तत्त्वार्थसूत्र

प्रथम अध्याय

सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञान और सम्यक्-चारित्र- ये मोक्ष का मार्ग है ।1।

तत्त्व के स्वरूप सहित अर्थ की श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन है ।2।

वह स्वभाव से अथवा दूसरे के उपदेशादि से उत्पन्न होता है ।3।

जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष- ये सात तत्त्व हैं ।4।

नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव से उनका लोक व्यवहार होता है ।5।

उनका ज्ञान प्रमाण और नय से होता है ।6।

निर्देश, स्वामित्व, साधन, अधिकरण, स्थिति और विधान से भी ।7।

और सत्, संख्या, क्षेत्र, स्पर्शन, काल, अन्तर, भाव, और अल्पबहुत्व- इन आठ अनुयोगों द्वारा भी ।8।

मतिज्ञान, श्रुतज्ञान, अवधिज्ञान, मनःपर्यायज्ञान और केवलज्ञान- ये पाँच ज्ञान हैं ।9।

ये ही प्रमाण हैं ।10।

प्रारम्भ के दो परोक्ष हैं ।11।

शेष तीन प्रत्यक्ष हैं ।12।

मति, स्मृति, संज्ञा, चिन्ता, अभिनिबोध आदि मतिज्ञान के ही नामान्तर हैं ।13।

इन्द्रियाँ और मन उस मतिज्ञान के निमित्त हैं ।14।

अवग्रह, ईहा, अवाय, और धारणा- मतिज्ञान के भेद हैं ।15।

बहु, बहुविध, क्षिप्र, अनिःसृत, अनुक्त, ध्रुव तथा इनके विलोम ।16।

ये बारह अर्थ के भेद हैं ।17।

अप्रगटरूप पदार्थ का मात्र अवग्रह ज्ञान होता है ।18।

नेत्र और मन से नहीं होता ।19।

श्रुतज्ञान मतिज्ञान के बाद होता है, जो कि दो, अनेक और बारह भेद वाला है ।20।

भवप्रत्यय नामक अवधिज्ञान देव और नारकियों को होता है ।21।

क्षय-उपशम निमित्त वाला अवधिज्ञान छह विकल्पों वाला है जो अन्य सभी को होता है ।22।

मनःपर्यायज्ञान ऋजुमति और विपुलमति दो प्रकार का है ।23।

विशुद्धि और अप्रतिपात से ही ऋजुमति और विपुलमति में विशेषता है ।24।

अवधि और मनःपर्याय में विशुद्धता, क्षेत्र, स्वामी और विषय की अपेक्षा से विशेषता होती है ।25।

मति और श्रुत का विषय-सम्बन्ध कुछ पर्यायों से युक्त सभी द्रव्यों में है ।26।

अवधिज्ञान का विषय-सम्बन्ध रूपी द्रव्यों में है ।27।

इसके अनन्तवें भाग में मनःपर्याय का विषय-सम्बन्ध है ।28।

केवलज्ञान का विषय-सम्बन्ध सर्व द्रव्य और सर्व पर्याय हैं ।29।

एक जीव में एक साथ एक से लेकर चार ज्ञान तक हो सकते हैं ।30।

मति, श्रुत और अवधि- ये विपर्यय भी होते हैं ।31।

अपनी इच्छा से चाहे जैसा ग्रहण करने के कारण सत् और असत् का भेद न होने से किसी उन्मत्त के जैसा ज्ञान विपरीत ज्ञान है ।32।

नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़, एवंभूत- यह सात नय हैं ।33।

द्वितीय अध्याय

औपशमिक, क्षायिक और मिश्र तथा औदयिक और पारिणामिक- ये भाव जीव के निजभाव हैं ।1।

ये क्रमशः दो, नौ, अठारह, इक्कीस और तीन भेद वाले हैं ।2।

सम्यकत्व और चारित्र- यह दो भेद ।3।

और ज्ञान, दर्शन, दान, लाभ, भोग, उपभोग, वीर्य- यह मिलाकर नौ भेद ।4।

ज्ञान, अज्ञान, दर्शन और लब्धियाँ- इनके क्रमशः चार, तीन, तीन और पाँच भेद तथा सम्यकत्व, चारित्र और संयम-असंयम- यह अठारह भेद ।5।

गति, कषाय, लिंग, मिथ्यादर्शन, अज्ञान, असंयम, असिद्धत्व और लेश्या- इनके क्रमशः चार, चार, तीन, एक, एक, एक, एक, और छह भेद- यह इक्कीस भेद ।6।

