदगलद्रव्य के एक के ही होता है है इसलिए जीवभावरूप निमित्त से रहित ही कर्म का परिणाम है ।138।

यदि जीव के कर्म के साथ ही राग आदि परिणाम होते हैं ऐसा माना जाए तो इस प्रकार जीव और कर्म दोनों रागादि भाव को प्राप्त हो जायें ।139।

परन्तु रागादि भाव से परिणाम तो जीव के एक के ही होता है इसलिए कर्मोदयरूप निमित्त से रहित ही जीव का परिणाम है ।140।

जीव में कर्म बँधा हुआ है तथा स्पर्शित है ऐसा व्यवहार नय का कथन है और जीव में कर्म अबद्ध और अस्पर्शित है ऐसा शुद्धनय का कथन है ।141।

जीव में कर्म बद्ध है अथवा अबद्ध है- इस प्रकार तो नयपक्ष जानो, किन्तु जो पक्ष का अतिक्रमण करने वाला कहलाता है वह समयसार है ।142।

नयपक्ष से रहित जीव, समय से प्रतिबद्ध होता हुआ दोनों ही नयों के कथन को मात्र जानता ही है परन्तु नयपक्ष को किंचित् मात्र भी ग्रहण नहीं करता ।143।

जो सर्व नयपक्षों से रहित कहा गया है वह समयसार है, इसी को केवल सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान की संज्ञा मिलती है ।144।

अशुभ कर्म कुशील है और शुभ कर्म सुशील है ऐसा तुम जानते हो ! वह सुशील कैसे हो सकता है जो संसार में प्रवेश कराता है ।145।

जैसे सोने की बेड़ी भी पुरुष को बाँधती है और लोहे की भी, इसी प्रकार शुभ तथा अशुभ किया हुआ कर्म जीव को बाँधता है ।146।

इसलिए इन दोनों कुशीलों के साथ राग मत करो और संसर्ग भी मत करो क्योंकि कुशील के साथ संसर्ग और राग करने से स्वाधीनता का नाश होता है ।147।

जैसे कोई पुरुष कुशील व्यक्ति को जानकर उसके साथ राग और संसर्ग करना छोड़ देता है ।148।

उसी प्रकार स्वभाव में रत पुरुष कर्मप्रकृति के शील-स्वभाव को कुत्सित जानकर उसके साथ संसर्ग और राग छोड़ देते हैं ।149।

रागी जीव कर्म बाँधता है और वैराग्य को प्राप्त जीव कर्म से छूटता है- यह जिनदेव का उपदेश है, इसलिए कर्मों से प्रीति-राग मत करो ।150।

निश्चय ही परमार्थ है, समय है, शुद्ध है, केवली है, मुनि है, ज्ञानी है, उस स्वभाव में स्थित मुनि निर्वाण को प्राप्त होते हैं ।151।

परमार्थ में अस्थित जो जीव तप करता है और व्रत धारण करता है, उन सब को सर्वज्ञदेव बालतप और बालव्रत कहते हैं ।152।

व्रत और नियमों को धारण करते हुए भी तथा शील और तप करते हुए भी जो परमार्थ से बाह्य हैं, वे निर्वाण को प्राप्त नहीं होते ।153।

जो परमार्थ से बाह्य हैं वे मोक्ष के हेतु को न जानते हुए, संसारगमन का हेतु होते हुए भी अज्ञान से पुण्य को चाहते हैं ।154।

जीवादि पदार्थों का श्रद्धान सम्यकत्व है, उन जीवादि पदार्थों का अधिगम ज्ञान है और रागादि का त्याग चरित्र है- यही मोक्ष का मार्ग है ।155।

निश्चयनय के विषय को छोड़कर विद्वान व्यवहार के द्वारा प्रवर्तते हैं, परन्तु परमार्थ के आश्रित यतीश्वरों के ही कर्मों का नाश आगम में कहा गया है ।156।

जैसे वस्त्र का श्वेतभाव मैल के मिलने से लिप्त होता हुआ नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मिथ्यात्वरूपी मैल से लिप्त हुआ सम्यकत्व भी तिरोभूत हो जाता है, ऐसा जानना चाहिए ।157।

जैसे वस्त्र का श्वेतभाव मैल के मिलने से लिप्त होता हुआ नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार अज्ञानरूपी मैल से लिप्त हुआ ज्ञान भी तिरोभूत हो जाता है, ऐसा जानना चाहिए ।158।

जैसे वस्त्र का श्वेतभाव मैल के मिलने से लिप्त होता हुआ नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार कषायरूपी मैल से लिप्त हुआ चारित्र भी तिरोभूत हो जाता है, ऐसा जानना चाहिए ।159।

वह आत्मा सर्व को जानने-देखने वाला है तथापि अपने कर्ममल से लिप्त होता हुआ संसार को प्राप्त हुआ वह सर्व प्रकार से सर्व को नहीं जानता ।160।

सम्यकत्व को रोकने वाला मिथ्यात्व है ऐसा जिनवरों ने कहा है, उसके उदय से जीव मिथ्यादृष्टि होता है ऐसा जानना चाहिए ।161।

ज्ञान को रोकने वाला अज्ञान है ऐसा जिनवरों ने कहा है, उसके उदय से जीव अज्ञानी होता है, ऐसा जानना चाहिए ।162।

चारित्र को रोकने वाला कषाय है ऐसा जिनवरों ने कहा है, उसके उदय से जीव अचारित्रवान होता है, ऐसा जानना चाहिए ।163।

मिथ्यात्व, अविरमण, कषाय और योग- यह आस्रव संज्ञ भी हैं और असंज्ञ भी हैं । विविध भेद वाले संज्ञ आस्रव जो कि जीव में उत्पन्न होते हैं वे जीव के ही अनन्य परिणाम हैं ।164।

और असंज्ञ आस्रव ज्ञानावरण आदि कर्म के कारण होते हैं और उनका भी रागद्वेष आदि भाव करने वाला जीव कारण होता है ।165।

आस्रव निरोध के कारण सम्यग्दृष्टि के आस्रव-बन्ध नहीं है । नवीन कर्मों को नहीं बाँधता हुआ वह, पूर्व बद्ध कर्मों को जानता ही है ।166।

जीवकृत रागादियुक्त भाव ही बन्धक कहा गया है । रागादि से रहित भाव बन्धक नहीं है, वह मात्र ज्ञायक ही है ।167।

जैसे पके हुए फल के गिरने पर फिर वह फल डंठल के साथ नहीं जुड़ता, उसी प्रकार जीव के कर्मभाव खिर जाने पर वह फिर से उत्पन्न नहीं होता ।168।

उस ज्ञानी के पूर्वबद्ध समस्त प्रत्यय मिट्टी के ढेले के समान हैं और वे कार्मण शरीर के साथ बँधे हुए हैं ।169।

क्योंकि चार प्रकार के ज्ञानदर्शनगुणों के द्वारा समय-समय पर अनेक प्रकार का कर्म बाँधते हैं इसलिए ज्ञानी तो अबन्ध है ।170।

क्योंकि ज्ञानगुण, जघन्य ज्ञानगुण के कारण फिर से भी अनन्यरूप से परिणमन करता है, इसलिये वह कर्मों का बन्धक कहा गया है ।171।

क्योंकि ज्ञान-दर्शन-चारित्र जघन्य भाव से परिणमन करते हैं इसलिए ज्ञानी अनेक प्रकार के पुदगलकर्म से बँधाता है ।172।