जीवत्व, भव्यत्व और अभव्यत्व- इस प्रकार तीन भेद ।7।

जीव का लक्षण ‘उपयोग’ है ।8।

वह दो प्रकार का और वे प्रकार भी क्रमशः आठ और चार प्रकार के हैं ।9।

जीव संसारी और मुक्त दो प्रकार के हैं ।10।

संसारी जीव मनसहित और मनरहित हैं ।11।

संसारी जीव त्रस और स्थावर हैं ।12।

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति- ये स्थावर हैं ।13।

दो और अधिक इन्द्रियों वाले त्रस हैं ।14।

इन्द्रियाँ पाँच हैं ।15।

जो कि दो प्रकार की हैं ।16।

निवृत्ति और उपकरण द्रव्य इन्द्रिय हैं ।17।

लब्धि और उपयोग भाव इन्द्रिय हैं ।18।

स्पर्शन, रसना, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र- यह पाँच इन्द्रियाँ हैं ।19।

स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण और शब्द उनके विषय हैं ।20।

मन का प्रयोजन श्रुतज्ञान है ।21।

वनस्पति तक के जीवों के एक ही इन्द्रिय होती है ।22।

कृमि, चींटी, भ्रमर तथा मनुष्य इत्यादि में क्रमशः एक-एक इन्द्रिय बढ़ती है ।23।

मनसहित जीवों को संज्ञी कहते हैं ।24।

नए शरीर के लिए गमन में कर्मशरीरयोग होता है ।25।

गमन श्रेणी के अनुसार ही होता है ।26।

मुक्त जीव की गति वक्रता रहित सीधी होती है ।27।

संसारी जीव की गति चार समय से पहले वक्रता सहित और रहित होती है ।28।

वक्रता रहित गति एक समय मात्र ही होती है ।29।

एक, दो अथवा तीन समय तक जीव अनाहारक रहता है ।30।

सम्मूर्च्छन, गर्भ और उपपाद तीन प्रकार का जन्म होता है ।31।

सचित्त, अचित्त, सचित्ताचित्त, शीत, उष्ण, शीतोष्ण, संवृत, विवृत, संवृतविवृत – ये नौ जन्म योनियाँ हैं ।32।

जरायुज, अण्डज और पोतज- इन तीन प्रकार के जीवों के गर्भजन्म होता है ।33।

देव और नारकी जीवों के उपपाद जन्म होता है ।34।

शेष जीवों के सम्मूर्च्छन जन्म होता है ।35।

औदारिक, वैक्रियिक, आहारक, तैजस और कार्मण- ये पाँच शरीर हैं ।36।

जो क्रमशः सूक्ष्म-सूक्ष्म होते जाते हैं ।37।

प्रदेशों की अपेक्षा से तैजस शरीर के पहले के शरीर असंख्यात्गुने हैं ।38।

शेष दो शरीर अनन्तगुने प्रदेश वाले हैं ।39।

तैजस और कार्मण शरीर बाधारहित हैं ।40।

और ये दोनों शरीर आत्मा के साथ अनादिकाल से सम्बन्ध वाले हैं ।41।

ये सब जीवों के होते हैं ।42।

इनसे प्रारम्भ करते हुए एक साथ एक जीव के चार शरीर तक जानना चाहिए ।43।

अन्त का कार्मण शरीर उपभोगरहित होता है ।44।

गर्भ और सम्मूर्च्छन जन्म से उत्पन्न होने वाला पहला औदारिक शरीर है ।45।

उपपाद जन्म वाले वैक्रियिक होते हैं ।46।

वैक्रियिक शरीर लब्धि-नैमित्तिक भी होता है ।47।

तैजस शरीर भी ।48।

आहारक शरीर शुभ, विशुद्ध और व्याघातरहित है तथा जो प्रमत्तसंयत मुनि के ही होता है ।49।

नारकी और सम्मूर्च्छन जन्म वाले नपुंसक होते हैं ।50।

देव नपुंसक नहीं होते ।51।

और शेष तीनों तरह के होते हैं ।52।

उपपाद जन्म वाले, चरम उत्तम देह वाले तथा असंख्यात् वर्ष आयु वाले जीवों की आयु अपवर्तन रहित होती है ।53।

तृतीय अध्याय

अधोलोक में रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमप्रभा और महातमप्रभा- ये सात भूमियाँ हैं और क्रम से नीचे-नीचे घनोदधि, घन और तनु- ये तीन वायुवलय और आकाश का आधार है ।1।

उन पृथ्वियों में क्रमशः तीस लाख, पच्चीस लाख, पन्द्रह लाख, दस लाख, तीन लाख, पाँच कम एक लाख और सातवीं में पाँच नरक बिल हैं ।2।