सम्यग्दृष्टि के समस्त पूर्वबद्ध प्रत्यय सत्तारूप में विद्यमान हैं वे उपयोग के प्रयोगनुसार, कर्मभाव के द्वारा नवीन बन्ध करते हैं ।173।

वे प्रत्यय, निरूपभोग्य होकर फिर जैसे उपभोग्य होते हैं उसी प्रकार ज्ञानावरण आदि भाव से सात-आठ प्रकार से होने वाले कर्मों को बाँधते हैं ।174।

सत्ता अवस्था में वे निरूपभोग्य हैं, जैसे जगत में बाल स्त्री पुरुष के लिए निरूपभोग्य है । जैसे तरुण स्त्री पुरुष को बाँध लेती है, उसी प्रकार उसी प्रकार वे उपभोग्य होने पर बन्धन करते हैं ।175।

इस कारण से सम्यग्दृष्टि को अबन्धक कहा है, क्योंकि आस्रवभाव के अभाव में प्रत्ययों को कर्मों का बन्धक नहीं कहा है ।176।

राग, द्वेष और मोह- यह आस्रव सम्यग्दृष्टि के नहीं होते इसलिये आस्रवभाव के बिना प्रत्यय कारण नहीं होते ।177।

चार प्रकार के हेतु आठ प्रकार के कर्मों का कारण कहे गए हैं और उनके भी रागादि भाव कारण हैं, इसलिये उनके अभाव में कर्म नहीं बँधते ।178।

जैसे पुरुष के द्वारा ग्रहण किया हुआ जो आहार है वह उदराग्नि से संयुक्त होता हुआ मांस, चर्बी, रुधिर आदि अनेक भावरूप परिणमन करता है, उसी प्रकार ज्ञानियों के पूर्वबद्ध जो प्रत्यय हैं वे अनेक प्रकार के कर्म बाँधते हैं, ऐसे जीव शुद्धनय से च्युत हैं ।179-180।

उपयोग, उपयोग में है, क्रोधादि में कोई भी उपयोग नहीं है और क्रोध, क्रोध में ही है, उपयोग में निश्चय ही क्रोध नहीं है ।181।

आठ प्रकार के कर्मों में और नोकर्म में उपयोग नहीं है और उपयोग में कर्म तथा नोकर्म नहीं है ।182।

ऐसा अविपरीत ज्ञान जब जीव के होता है, तब वह उपयोग स्वरूप शुद्धात्मा उपयोग के अतिरिक्त अन्य किसी भी भाव को नहीं करता ।183।

जैसे स्वर्ण अग्नि से तप्त होता हुआ भी अपने स्वर्णत्व को नहीं छोड़ता, उसीप्रकार ज्ञानी कर्मों के उदय से तप्त होता हुआ भी ज्ञानित्व को नहीं छोड़ता ।184।

ऐसा ज्ञानी जानता है और अज्ञानी अज्ञानान्धकार से आच्छादित होने से आत्मा के स्वभाव को न जानता हुआ राग को ही आत्मा मानता है ।185।

शुद्ध आत्मा को जानता हुआ जीव शुद्ध आत्म को ही प्राप्त करता है, और अशुद्ध आत्मा को जानता हुआ जीव अशुद्ध आत्मा को ही प्राप्त करता है ।186।

आत्मा को आत्मा के द्वारा दो पाप-पुण्यरूपी शुभाशुभयोगों से रोककर दर्शनज्ञान में स्थित होता हुआ और अन्य की इच्छा से विरत होता हुआ – ।187।

जो आत्मा, सर्व संग से रहित होता हुआ आत्मा को आत्मा के द्वारा ध्याता है, कर्म तथा नोकर्म को नहीं ध्याता और स्वयं चैतन्य होने से एकत्व को ही चिन्तन करता है – ।188।

वह आत्मा को ध्याता हुआ, दर्शनज्ञानमय और अनन्यमय होता हुआ अल्पकाल में ही कर्मों से रहित आत्मा को प्राप्त करता है ।189।

उनके हेतु सर्वदर्शियों ने मिथ्यात्व, अज्ञान, अविरतभाव और योग- यह अध्यवसान कहे हैं ।190।

ज्ञानियों के हेतुओं के अभाव में नियम से आस्रवों का निरोध होता है, आस्रवभाव के बिना कर्म का भी निरोध होता है ।191।

कर्म के अभाव से नोकर्मों का भी निरोध होता है, और नोकर्म के अभाव से संसार का निरोध होता है ।192।

सम्यग्दृष्टि जीव जो इन्द्रियों के द्वारा अचेतन तथा चेतन द्रव्यों का उपभोग करता है वह सब निर्जरा का निमित्त है ।193।

वस्तु भोगने में आने पर, सुख अथवा दुःख नियम से उत्पन्न होता है, उदय को प्राप्त उस सुखदुःख का अनुभव करता हुआ निर्जरा को प्राप्त होता है ।194।

जिस प्रकार वैद्य पुरुष विष को भोगता हुआ भी मरण को प्राप्त नहीं होता, उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष पुदगलकर्म के उदय को भोगता हुआ भी बँधता नहीं है ।195।

जैसे अरतिभाव से मदिरा को पीता हुआ पुरुष मतवाला नहीं होता, उसीप्रकार ज्ञानी भी द्रव्य के उपभोग के प्रति अरत हुआ बन्ध को प्राप्त नहीं होता ।196।

कोई तो विषयों को सेवन करता हुआ भी सेवन नहीं करता और कोई सेवन न करता हुआ भी सेवन करने वाला है- जैसे किसी पुरुष के प्रकरण की चेष्टा वर्तती है तथापि वह प्राकरणिक नहीं होता ।197।

कर्मों के उदय का विपाक जिनवरों ने अनेक प्रकार का कहा है, वे मेरे स्वभाव नहीं हैं, मैं तो एक ज्ञायकभाव हूँ ।198।

राग पुदगलकर्म है, यह उसका विपाकरूप उदय है, यह मेरा भाव नहीं है, मैं तो निश्चय ही एक ज्ञायकभाव हूँ ।199।

इस प्रकार सम्यग्दृष्टि आत्मा को ज्ञायकस्वभाव जानता है और तत्त्व को जानता हुआ कर्म के विपाकरूप उदय को छोड़ता है ।200।

वास्तव में जिस जीव के परमाणुमात्र भी रागादि विद्यमान है, वह भले ही समस्त आगमों का ज्ञाता हो तथापि आत्मा को नहीं जानता ।201।

और आत्मा को न जानता हुआ वह अनात्मा को भी नहीं जानता, इस प्रकार जो जीव और अजीव को नहीं जानता वह सम्यग्दृष्टि कैसे हो सकता है ।202।

आत्मा में अपदभूत द्रव्यभावों को छोड़कर निश्चित, स्थिर, एक इस भाव को जो कि स्वभाव से ही उपलब्ध है, उसे जैसा है वैसा ही ग्रहण करो ।203।

मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्याय और केवलज्ञान- यह एक ही पद है, यही वह परमार्थ है जिसे उपलब्ध करके आत्मा निर्वाण को प्राप्त होता है ।204।

ज्ञानगुण से रहित बहुत से लोग इस ज्ञानस्वरूप पद को प्राप्त नहीं करते, इसलिए यदि कर्म से सर्वथा मुक्ति चाहते हो तो नियत इस ज्ञान को ग्रहण करो ।205।

इसमें ही नित्य रत हो, इसमें ही नित्य संतुष्ट हो और इससे ही तृप्त हो, इसी से उत्तम सुख होगा ।206।

अपने आत्मा को ही नियम से अपना परिग्रह जानता हुआ कौन सा ज्ञानी यह कहेगा कि यह परद्रव्य मेरा द्रव्य है ।207।

यदि परिग्रह मेरा हो तो मैं अजीवत्व को प्राप्त हो जाऊँ । क्योंकि मैं तो ज्ञाता ही हूँ, इसलिए परिग्रह मेरा नहीं है ।208।

छिद जाए अथवा भिद जाए, कोई ले जाये अथवा नष्ट हो जाये अथवा चाहे जिस प्रकार से चला जाये, फिर भी निश्चय ही परिग्रह मेरा नहीं है ।209।

अनिच्छक को अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी धर्म को नहीं चाहता, इसलिए वह धर्म का परिग्रही नहीं है, ज्ञायक ही है ।210।

अनिच्छक को अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी अधर्म को नहीं चाहता, इसलिए वह अधर्म का परिग्रही नहीं है, ज्ञायक ही है ।211।

अनिच्छक को अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी भोजन को नहीं चाहता, इसलिए वह भोजन का परिग्रही नहीं है, ज्ञायक ही है ।212।

अनिच्छक को अपरिग्रही कहा है और ज्ञानी पान को नहीं चाहता, इसलिए वह पान का परिग्रही नहीं है, ज्ञायक ही है ।213।

इत्यादि अनेक प्रकार के सर्व भावों को ज्ञानी नहीं चाहता, सर्वत्र निरालम्ब वह निश्चित ज्ञायकभाव ही है ।214।

जो उत्पन्न उदय का भोग है, वह ज्ञानी के सदा वियोगबुद्धि से होता है और आगामी उदय की ज्ञानी आकांक्षा नहीं करता ।215।

वेद्य और वेदक दोनों भाव समय-समय पर नष्ट हो जाते हैं- ऐसा जानने वाला ज्ञानी उन दोनों भावों की कभी भी आकांक्षा नहीं रखता ।216।

बन्ध और उपभोग के निमित्तभूत संसारसम्बन्धी और देहसम्बन्धी अध्यवसान के उदयों में ज्ञानी के राग उत्पन्न नहीं होता ।217।

सब द्रव्यों के प्रति राग को छोड़ने वाला ज्ञानी कर्म के मध्य में रहा हुआ हो तो भी कर्मरूपी रज से लिप्त नहीं होता, जिस प्रकार सोना कीचड़ में पड़ा हो तो भी उससे लिप्त नहीं होता ।218।

सब द्रव्यों के प्रति रागशील अज्ञानी कर्मों के मध्य में रहा हुआ कर्मरज से लिप्त होता है, जैसे कीचड़ में पड़ा हुआ लोहा उससे लिप्त हो जाता है ।219।

जिस प्रकार शंख अनेक प्रकार के सचित्त, अचित्त और मिश्र द्रव्यों को भोगता है तथापि उसका श्वेतभाव काला नहीं किया जा सकता- ।220।

उसी प्रकार ज्ञानी भी सचित्त, अचित्त और मिश्र द्रव्यों को भोगे तो भी उसके ज्ञान को अज्ञानरूप नहीं किया जा सकता ।221।

जब वही शंख स्वयं उस श्वेत स्वभाव को छोड़कर कृष्णभाव को प्राप्त होता है, तब शुक्लत्व को छोड़ देता है- ।222।

उसी प्रकार वास्तव में ज्ञानी भी जब उस ज्ञानस्वभाव को छोड़कर अज्ञानरूप परिणमित होता है, तब अज्ञानता को प्राप्त होता है ।223।

जैसे इस जगत में कोई पुरुष आजीविका के लिए राजा की सेवा करता है, तो राजा भी उसे सुख उत्पन्न करने वाले अनेक प्रकार के भोग देता है- ।224।

उसी प्रकार जीवपुरुष सुख के लिये कर्मरज की सेवा करता है, तो वह कर्म भी उसे सुख उत्पन्न करने वाले अनेक प्रकार के भोग देता है ।225।

और जिस प्रकार वही पुरुष आजीविका के लिए राजा की सेवा नहीं करता, तो वह राजा भी उसे सुख उत्पन्न करने वाले अनेक प्रकार के भोग नहीं देता- ।226।

उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि विषय के लिए कर्मरज की सेवा नहीं करता, इसलिए वह कर्म भी उसे सुख उत्पन्न करने वाले अनेक प्रकार के भोग नहीं देता ।227।

सम्यग्दृष्टि जीव निःशंक होते हैं, इसलिये निर्भय होते हैं और क्योंकि वे सप्तभयों से रहित होते हैं, इसलिये निःशंक होते हैं ।228।

जो चैतन्य आत्मा कर्मबन्ध सम्बन्धी मोह करने वाले मिथ्यात्व आदि भावरूप चारों पादों छेदता है, उसको निःशंक सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए ।229।

जो चैतन्य आत्मा कर्मफलों के प्रति तथा सभी धर्मों के प्रति आकांक्षा नहीं रखता, उसको निष्कांक्ष सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए ।230।

जो चैतन्य आत्मा समस्त धर्मों के प्रति जुगुप्सा नहीं करता, उसको निश्चय से निर्विचिकित्स सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए ।231।

जो चैतन्य आत्मा सब भावों में अमूढ़ है, यथार्थ दृष्टि वाला है, उसको निश्चय से अमूढ़दृष्टि सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए ।232।

जो सिद्धों की शुद्धात्मा की भक्ति से युक्त है और पर वस्तुओं के सब धर्मों को गोपनेवाला है, उसको उपगूहनकारी सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए ।233।

जो चैतन्य आत्मा उन्मार्ग में जाते हुए अपने आत्मा को भी मार्ग में स्थापित करता है, वह स्थितिकरण युक्त सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए ।234।

जो मोक्षमार्ग के तीनों साधकों-साधनों के प्रति वात्सल्य करता है, वह वत्सलभाव से युक्त सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए ।235।

जो चैतन्य आत्मा विद्यारूपी रथ पर आरूढ़ हुआ मनरूपी रथ के पथ में भ्रमण करता है, वह जिनदेव के ज्ञान की प्रभावना करने वाला सम्यग्दृष्टि जानना चाहिए ।236।

जैसे कोई पुरुष तैल आदि स्निग्ध पदार्थ लगाकर और बहुत सी धूलि वाले स्थान में रहकर शस्त्रों के द्वारा व्यायाम करता है- ।237।

तथा ताड़, तमाल, केल, बाँस, अशोक इत्यादि वृक्षों को छेदता है, भेदता है, सचित्त तथा अचित्त द्रव्यों का उपघात करता है- ।238।

इस प्रकार नाना प्रकार के करणों के द्वारा उपघात करते हुए उस पुरुष के धूलि का बन्ध वास्तव में किस कारण से होता है, यह निश्चय से विचार करो ।239।

उस पुरुष में जो वह तैल आदि की चिकनाहट है, उससे ही उसे धूलि का बन्ध होता है, शेष शारीरिक चेष्टाओं से नहीं, ऐसा निश्चय से जानना चाहिए ।240।