नारकी जीव सदैव ही अत्यन्त अशुभ लेश्या, परिणाम, शरीर, वेदना और विक्रिया को धारण करते हैं ।3।

नारकी जीव परस्पर दुःख उत्पन्न करते हैं ।4।

चौथी पृथ्वी के पहले अत्यन्त संक्लिष्ट परिणाम के धारक असुरकुमारों के द्वारा दुःख पाते हैं ।5।

उनमें नारकी जीवों की उत्कृष्ट आयुस्थिति क्रमशः एक सागर, तीन सागर, सात सागर, दस सागर, सत्रह सागर, बाइस सागर और सातवें में तेतीस सागर है ।6।

इस मध्य लोक में अच्छे-अच्छे नाम वाले जम्बूद्वीप इत्यादि द्वीप और लवणसमुद्र इत्यादि समुद्र हैं ।7।

प्रत्येक द्वीप-समुद्र दूने-दूने विस्तार वाले और पहले-पहले के द्वीप-समुद्रों को घेरे हुए वलयाकार हैं ।8।

उन सब द्वीपसमूहों के बीच में जम्बूद्वीप है, उसकी नाभि के समान सुदर्शन मेरु है, तथा जम्बूद्वीप थाली के समान गोल है और एक लाख योजन उसका विस्तार है ।9।

इस जम्बूद्वीप में भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत- ये सात क्षेत्र हैं ।10।

उन सात क्षेत्रों का विभाग करने वाले पूर्व से पश्चिम तक लम्बे हिमवत, महामहिमवत, निषध, नील, रुक्मि और शिखरन- ये छह वर्षधर पर्वत हैं ।11।

ये पर्वत क्रमशः स्वर्ण, चाँदी, तपाया सोना, नीलमणि, चाँदी और स्वर्ण जैसे रंग के हैं ।12।

इन पर्वतों का तट चित्र-विचित्र मणियों का है और ऊपर-नीचे तथा मध्य में एक समान विस्तार वाला है ।13।

इन पर्वतों के ऊपर क्रम से पद्म, महापद्म, तिगिञ्छ, केशरि, महापुण्डरीक और पुण्डरीक नाम के हृद सरोवर हैं ।14।

पहला पद्म सरोवर एक हजार योजन लम्बा और लम्बाई का आधा चौड़ा है ।15।

यह दस योजन गहराई वाला है ।16।

उसके बीच में एक योजन विस्तार वाला कमल है ।17।

आगे के सरोवर तथा कमल पहले के सरोवरों तथा कमलों से क्रम से दूने-दूने विस्तार वाले हैं ।18।

एक पल्योपम आयु वाली और सामानिक तथा पारिषद जाति के देवों सहित श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नाम की देवियाँ क्रम से उन सरोवरों के कमलों पर निवास करती हैं ।19।

गंगा-सिंधु, रोहित-रोहितास्या, हरित-हरिकान्ता, सीता-सीतोदा, नारी-नरकान्ता, स्वर्णकूला-रूप्यकूला और रक्ता-रक्तोदा – इस प्रकार सात क्षेत्रों में चौदह नदियाँ बीच में बहती हैं ।20।

हर एक दो के समूह में से पहली नदी पूर्व की ओर बहती है ।21।

शेष पश्चिम की ओर जाती हैं ।22।

गंगा-सिन्धु आदि नदियों के युगल चौदह हजार सहायक नदियों से घिरे हुए हैं ।23।

भरत क्षेत्र का विस्तार, पाँच सौ छब्बीस योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में से छह भाग अधिक है ।24।

विदेह क्षेत्र तक के पर्वत और क्षेत्र, भरतक्षेत्र से दूने-दूने विस्तार वाले हैं ।25।

विदेह क्षेत्र से उत्तर के तीन पर्वत और तीन क्षेत्र, दक्षिण के पर्वत और क्षेत्रों के समान विस्तार वाले हैं ।26।

छह कालों से युक्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के द्वारा भरत और ऐरावत क्षेत्र में वृद्धि और ह्रास होते रहते हैं ।27।

इन्हें छोड़कर अन्य क्षेत्रों में एक ही अवस्था रहती है ।28।

हैमवतक, हारिवर्षक और देवकुरु के मनुष्य क्रम से एक पल्य, दो पल्य और तीन पल्य की आयु वाले होते हैं ।29।

वैसी ही उत्तर के क्षेत्रों में भी ।30।

विदेह क्षेत्रों में आयु संख्यात वर्ष की होती है ।31।

भरत क्षेत्र का विस्तार जम्बूद्वीप के एक सौ नब्बेवाँ भाग के बराबर है ।32।

धातकीखण्ड द्वीप में सब दूना-दूना है ।33।

पुष्करार्द्ध द्वीप में भी ।34।

मानुषोत्तर पर्वत तक मनुष्य होते हैं ।35।

आर्य और म्लेच्छ के भेद से मनुष्य दो प्रकार के हैं ।36।

भरत, ऐरावत और विदेह में से देवकुरु और उत्तरकुरु को छोड़कर ये कर्मभूमियाँ हैं ।37।

मनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है ।38।

उसी प्रकार तिर्यक् योनि वालों की भी ।39।

चतुर्थ अध्याय

देव चार समूहों वाले हैं- भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और वैमानिक ।1।

पहले के तीन निकायों में लेश्याएँ पीले रंग तक होती हैं ।2।

कल्पोपपन्न पर्यन्त इन चार प्रकार के देवों के क्रम से दस, आठ, पाँच और बारह भेद हैं ।3।

चार प्रकार के देवों में हर एक के दस भेद हैं- इन्द्र, सामानिक, त्रायस्त्रिंश, पारिषद, आत्मरक्ष, लोकपाल, अनीक, प्रकीर्णक, अभियोग्य और किल्विषिक ।4।

त्रायस्त्रिंश और लोकपाल- ये भेद व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में नहीं होते ।5।

भवनवासी और व्यन्तरों में प्रत्येक भेद में दो-दो इन्द्र होते हैं ।6।

ईशान कल्प तक के देव मनुष्यों की भाँति शरीर से काम-सेवन करते हैं ।7।

शेष स्वर्ग के देव, देवियों के स्पर्श से, रूप देखने से, शब्द सुनने से और मन के विचारों से काम सेवन करते हैं ।8।

सोलहवें स्वर्ग के आगे के देव काम सेवन रहित हैं ।9।

भवनवासी देवों के दस भेद हैं- असुर, नाग, विद्युत, सुपर्ण, अग्नि, वात, स्तनित, उदधि, द्वीप और दिक्कुमार ।10।

व्यन्तर देवों के आठ भेद हैं- किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गंधर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और पिशाच ।11।

ज्योतिषी देवों के पाँच भेद हैं- सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र, प्रकीर्णक तारे ।12।

ज्योतिषी देव मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देते हुए मनुष्यलोक में हमेशा गमन करते हैं ।13।

कालव्यवहार का विभाग ज्योतिषी देवों के द्वारा किया जाता है ।14।

मनुष्यलोक के बाहर के ज्योतिषी देव स्थिर हैं ।15।

अब वैमानिक देव ।16।

इनके दो भेद हैं- कल्पोपपन्न और कल्पतीत ।17।

क्रम से ऊपर-ऊपर हैं ।18।

सौधर्म-ईशान, सानत्कुमार-माहेन्द्र, ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर, लान्तव-कापिष्ठ, शुक्र-महाशुक्र, शतार-सहस्त्रार इन छह युगलों के बारह स्वर्गों में, आनत-प्राणत इन दो स्वर्गों में, आरण-अच्युत इन दो स्वर्गों में, नव ग्रैवेयक विमानों में, नव अनुदिश विमानों में और विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धि इन पाँच अनुत्तर विमानों में वैमानिक देव रहते हैं ।19।

आयु, प्रभाव, सुख, द्युति, लेश्या की विशुद्धि, इन्द्रियों का विषय और अवधिज्ञान का विषय- ये सब ऊपर-ऊपर के विमानों में अधिक हैं ।20।

गति, शरीर, परिग्रह और अभिमान की अपेक्षा से ऊपर-ऊपर के वैमानिक देव हीन-हीन होते हैं ।21।

दो युगलों में पीत, तीन युगलों में पद्म, और बाकी के सब विमानों में शुक्ल लेश्या होती है ।22।

ग्रैवेयकों से पहले के सोलह स्वर्गों को कल्प कहते हैं ।23।

जिनका निवास ब्रह्मलोक है उन्हें लौकान्तिक कहते हैं ।24।

लौकान्तिक देवों के आठ भेद हैं- सारस्वत, आदित्य, वह्नि, अरुण, गर्दयोत, तुषित, अव्याबाध और अरिष्ट ।25।

विजय आदि देव दो जन्म धारण करके अवश्य ही मोक्ष जाते हैं ।26।

उपपाद जन्म वाले और मनुष्यों के अतिरिक्त शेष तिर्यक् योनि वाले ही हैं ।27।

भवनवासी देवों में असुर, नाग, सुपर्ण और द्वीपकुमार और बाकी के कुमारों की आयु क्रम से एक सागर, तीन पल्य, अढ़ाई पल्य, दो पल्य और डेढ़ पल्य है ।28।