इसी प्रकार बहुत प्रकार की चेष्टाओं में वर्तता हुआ मिथ्यादृष्टि उपयोग में रागादि भावों को करता हुआ कर्मरूपी रज से लिप्त होता है ।241।

और जैसे वही पुरुष समस्त तैल आदि स्निग्ध पदार्थ को दूर किये जाने पर बहुत धूलि वाले स्थान में शस्त्रों के द्वारा व्यायाम करता है- ।242।

तथा ताड़, तमाल, केल, बाँस, अशोक इत्यादि वृक्षों को छेदता है, भेदता है, सचित्त तथा अचित्त द्रव्यों का उपघात करता है- ।243।

इस प्रकार नाना प्रकार के करणों के द्वारा उपघात करते हुए उस पुरुष के धूलि का बन्ध वास्तव में किस कारण से नहीं होता है, यह निश्चय से विचार करो ।244।

उस पुरुष में जो वह तैल आदि की चिकनाहट है, उससे ही उसे धूलि का बन्ध होता है, शेष शारीरिक चेष्टाओं से नहीं, ऐसा निश्चय से जानना चाहिए ।245।

इस प्रकार बहुत प्रकार के योगों में वर्तता हुआ सम्यग्दृष्टि उपयोग में रागादि को न करता हुआ कर्मरज से लिप्त नहीं होता ।246।

जो यह मानता है कि ‘मैं पर जीव को मारता हूँ और पर जीव मुझे मारते हैं’, वह मूढ़ है, अज्ञानी है और इसके विपरीत को मानने वाला ज्ञानी है ।247।

जीवों का मरण आयुकर्म के क्षय से होता है, ऐसा जिनवरों ने कहा है । तुम पर जीवों के आयुकर्म के तो हरता नहीं हो, तो तुमने उनका मरण कैसे किया ।248।

जीवों का मरण आयुकर्म के क्षय से होता है, ऐसा जिनवरों ने कहा है । पर जीव तेरे आयुकर्म को तो हरते नहीं हैं, तो उन्होंने तेरा मरण कैसे किया ।249।

जो यह मानता है कि ‘मैं पर जीवों को जिलाता हूँ और पर जीव मुझे जिलाते हैं’, वह मूढ़ है, अज्ञानी है और इसके विपरीत को मानने वाला ज्ञानी है ।250।

जीव आयुकर्म के उदय से जीता है, ऐसा सर्वज्ञदेव कहते हैं । तू पर जीवों को आयुकर्म तो नहीं देता, तो तूने उनका जीवन कैसे किया ।251।

जीव आयुकर्म के उदय से जीता है, ऐसा सर्वज्ञदेव कहते हैं । पर जीव तुझे आयुकर्म तो देते नहीं हैं, तो उन्होंने तेरा जीवन कैसे किया ।252।

जो यह मानता है कि ‘अपने द्वारा मैं जीवों को दुःखी-सुखी करता हूँ’, वह मूढ़ है, अज्ञानी है और इसके विपरीत को मानने वाला ज्ञानी है ।253।

यदि सभी जीव कर्म के उदय से दुःखी-सुखी होते हैं, और तू उन्हें कर्म तो देता नहीं है, तो तूने उन्हें दुःखी-सुखी कैसे किया ।254।

यदि सभी जीव कर्म के उदय से दुःखी-सुखी होते हैं, और वे तुझे कर्म तो नहीं देते, तो उन्होंने तुझको दुःखी कैसे किया ।255।

यदि सभी जीव कर्म के उदय से दुःखी-सुखी होते हैं, और वे तुझे कर्म तो नहीं देते, तो उन्होंने तुझको सुखी कैसे किया ।256।

जो मरता है और जो दुखी होता है, वह सब कर्मोदय से होता है, इसलिये ‘मैंने मारा, मैंने दुःखी किया’, ऐसा तेरा अभिप्राय क्या वास्तव में मिथ्या ही नहीं है ।257।

और जो न मरता है और जो न दुखी होता है, वह भी वास्तव में कर्मोदय से ही होता है, इसलिये ‘मैंने नहीं मारा, मैंने दुःखी नहीं किया’, ऐसा तेरा अभिप्राय क्या वास्तव में मिथ्या ही नहीं है ।258।

तेरी यह जो बुद्धि है कि मैं जीवों को दुःखी-सुखी करता हूँ, यह तेरी मूढ़ बुद्धि ही शुभाशुभ कर्मों को बाँधती है ।259।

‘जीवों को मैं दुःखी-सुखी करता हूँ’, ऐसा जो तेरा अध्यवसान है, वही पाप का बन्धक अथवा पुण्य का बन्धक होता है ।260।

‘जीवों को मैं मारता हूँ और जिलाता हूँ’, ऐसा जो तेरा अध्यवसान है, वही पाप का बन्धक अथवा पुण्य का बन्धक होता है ।261।

जीवों को मारो अथवा न मारो- कर्मबन्ध अध्यवसान से ही होता है । यह निश्चय से जीवों के बन्ध का संक्षेप है ।262।

इसी प्रकार असत्य में, चोरी में, अब्रह्मचर्य में और परिग्रह में जो अध्यवसान किया जाता है, उससे पाप का बन्ध होता है ।263।

और इसी प्रकार सत्य में, अचौर्य में, ब्रह्मचर्य में और अपरिग्रह में जो अध्यवसान किया जाता है, उससे पुण्य का बन्ध होता है ।264।

और जीवों के जो अध्यवसान होता है वह वस्तु को अवलंब करके होता है तथापि वस्तु से बन्ध नहीं होता, अध्यवसान से ही बन्ध होता है ।265।

‘मैं जीवों को दुःखी-सुखी करता हूँ, बाँधता हूँ तथा छुड़ाता हूँ’, ऐसी जो यह तेरी मूढ़मति है वह निरर्थक होने से वास्तव में मिथ्या है ।266।

यदि वास्तव में अध्यवसान के निमित्त से जीव कर्म से बँधते हैं और मोक्षमार्ग में स्थित होकर मुक्त होते हैं, तो तू क्या करता है ।267।

जीव अध्यवसान से तिर्यंच, नारक, देव और मनुष्य, इन सब पर्यायों तथा अनेक प्रकार के पुण्य और पाप- इन स्वरूप अपने को करता है ।268।

और उसी प्रकार जीव अध्यवसान धर्म-अधर्म, जीव-अजीव और लोक-अलोक- इन-स्वरूप अपने को करता है ।269।

यह तथा ऐसे और भी अध्यवसान जिनके नहीं हैं, वे मुनि अशुभ या शुभ कर्म से लिप्त नहीं होते ।270।

बुद्धि, व्यवसाय, अध्यवसान, मति, विज्ञान, चित्त, भाव और परिणाम- इन सबका अर्थ एक ही है ।271।

इस प्रकार व्यवहारनय निश्चयनय के द्वारा निषिद्ध जान, फिर निश्चयनय के आश्रित मुनि निर्वाण को प्राप्त होते हैं ।272।

जिनवरों के द्वारा कथित व्रत, समिति, गुप्ति, शील, तप करता हुआ भी अभव्य जीव अज्ञानी और मिथ्यादृष्टि है ।273।

मोक्ष की श्रद्धा न करता हुआ जो अभव्य जीव है, वह शास्त्र तो पड़ता है, परन्तु ज्ञान की श्रद्धा न करने वाले उसको शास्त्रपठन गुण नहीं करता ।274।

वह भोग के निमित्तरूप धर्म की ही श्रद्धा करता है, उसी की प्रतीति करता है, उसी की रुचि करता है और उसी का स्पर्श करता है, परन्तु कर्मक्षय के निमित्तरूप धर्म को नहीं ।275।

आचार आदि ज्ञान है, जीव आदि दर्शन है और छह जीव-निकाय चारित्र है- ऐसा तो व्यवहारनय कहता है ।276।

निश्चय से मेरा आत्मा ही ज्ञान है, दर्शन और चारित्र है, मेरा आत्मा ही प्रत्याख्यान है, मेरा आत्मा ही संवर और योग है ।277।

जैसे स्फटिकमणि शुद्ध होने से रागादि रूप से अपने आप परिणमता नहीं है परन्तु अन्य रक्त आदि द्रव्यों से वह रक्त आदि किया जाता है- ।278।

उसी प्रकार ज्ञानी शुद्ध होने से रागादिरूप अपने आप परिणमता नहीं परन्तु अन्य रागादि दोषों से वह रागी आदि किया जाता है ।279।

ज्ञानी रागद्वेषमोह का अथवा कषायभाव को अपने आप अपने में नहीं करता इसलिये वह उन भावों का कारक नहीं है ।280।

राग, द्वेष और कषायकर्म के होने पर जो भाव होते हैं, उन-रूप परिणमित होता हुआ अज्ञानी रागादि को पुनः-पुनः बाँधता है ।281।

राग, द्वेष और कषायकर्म के होने पर जो भाव होते हैं, उन-रूप परिणमित होता हुआ आत्मा रागादि को बाँधता है ।282।

अप्रतिक्रमण दो प्रकार का तथा उसी प्रकार अप्रत्याख्यान दो प्रकार का जानना चाहिए,- इस उपदेश से आत्मा अकारक कहा गया है ।283।

अप्रतिक्रमण दो प्रकार का है- द्रव्य सम्बन्धी और भाव सम्बन्धी तथा इसी प्रकार अप्रत्याख्यान भी । इस उपदेश से आत्मा अकारक कहा गया है ।284।

जब तक आत्मा द्रव्य का और भाव का अप्रतिक्रमण तथा अप्रत्याख्यान करता है तब तक वह कर्ता होता है, ऐसा जानना चाहिए ।285।

अधःकर्म आदि जो यह पुदगलमयद्रव्य के दोष हैं, उनको ज्ञानी कैसे करे कि जो सदा परद्रव्य के गुण हैं ।286।

इसलिए अधःकर्म तथा उद्देशिक, ऐसा यह पुदगलमय द्रव्य है, वह मेरा किया कैसे हो कि जो सदा अचेतन कहा गया है ।287।

जैसे बन्धन में बहुत समय से बँधा हुआ कोई पुरुष उस बन्धन के तीव्र-मंद स्वभाव को और काल को जानता है- ।288।

किन्तु यदि उस बन्धन को स्वयं नहीं काटता, तो वह उससे मुक्त नही होता और बन्धनवश रहता हुआ बहुत काल में भी वह पुरष मुक्ति को प्राप्त नहीं करता ।289।

इसी प्रकार जीव कर्म-बन्धनों के प्रदेश, स्थिति, प्रकृति और अनुभाग को जानता हुआ भी मुक्त नही होता, किन्तु यदि वह स्वयं शुद्ध होता है तभी मुक्त होता है ।290।

जैसे बन्धनों से बँधा हुआ पुरुष बन्धों का विचार करने से मुक्ति को प्राप्त नहीं करता, इसी प्रकार जीव भी बन्धों का विचार करके मोक्ष को प्राप्त नहीं करता ।291।

जैसे बन्धनों से बँधा हुआ पुरुष बन्धनों को छेदकर मुक्ति को प्राप्त करता है, इसी प्रकार जीव भी बन्धों को छेदकर मोक्ष को प्राप्त करता है ।292।

बन्धों के स्वभाव को और आत्मा के स्वभाव को जानकर बन्धों के प्रति जो विरक्त होता है, वह कर्मों से मुक्त होता है ।293।

जीव तथा बन्ध नियत स्वलक्षणों से छेदे जाते हैं, प्रज्ञारूपी छैनी के द्वारा छेदे जाने पर वे नानात्व को प्राप्त होते हैं ।294।

इस प्रकार जीव और बन्ध अपने निश्चित स्वलक्षणों से छेदे जाते हैं । बन्ध को छेदना चाहिए और शुद्ध आत्मा को ग्रहण करना चाहिए ।295।

वह आत्मा कैसे ग्रहण किया जाए ?- प्रज्ञा के द्वारा वह आत्मा ग्रहण किया जाता है । जैसे प्रज्ञा के द्वारा भिन्न किया, उसी प्रकार प्रज्ञा के द्वारा ही ग्रहण करो ।296।

जो चैतन्यस्वरूप आत्मा है वह निश्चय से मैं हूँ- इस प्रकार प्रज्ञा के द्वारा ग्रहण करना चाहिए तथा शेष जो भाव हैं वे मुझसे पर हैं, ऐसा जानना चाहिए ।297।

जो द्रष्टा है वह निश्चय से मैं हूँ- इस प्रकार प्रज्ञा के द्वारा ग्रहण करना चाहिए तथा शेष जो भाव हैं वे मुझसे पर हैं, ऐसा जानना चाहिए ।298।

जो ज्ञाता है वह निश्चय से मैं हूँ- इस प्रकार प्रज्ञा के द्वारा ग्रहण करना चाहिए तथा शेष जो भाव हैं वे मुझसे पर हैं, ऐसा जानना चाहिए ।299।

सब भावों को पर जानकर, कौन ज्ञानी अपने को शुद्ध जानता हुआ, ‘यह मेरा है’, ऐसा वचन बोलेगा ।300।

जो पुरुष चोरी आदि के अपराध करता है, वह लोक में घूमता हुआ, ‘मुझे कोई चोर समझकर पकड़ न ले’, इस प्रकार शंकित होता हुआ घूमता है ।301।

जो पुरुष अपराध नहीं करता, वह लोक में निःशंक घूमता है, क्योंकि उसे बँधने की चिंता कभी भी उत्पन्न नहीं होती ।302।

इसी प्रकार अपराधी आत्मा ‘मैं अपराधी हूँ इसलिये बँधूँगा’, इस प्रकार शंकित होता है और यदि अपराध रहित हो तो ‘मैं नहीं बँधूँगा’, इस प्रकार निःशंक होता है ।303।

संसिद्धि, राध, सिद्ध, साधित और आराधित- ये एकार्थवाची शब्द हैं । जो आत्मा राध से रहित है, वह अपराध है ।304।

और जो आत्मा निरपराध है, वह निःशंक होता है ‘वह मैं ही हूँ’ ऐसा जानता हुआ सदा आराधना से वर्तता है ।305।

प्रतिक्रमण, प्रतिसरण, परिहार, धारणा, निवृत्ति, निन्दा, गर्हा और शुद्धि- यह आठ प्रकार का विषकुंभ है ।306।

अप्रतिक्रमण, अप्रतिसरण, अपरिहार, अधारणा, अनिवृत्ति, अनिन्दा, अगर्हा और अशुद्धि- यह अमृतकुंभ है ।307।