सौधर्म और ईशान स्वर्ग के देवों की आयु दो सागर से कुछ अधिक है ।29।

सानत्कुमार और माहेन्द्र देवों की आयु सात सागर से कुछ अधिक है ।30।

पूर्व में कहे गए युगलों की आयु (सात सागर) से क्रमपूर्वक तीन, सात, नव, ग्यारह, तेरह और पन्द्रह सागर अधिक आयु उसके बाद के स्वर्गों में है ।31।

अरुण और अच्युत के ऊपर के नव ग्रैवेयकों में, नव अनुदिशों में, विजय इत्यादि विमानों में और सर्वार्थसिद्धि विमानों में देवों की आयु एक एक सागर अधिक है ।32।

जघन्य आयु एक पल्य से कुछ अधिक है ।33।

जो पहले-पहले के युगलों की उत्कृष्ट आयु है वह पीछे-पीछे के युगलों की जघन्य आयु होती है ।34।

दूसरे इत्यादि नरक के नारकियों की जघन्य आयु भी देवों की जघन्य आयु के समान है ।35।

पहले नरक के नारकियों की जघन्य आयु दस हजार वर्ष की है ।36।

भवनवासी देवों की भी ।38।

व्यन्तर देवों की उत्कृष्ट आयु एक पल्योपम से कुछ अधिक है ।39।

और ज्योतिषी देवों की भी ।40।

ज्योतिषी देवों की जघन्य आयु एक पल्योपम के आठवें भाग है ।41।

समस्त लौकान्तिक देवों की उत्कृष्ट तथा जघन्य आयु आठ सागर की है ।42।

पञ्चम अध्याय

धर्म, अधर्म, आकाश और पुदगल- ये अजीव तथा बहु प्रदेशी हैं ।1।

ये द्रव्य हैं ।2।

जीव भी द्रव्य है ।3।

चार अरूप, नित्य और अवस्थित हैं ।4।

पुदगल रूपी है ।5।

धर्म, अधर्म और आकाश एक-एक हैं ।6।

और निष्क्रिय हैं ।7।

धर्म, अधर्म और एक जीव के असंख्यात् प्रदेश हैं ।8।

आकाश के अनन्त प्रदेश हैं ।9।

पुदगलों के संख्यात, असंख्यात् और अनन्त प्रदेश हैं ।10।

पुदगल परमाणु एक प्रदेशी है ।11।

इन सब द्रव्यों का अवगाह लोकाकाश में है ।12।

धर्म और अधर्म समस्त लोकाकाश में व्याप्त हैं ।13।

पुदगल का अवगाह एक प्रदेश से लेकर असंख्यात् पर्यन्त विभाग योग्य है ।14।

जीवों का अवगाह असंख्यात् भाग से लेकर सम्पूर्ण लोक क्षेत्र में है ।15।

दीप के प्रकाश की भाँति प्रदेशों के संकोच और विस्तार के द्वारा जीव लोकाकाश के असंख्यातादिक भागों में रहता है ।16।

गति और स्थिति को प्राप्त होने में क्रम से धर्म और अधर्म का ही उपकार है ।17।

अवकाश-स्थान आकाश का उपकार है ।18।

शरीर, वचन, मन तथा श्वासोच्छ्वास ये पुदगल के उपकार हैं ।19।

सुख-दुःख और जीवन-मरण भी पुदगल का उपकार है ।20।

जीवों का परस्पर सहयोग में उपकार है ।21।

वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व काल के उपकार हैं ।22।

स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण वाले पुदगल हैं ।23।

शब्द, बन्ध, सूक्ष्मता, स्थूलता, आकार, भेद, अन्धकार, छाया, आतप और उद्योत आदि भी पुदगल की पर्यायें हैं ।24।

पुदगल अणु और स्कन्ध के भेद से दो प्रकार का है ।25।

भेद संघात दोनों से स्कन्ध की उत्पत्ति होती है ।26।

अणु की उत्पत्ति भेद से होती है ।27।

भेद-संघात से उत्पन्न स्कन्ध चक्षु से देखे जाने योग्य है ।28।

द्रव्य का लक्षण ‘सत्’ है ।29।

जो उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य सहित हो वह सत् है ।30।

तद्भाव से जो अव्यय है- नाश नहीं होता, वह नित्य है ।31।

प्रधानता और गौणता से पदार्थों की सिद्धि होती है ।32।

स्निग्धता और रुक्षता के कारण बन्ध होता है ।33।

जघन्य गुण सहित परमाणुओं का बन्ध नहीं होता ।34।

गुणों की समानता हो तब समान जाति वाले परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता ।35।