जो द्रव्य जिन गुणों से उत्पन्न होता है, उन गुणों से उसे अनन्य जानो । जैसे जगत में कड़ा आदि पर्यायों से सुवर्ण अनन्य है ।308।

जीव और अजीव के जो परिणाम सूत्र में बताए हैं, उन परिणामों से उस जीव अथवा अजीव को अनन्य जानो ।309।

क्योंकि किसी से भी उत्पन्न नहीं हुआ इसलिये वह आत्मा कार्य नहीं है और किसी को उत्पन्न नहीं करता इसलिये वह कारण भी नहीं है ।310।

नियम से कर्म के आश्रय से कर्ता होता है, और कर्ता के आश्रय से कर्म उत्पन्न होते हैं, अन्य किसी प्रकार से कर्ताकर्म की सिद्धि नहीं देखी जाती ।311।

आत्मा प्रकृति के निमित्त से उत्पन्न होता है और नष्ट होता है, और प्रकृति भी आत्मा के निमित्त से उत्पन्न होती है और नष्ट होती है ।312।

इस प्रकार परस्पर निमित्त से, आत्मा और प्रकृति दोनों का बन्ध होता है, और इससे संसार उत्पन्न होता है ।313।

जब तक यह आत्मा प्रकृति के निमित्त से विमुक्त नहीं होता, तब तक वह अज्ञायक है, मिथ्यादृष्टि है, असंयत है ।314।

जब आत्मा अनन्त कर्म फल से से विमुक्त होता है, तब वह ज्ञायक है, दर्शक है, मुनि है, विमुक्त है ।315।

अज्ञानी प्रकृति के स्वभाव में स्थित रहता हुआ कर्मफल को वेदता है और ज्ञानी तो उदित हुए कर्मफल को जानता है, वेदता है ।316।

भली-भाँति शास्त्रों को पढ़कर भी अभव्य जीव प्रकृति को नहीं छोड़ता, जैसे मीठे दूध को पीते हुए भी सर्प निर्विष नहीं होते ।317।

निर्वेद को प्राप्त ज्ञानी मीठे-कड़वे अनेक प्रकार के कर्मफल को जानता है, इसलिये वह आवेदक है ।318।

ज्ञानी बहुत प्रकार के कर्मों को न तो करता है और न भोगता ही है, किन्तु पुण्य और पापरूप बन्ध और कर्मफल को जानता है ।319।

दृष्टि के समान ज्ञान अकारक और आवेदक है, और बन्ध, मोक्ष, कर्मोदय और निर्जरा को जनता ही है ।320।

लोक के मत में देव, नारकी, तिर्यंच, मनुष्य प्राणियों को विष्णु करता है, और यदि श्रमणों के मंतव्य में भी छह काय के जीवों को आत्मा करता हो तो लोक और श्रमणों का एक ही सिद्धांत हो गया, कोई अंतर दिखाई नहीं देता, लोक के मत में विष्णु करता है और श्रमणों के मत में भी आत्मा करता है ।321-322।

इस प्रकार देव, मनुष्य और असुरलोक को सदा करते हुए ऐसे लोक और श्रमण दोनों का भी कोई मोक्ष दिखाई नहीं देता ।323।

जिन्होंने पदार्थ के स्वरूप को नहीं जाना है, ऐसे पुरुष व्यवहार के वचनों को ग्रहण करके ‘परद्रव्य मेरा है’, ऐसा कहते हैं, परंतु ज्ञानीजन निश्चय से जानते हैं कि ‘कोई परमाणुमात्र भी मेरा नहीं है’ ।324।

जैसे कोई मनुष्य ‘हमारा ग्राम, हमारा देश, हमारा नगर, हमारा राष्ट्र’, इस प्रकार कहता है, किन्तु वे उसके नहीं हैं, मोह से वह आत्मा ‘मेरा है’ इस प्रकार कहता है ।325।

इसी प्रकार जो ज्ञानी भी ‘परद्रव्य मेरा है’, ऐसा जानता हुआ परद्रव्य को निजरूप करता है, वह निःसन्देह मिथ्यादृष्टि होता है ।326।

इसलिए तत्वज्ञ ‘परद्रव्य मेरा नहीं है’, यह जानकर, लोक और श्रमण दोनों का परद्रव्य में कर्तृत्व के व्यवसाय को जानते हुए, यह जानते हैं कि यह व्यवसाय सम्यग्दर्शन से रहित पुरुषों का है ।327।

यदि मिथ्यात्व नामक प्रकृति आत्मा को मिथ्यादृष्टि करती है ऐसा माना जाए, तो तुम्हारे मत में अचेतन प्रकृति कर्ता हो गयी ।328।

अथवा यह जीव पुदगलद्रव्य के मिथ्यात्व को करता है, ऐसा माना जाए, तो पुदगलद्रव्य मिथ्यादृष्टि सिद्ध होगा, जीव नहीं ।329।

अथवा यदि जीव और प्रकृति दोनों पुदगलद्रव्य को मिथ्यात्वभावरूप करते हैं, ऐसा माना जाए, तो जो दोनों के द्वारा किया उसका फल दोनों भोगेंगे ।330।

अथवा यदि पुदगलद्रव्य को मिथ्यात्वभावरूप न तो प्रकृति करती है और न जीव करता है, ऐसा माना जाए, तो पुदगलद्रव्य स्वभाव से ही मिथ्यात्वभावरूप सिद्ध होगा । क्या यह वास्तव में मिथ्या नहीं है ।331।

कर्म से अज्ञानी होता है उसी प्रकार कर्म से ही ज्ञानी होता है, कर्म सुलाते हैं उसी प्रकार कर्म ही जगाते हैं ।332।

कर्म सुखी करते हैं उसी प्रकार कर्म दुःखी भी करते हैं, कर्म मिथ्यात्व को प्राप्त कराते हैं और कर्म असंयम को प्राप्त कराते हैं ।333।

कर्म उर्ध्वलोक, अधोलोक और तिर्यग्लोक में भ्रमण कराते हैं, जो कुछ भी जितना शुभ और अशुभ है वह सब कर्म ही करते हैं ।334।

इसलिये कर्म करता है, कर्म देता है, कर्म हर लेता है- इस प्रकार जो कुछ भी करता है वह कर्म ही करता है, इसलिये सभी जीव अकारक सिद्ध होते हैं ।335।

पुरुषकर्म स्त्री का अभिलाषी है और स्त्रीकर्म पुरुष का अभिलाषी है- ऐसी यह आचार्य परम्परा से आई हुई श्रुति है ।336।

इसलिये हमारे उपदेश में तो कोई भी जीव अब्रह्मचारी नहीं है, क्योंकि कर्म ही कर्म की अभिलाषा करता है ऐसा कहा है ।337।

जो पर को मारता है और पर के द्वारा मारा जाता है वह प्रकृति है- इस अर्थ में परघातनाम कर्म कहा जाता है ।338।

इसलिये हमारे उपदेश में कोई भी जीव उपघातक नहीं है, क्योंकि कर्म ही कर्म को मारता है ऐसा कहा है ।339।

इस प्रकार ऐसा साँख्य मत का उपदेश है जो श्रमण प्ररूपित करते हैं । उनके मत में प्रकृति ही करती है तथा आत्मा तो सर्व अकारक है ऐसा सिद्ध होता है ।340।

अथवा यदि तुम यह मानते हो कि ‘मेरा आत्मा अपने आत्मा को करता है’, तो ऐसा जानने वाले का तुम्हारा यह मिथ्यात्वभाव है ।341।

क्योंकि सिद्धांत में आत्मा को नित्य, असंख्यात्-प्रदेशी बताया गया है, उससे वह हीन या अधिक नहीं किया जा सकता ।342।

और विस्तार से भी जीव का जीवरूप निश्चय से लोकमात्र जानो, उससे क्या वह हीन या अधिक होता है ? तब फिर द्रव्य को कैसे करता है ।343।

अथवा ‘ज्ञायकभाव तो ज्ञानस्वभाव से स्थित रहता है’, यदि ऐसा माना जाए, तो इससे भी आत्मा स्वयं अपने आत्मा को नहीं करता यह सिद्ध होगा ।344।

क्योंकि जीव कितनी ही पर्यायों से नष्ट होता है और कितनी ही पर्यायों से नष्ट नहीं होता, इसलिए ‘वही करता है’ अथवा ‘दूसरा ही करता है’ ऐसा एकांत नहीं है ।345।

क्योंकि जीव कितनी ही पर्यायों से नष्ट होता है और कितनी ही पर्यायों से नष्ट नहीं होता, इसलिए ‘वही भोगता है’ अथवा ‘दूसरा ही भोगता है’ ऐसा एकांत नहीं है ।346।

‘जो करता है वही नहीं भोगता’ ऐसा जिसका सिद्धांत है, वह जीव मिथ्यादृष्टि, अनार्हत जानना चाहिए ।347।

‘दूसरा करता है और दूसरा भोगता है’ ऐसा जिसका सिद्धांत है, वह जीव मिथ्यादृष्टि, अनार्हत जानना चाहिए ।348।

जैसे शिल्पी कुण्डल आदि कर्म करता है परन्तु वह तन्मय नहीं होता, उसी प्रकार जीव भी पुदगलकर्म करता है परन्तु तन्मय नहीं होता ।349।

जैसे शिल्पी हथौड़ा आदि करणों के द्वारा कर्म करता है परन्तु वह तन्मय नहीं होता, उसी प्रकार जीव भी करणों के द्वारा कर्म करता है परन्तु तन्मय नहीं होता ।350।

जैसे शिल्पी करणों को ग्रहण करता है परन्तु वह तन्मय नहीं होता, उसी प्रकार जीव भी करणों को ग्रहण करता है परन्तु तन्मय नहीं होता ।351।

जैसे शिल्पी उस कर्म के फल को भोगता है परन्तु वह तन्मय नहीं होता, उसी प्रकार जीव भी कर्मफल को भोगता है परन्तु तन्मय नहीं होता ।352।

इस प्रकार तो व्यवहार का मत संक्षेप में कहने योग्य है । अब निश्चय का वचन सुनो जो कि परिणाम विषयक है ।353।

जैसे शिल्पी चेष्टरूप कर्म करता है और उससे अनन्य है, उसी प्रकार जीव भी कर्म को करता है और उससे अनन्य है ।354।

जैसे चेष्टा करता हुआ शिल्पी नित्य दुःखी होता है और दुःख से अनन्य है, उसी प्रकार चेष्टा करता हुआ जीव भी दुःखी होता है ।355।

जैसे सेटिका (पोतने का चूना) पर की (दीवार आदि की) नहीं है, वह सेटिका तो सेटिका ही है, उसी प्रकार ज्ञायक पर का नहीं है, वह ज्ञायक तो ज्ञायक ही है ।356।

जैसे सेटिका पर की नहीं है, वह सेटिका तो सेटिका ही है, उसी प्रकार दर्शक पर का नहीं है, वह दर्शक तो दर्शक ही है ।357।

जैसे सेटिका पर की नहीं है, वह सेटिका तो सेटिका ही है, उसी प्रकार संयत पर का नहीं है, वह संयत तो संयत ही है ।358।

जैसे सेटिका पर की नहीं है, वह सेटिका तो सेटिका ही है, उसी प्रकार दर्शन पर का नहीं है, वह दर्शन तो दर्शन ही है ।359।

इस प्रकार ज्ञान-दर्शन-चारित्र में निश्चय नय का कथन है, और उस सम्बन्ध में संक्षेप से व्यवहारनय का कथन सुनो ।360।

जैसे सेटिका अपने स्वभाव से परद्रव्य को सफेद करती है, उसी प्रकार ज्ञाता भी अपने स्वभाव से परद्रव्य को जानता है ।361।

जैसे सेटिका अपने स्वभाव से परद्रव्य को सफेद करती है, उसी प्रकार जीव भी अपने स्वभाव से परद्रव्य को देखता है ।362।

जैसे सेटिका अपने स्वभाव से परद्रव्य को सफेद करती है, उसी प्रकार ज्ञाता भी अपने स्वभाव से परद्रव्य को त्यागता है ।363।

जैसे सेटिका अपने स्वभाव से परद्रव्य को सफेद करती है, उसी प्रकार सम्यग्दृष्टि अपने स्वभाव से परद्रव्य को श्रद्धान करता है ।364।

इस प्रकार ज्ञान-दर्शन-चारित्र में व्यवहारनय का निर्णय कहा है, अन्य पर्यायों में भी इसी प्रकार जानना चाहिए ।365।

दर्शन-ज्ञान-चारित्र अचेतन विषय में किंचित् मात्र भी नहीं है, इसलिये आत्मा उन विषयों में क्या घात करेगा ।366।

दर्शन-ज्ञान-चारित्र अचेतन कर्म में किंचित् मात्र भी नहीं है, इसलिये आत्मा उन कर्म में क्या घात करेगा ।367।

दर्शन-ज्ञान-चारित्र अचेतन काया में किंचित् मात्र भी नहीं है, इसलिये आत्मा उन कायों में क्या घात करेगा ।368।

ज्ञान का, दर्शन का और चारित्र का घात कहा है, वहाँ पुदगलद्रव्य का घात किंचित् मात्र भी नहीं कहा है ।369।

जो कोई जीव के गुण हैं, वे वास्तव में परद्रव्य में नहीं हैं, इसलिये सम्यग्दृष्टि के विषयों के प्रति राग नहीं है ।370।

और राग, द्वेष और मोह जीव के ही अनन्य परिणाम हैं, इस कारण से रागादिक शब्दादि विषयों में भी नहीं है ।371।

अन्य द्रव्य से अन्य द्रव्य की उत्पत्ति नहीं की जा सकती, अतः सर्व द्रव्य अपने आप स्वभाव से उत्पन्न होते हैं ।372।

बहुत प्रकार के निन्दा के और स्तुति के वचनरूप पुदगल परिणमित होते हैं, उन्हें सुनकर अज्ञानी जीव ‘मुझसे कहा’ ऐसा मानकर रोष और संतोष करता है ।373।

पुदगलद्रव्य शब्दरूप से परिणमित हुआ है, उसका गुण यदि अन्य है, तो तुझसे कुछ भी नहीं कहा, तू अज्ञानी होता हुआ क्यों रोष करता है ।374।

अशुभ अथवा शुभ शब्द तुझसे यह नहीं कहता कि ‘तू मुझे सुन’ और आत्मा भी श्रोत्र के विषय में आये हुए शब्द को ग्रहण करने को नहीं जाता ।375।