दो अधिक गुण हों इस तरह के गुण वाले के साथ ही बन्ध होता है ।36।

और बन्धरूप अवस्था में अधिक गुण वाले के परमाणुओं जितने गुण रूप में कम गुण वाले परमाणुओं का परिणमन होता है ।37।

गुण-पर्याय वाला द्रव्य है ।38।

काल भी द्रव्य है ।39।

वह काल अनन्त समय वाला है ।40।

जो द्रव्य के आश्रय से हों और स्वयं दूसरे गुणों से रहित हों वे गुण हैं ।41।

जो द्रव्य का स्वभाव है वह परिणाम है ।42।

षष्ठ अध्याय

शरीर, वचन और मन का कर्म ही योग है ।1।

वह योग आस्रव है ।2।

शुभ योग पुण्य कर्म के आस्रव में और अशुभ योग पाप कर्म के आस्रव में कारण है ।3।

कषायसहित जीव के संसार के कारणरूप कर्म का आस्रव होता है और कषायरहित जीव के स्थितिरहित कर्म का आस्रव होता है ।4।

पाँच इन्द्रियाँ, चार कषाय, पाँच अव्रत और पच्चीस प्रकार की क्रियाएँ- ये सब पहले आस्रव के भेद हैं ।5।

तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभाव, अधिकरणविशेष और वीर्यविशेष से आस्रव में विशेषता होती है ।6।

अधिकरण जीव और अजीव ऐसे दो भेदरूप है ।7।

जीव अधिकरण आस्रव संरम्भ-समारम्भ-आरम्भ, मन-वचन-कायारूप तीन योग, कृत-कारित-अनुमोदना तथा क्रोधादि चार कषायों की विशेषता से एक सौ आठ भेदरूप है ।8।

अजीव अधिकरण आस्रव दो प्रकार की निर्वर्तना, चार प्रकार के निक्षेप, दो प्रकार के संयोग और तीन प्रकार के निसर्ग- ऐसे कुल ग्यारह भेदरूप है ।9।

प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अन्तराय, और उपघात- ये ज्ञानावरण और दर्शनावरण कर्मास्रव के कारण हैं ।10।

अपने में, पर में और दोनों के विषय में स्थित दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिवेदन ये असतवेदनीय ल

कर्म आस्रव के कारण हैं ।11।

प्राणियों और व्रतधारियों के प्रति अनुकम्पा, दान, सराग, संयम आदि के योग, क्षमा और शौच इत्यादि सतवेदनीय कर्म आस्रव के कारण हैं ।12।

केवली, श्रुत, संघ, धर्म और देव का अवर्णवाद करना- ये दर्शनमोहनीय कर्म आस्रव के कारण हैं ।13।

कषाय के उदय से तीव्र परिणाम होना चरित्र मोहनीय के आस्रव का कारण है ।14।

बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह होना नरकायु के आस्रव का कारण है ।15।

माया तिर्यंचायु के आस्रव का कारण है ।16।

थोड़ा आरम्भ और थोड़ा परिग्रहपन मनुष्य-आयु के आस्रव का कारण है ।17।

स्वभाव से ही सरल परिणाम होना भी मनुष्यायु के आस्रव का कारण है ।18।

शील और व्रत का अभाव भी सभी प्रकार की आयु का आस्रव है ।19।

सरागसंयम, संयमासंयमा, अकामनिर्जरा, और बालतप ये देवायु के आस्रव के कारण हैं ।20।

सम्यक् दर्शन भी देवायु के आस्रव के कारण हैं ।21।

योग में कुटिलता और विसंवादन अशुभ-नामकर्म के आस्रव का कारण हैं ।22।

अशुभ नामकर्म के कारणों के विपरीत भाव शुभ नामकर्म के आस्रव के कारण हैं ।23।

दर्शनविशुद्धि, विनयसंपन्नता, शील और व्रतों में अनतिचार, निरन्तर ज्ञानोपयोग, संवेग, शक्ति के अनुसार त्याग तथा तप करना, साधुसमाधि, वैयावृत्त्य करना, अर्हत-आचार्य-बहुश्रुत और प्रवचन के प्रति भक्ति करना, आवश्यक में हानि न करना, मार्ग प्रभावना और प्रवचन वात्सल्य- ये तीर्थंकर-नामकर्म के आस्रव का कारण हैं ।24।

दूसरों की निन्दा करना और अपनी प्रसंशा करना तथा प्रगट गुणों को छिपाना और अप्रगट गुणों को प्रसिद्ध करना नीच गोत्र कर्म के आस्रव का कारण हैं ।25।

और इनके विपरीत उच्च गोत्रकर्म के आस्रव का कारण हैं ।26।

विघ्न करना अन्तराय कर्म के आस्रव का कारण हैं ।27।

सप्तम अध्याय

हिंसा, असत्य, स्तेय, अब्रह्मचर्य और परिग्रह- इनसे विरक्ति ही व्रत हैं ।1।

ये विशिष्ट देश में अणुव्रत और सर्वदेश में महाव्रत कहलाते हैं ।2।

इनकी स्थिरता के लिए पाँच-पाँच भावनाएँ हैं ।3।

वचनगुप्ति, मनगुप्ति, ईर्यासमिति, अदाननिक्षेपण समिति और आलोकितपानभोजन- ये पाँच अहिंसा व्रत की भावनाएँ हैं ।4।

क्रोधप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान एवं निर्दोष वचन बोलना- ये पाँच सत्य व्रत की भावनाएँ हैं ।5।

शून्यागारवास, विमोचितावास, दूसरों के प्रति बाधा उत्पन्न न करना, भिक्षा की शुद्धि रखना और साधर्मियों के साथ विवाद न करना- ये अस्तेय व्रत की भावनाएँ हैं ।6।

स्त्रियों में राग बढ़ाने वाली कथा सुनने का त्याग, उनके मनोहर अंगों को निरखकर देखने का त्याग, अव्रत अवस्था में भोगे हुए विषयों के स्मरण का त्याग, कामवर्धक रसों का त्याग और अपने शरीर के संस्कारों का त्याग- ये पाँच ब्रह्मचर्य व्रत की भावनाएँ हैं ।7।

पाँचों इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट विषयों के प्रति राग-द्वेष का त्याग करना अपरिग्रह व्रत की पाँच भावनाएँ हैं ।8।

हिंसा आदि से इस लोक में तथा परलोक में नाश की प्राप्ति होती है ।9।

अथवा दुःख की ही ।10।

प्राणिमात्र के प्रति मैत्री, अधिक गुणवानों के प्रति प्रमोद, दुःखी-रोगी जीवों के प्रति करुणा और विनयरहित जीवों के प्रति माध्यस्थ भाव रखना चाहिए ।11।

संवेग और वैराग्य के लिये संसार और शरीर के स्वभाव का चिन्तन करना चाहिए ।12।

प्रमाद से संयुक्त होकर जीव के प्राणों का वियोग करना हिंसा है ।13।

मिथ्यारूप वचन बोलना असत्य है ।14।

बिना दी हुई वस्तु को ग्रहण करना स्तेय है ।15।

मैथुन अब्रह्मचर्य है ।16।

मूर्च्छा परिग्रह है ।17।

व्रती शल्यरहित हो जाता है ।18।

गृहस्थ और गृहत्यागी- दो प्रकार के व्रती हैं ।19।

अणुव्रती गृहस्थ हैं ।20।

और इनके बाद दिक्, देश, अनर्थदण्ड, गुण-सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोग-परिभोग-परिमाण तथा अतिथिसंविभाग- ये सात व्रत हैं ।21।

मरण के समय होने वाली सल्लेखना को प्रीतिपूर्वक सेवन करे ।22।

शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टि की प्रसंशा और अन्यदृष्टि का संस्तव- ये पाँच सम्यक् दर्शन के अतिचार हैं ।23।

व्रत और शीलों में भी अनुक्रम से पाँच-पाँच अतिचार हैं ।24।

बन्ध, वध, छेद, अतिभार आरोपण और अन्न-पान का निरोध- ये अहिंसा अणुव्रत के अतिचार हैं ।25।

मिथ्या उपदेश, रहोभ्याख्यान, कूटलेखक्रिया, न्यासापहार और साकारमन्त्रभेद- ये सत्य अणुव्रत के अतिचार हैं ।26।

चोरी के लिए प्रेरित करना, चुराई हुई वस्तु ग्रहण करना, राज्य की आज्ञा के विरुद्ध चलना, गलत बाँट-तराजू इत्यादि प्रयोग करना और मिलावट इत्यादि करना- ये अस्तेय अणुव्रत के अतिचार हैं ।27।

दूसरे के विवाह कराने में उत्सुकता, पति-सहित स्त्रियों से व्यभिचार, पति-रहित स्त्रियों से व्यभिचार, अप्राकृतिक काम-क्रीड़ा और काम का तीव्र अभिनिवेश- ये ब्रह्मचर्य अणुव्रत के अतिचार हैं ।28।

क्षेत्र-निवास, सोने-चाँदी, धन-धान्य, दास-दासी एवं वस्त्र-बर्तन इत्यदि के परिमाणों का अतिक्रमण करना- ये अपरिग्रह अणुव्रत के अतिचार हैं ।29।