अशुभ अथवा शुभ रूप तुझसे यह नहीं कहता कि ‘तू मुझे देख’ और आत्मा भी चक्षु के विषय में आये हुए रूप को ग्रहण करने को नहीं जाता ।376।

अशुभ अथवा शुभ गन्ध तुझसे यह नहीं कहती कि ‘तू मुझे सूंघ’ और आत्मा भी घ्राण के विषय में आयी हुई गन्ध को ग्रहण करने को नहीं जाता ।377।

अशुभ अथवा शुभ रस तुझसे यह नहीं कहता कि ‘तू मुझे चख’ और आत्मा भी रसना के विषय में आये हुए रस को ग्रहण करने को नहीं जाता ।378।

अशुभ अथवा शुभ स्पर्श तुझसे यह नहीं कहता कि ‘तू मुझे स्पर्श कर’ और आत्मा भी काय के विषय में आये हुए स्पर्श को ग्रहण करने को नहीं जाता ।379।

अशुभ अथवा शुभ गुण तुझसे यह नहीं कहता कि ‘तू मुझे जान’ और आत्मा भी बुद्धि के विषय में आये हुए गुण को ग्रहण करने को नहीं जाता ।380।

अशुभ अथवा शुभ द्रव्य तुझसे यह नहीं कहता कि ‘तू मुझे जान’ और आत्मा भी बुद्धि के विषय में आये हुए द्रव्य को ग्रहण करने को नहीं जाता ।381।

ऐसा जानकर भी मूढ़ जीव उपशम को प्राप्त नहीं होता, और शिव बुद्धि को न प्राप्त हुआ स्वयं पर को ग्रहण करने का मन करता है ।382।

पूर्वकृत जो अनेक प्रकार के विस्तारवाला शुभाशुभ कर्म है उससे जो आत्मा अपने को दूर रखता है, वह आत्मा प्रतिक्रमण है ।383।

भविष्य काल का जो शुभाशुभ कर्म जिस भाव में बँधता है उस भाव से जो आत्मा निवृत्त होता है, वह आत्मा प्रत्याख्यान है ।384।

वर्तमान काल में उदयागत जो अनेक प्रकार के विस्तारवाला शुभाशुभ कर्म है उस दोष को जो आत्मा अनुभव करता है, वह आत्मा वास्तव में आलोचना है ।385।

जो सदा प्रत्याख्यान करता है, सदा प्रतिक्रमण करता है और सदा आलोचना करता है, वह आत्मा वास्तव में चारित्र है ।386।

कर्मफल का वेदन करता हुआ जो आत्मा कर्मफल को निजरूप करता है, वह फिर से भी आठ प्रकार के कर्म को- दुःख के बीज को बाँधता है ।387।

कर्मफल का वेदन करता हुआ जो आत्मा कर्मफल को ‘मैंने किया’ ऐसा जानता है, वह फिर से भी आठ प्रकार के कर्म को- दुःख के बीज को बाँधता है ।388।

कर्मफल का वेदन करता हुआ जो आत्मा सुखी और दुःखी होता है, वह फिर से भी आठ प्रकार के कर्म को- दुःख के बीज को बाँधता है ।389।

शास्त्र ज्ञान नहीं है क्योंकि शास्त्र कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और शास्त्र अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।390।

शब्द ज्ञान नहीं है क्योंकि शब्द कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और शब्द अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।391।

रूप ज्ञान नहीं है क्योंकि रूप कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और रूप अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।392।

वर्ण ज्ञान नहीं है क्योंकि वर्ण कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और वर्ण अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।393।

गन्ध ज्ञान नहीं है क्योंकि गन्ध कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और गन्ध अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।394।

रस ज्ञान नहीं है क्योंकि रस कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और रस अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।395।

स्पर्श ज्ञान नहीं है क्योंकि स्पर्श कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और स्पर्श अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।396।

कर्म ज्ञान नहीं है क्योंकि कर्म कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और कर्म अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।397।

धर्म ज्ञान नहीं है क्योंकि धर्म कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और धर्म अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।398।

अधर्म ज्ञान नहीं है क्योंकि अधर्म कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और अधर्म अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।399।

काल ज्ञान नहीं है क्योंकि काल कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और काल अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।400।

आकाश भी ज्ञान नहीं है क्योंकि आकाश कुछ जानता नहीं, अतः ज्ञान अन्य है और आकाश अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।401।

अध्यवसान ज्ञान नहीं है क्योंकि अध्यवसान अचेतन है, अतः ज्ञान अन्य है और अध्यवसान अन्य है- ऐसा जिनदेव कहते हैं ।402।

क्योंकि जीव निरंतर जानता है अतः वह ज्ञायक जीव ज्ञानी है, और ज्ञान ज्ञायक से अभिन्न है ऐसा जानना चाहिए ।403।

बुद्ध पुरुष ज्ञान को ही सम्यग्दृष्टि, संयम, अंगपूर्वगत सूत्र और धर्म-अधर्म तथा दीक्षा मानते हैं ।404।

इस प्रकार जिसका आत्मा अमूर्त है, वह वास्तव में आहारक नहीं है, आहार तो मूर्त है क्योंकि वह पुदगलमय है ।405।

जो परद्रव्य है वह ग्रहण नहीं किया जा सकता और छोड़ा नहीं जा सकता, ऐसा ही कोई उस आत्मा का प्रायोगिक तथा स्वाभाविक गुण है ।406।

इसलिये जो विशुद्ध आत्मा है वह जीव और अजीव द्रव्यों में कुछ भी ग्रहण नहीं करता तथा कुछ भी त्याग नहीं करता ।407।

बहुत प्रकार के मुनिलिंगों को अथवा गृहीलिंगों को ग्रहण करके मूढ़ जन यह कहते हैं कि ‘यह लिंग मोक्षमार्ग है’ ।408।

परन्तु लिंग मोक्षमार्ग नहीं है, क्योंकि अर्हन्तदेव देह के प्रति निर्मम वर्तते हुए लिंग को छोड़कर दर्शन-ज्ञान-चरित्र का ही सेवन करते हैं ।409।

मुनियों और गृहस्थ के लिंग- यह मोक्षमार्ग नहीं है, दर्शन-ज्ञान-चरित्र को जिनदेव मोक्षमार्ग कहते हैं ।410।

इसलिये गृहस्थों द्वारा अथवा मुनियों के द्वारा ग्रहण किये गए लिंगों को छोड़कर दर्शन-ज्ञान-चरित्र में, जो कि मोक्षमार्ग है, उसमें आत्मा को लगा ।411।

मोक्षमार्ग में अपने आत्मा को स्थापित कर, उसी का ध्यान कर, उसी को अनुभव कर और उसी में निरंतर विहार कर, अन्य द्रव्यों में विहार मत कर ।412।

जो बहुत प्रकार के मुनिलिंगों में अथवा गृहस्थलिंगों में ममता करते हैं, उन्होंने समयसार को नहीं जाना ।413।

व्यवहारनय दोनों लिंगों को मोक्षमार्ग में कहता है, निश्चयनय सभी लिंगों को मोक्षमार्ग में नहीं मानता ।414।

जो आत्मा इस समयप्राभृत को पढ़कर, अर्थ और तत्त्व से जानकर, उसके अर्थ में स्थित होगा, वह उत्तम सौख्यस्वरूप होगा ।415।

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