ऊपर, नीचे और तिर्यक् दिशाओं में अतिक्रमण, क्षेत्र की मर्यादा को बढ़ाना और उस मर्यादा को भूल जाना- ये दिगव्रत के अतिचार हैं ।30।

मर्यादा से बाहर की वस्तु को मंगाना, उसके लिए नौकर, शब्द और रूप का प्रयोग करना एवं पत्थर इत्यादि फेंककर कार्य कराना- ये देशव्रत के अतिचार हैं ।31।

हास्यपूर्ण अशिष्ट वचन बोलना, शरीर की कुचेष्टा से अशिष्ट वचन बोलना, धृष्टतापूर्वक जरूरत से ज्यादा बोलना, बिना प्रयोजन मन, वचन, काया की प्रवृत्ति करना और भोग-उपभोग के पदार्थों का जरूरत से ज़्यादा संग्रह करना- ये अनर्थदण्ड व्रत के अतिचार हैं ।32।

मन-वचन-काया सम्बन्धी परिणामों की अन्यथा प्रवृत्ति करना, इनमें अनादर करना और एकाग्रता का अभाव- ये सामयिक व्रत के अतिचार हैं ।33।

बिना देखे और बिना शुद्ध की हुई जमीन पर मल-मूत्र का त्याग करना, पूजन इत्यादि करना, चटाई इत्यादि बिछाना तथा इनमें अनादर करना और एकाग्रता का अभाव- प्रोषधोपवास व्रत के अतिचार हैं ।34।

सचित्त पदार्थ, सचित्त सम्बद्ध पदार्थ, सचित्त मिश्रित पदार्थ, गरिष्ठ पदार्थ एवं दुःपक्व पदार्थों का आहार- ये उपभोग-परिभोग-परिमाण व्रत के अतिचार हैं ।35।

सचित्त पत्र आदि में रखकर देना, सचित्त पत्र आदि से ढके हुए भोजन आदि को देना, दूसरे दातार की वस्तु को देना, ईर्ष्यापूर्वक देना और अयोग्य काल में देना- ये अतिथिसंविभाग व्रत के अतिचार हैं ।36।

जीने की इच्छा, मरण की इच्छा, मित्रों के प्रति अनुराग, पूर्व सुखों का स्मरण और आगामी विषय-भोगों की आकांक्षा-ये सल्लेखना व्रत के अतिचार हैं ।37।

अनुग्रह के हेतु से धन आदि देना ही दान है ।38।

विधि, द्रव्य, दातृ, और पात्र की विशेषता से दान में विशेषता होती है ।39।

अष्टम अध्याय

मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग- ये बन्ध के कारण हैं ।1।

जीव कषायसहित होने से कर्म के योग्य पुदगल परमाणुओं को ग्रहण करता है वह बन्ध है ।2।

उस बन्ध के प्रकृतिबन्ध, स्थितिबन्ध, अनुभागबन्ध और प्रदेशबन्ध- ये चार भेद हैं ।3।

प्रकृतिबन्ध ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय, मोहनीय, आयु, नाम, गोत्र और अन्तराय- इन आठ प्रकार का है ।4।

इन आठों के क्रम से पाँच, नव, दो, अट्ठाइस, चार, बयालीस, दो और पाँच भेद हैं ।5।

मति, श्रुत, अवधि, मनःपर्याय और केवल- ये ज्ञानावरण कर्म के पाँच भेद हैं ।6।

चक्षु, अचक्षु, अवधि, केवल, निद्रा, निद्रानिद्रा, प्रचला, प्रचलाप्रचला, स्तान्यगृद्धि- ये नव भेद दर्शनावरण के हैं ।7।

सत् और असत्- ये दो वेदनीय कर्म के भेद हैं ।8।

दर्शनमोहनीय, चरित्रमोहनीय, अकषायवेदनीय और कषायवेदनीय- ये चार मोहनीय कर्म के भेद हैं और इनके क्रमशः तीन, दो, नव और सोलह भेद हैं । वे इस प्रकार हैं – सम्यकत्व, मिथ्यात्व और सम्यग्मिथ्यात्व- ये तीन । अकषायवेदनीय और कषायवेदनीय- ये दो । हास्य, रति, अरति, शोक, भय, जुगुप्सा, स्त्रीवेद, पुरुषवेद और नपुंसकवेद- ये नव । अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान तथा संज्वलन के भेद से तथा इन प्रत्येक के क्रोध, मान, माया, और लोभ ये चार प्रकार- ये सोलह भेद । इस प्रकार मोहनीय कर्म के अट्ठाइस भेद हैं ।9।

नरकायु, तिर्यंचायु, मनुष्यायु और देवायु- ये चार आयुकर्म के भेद हैं ।10।

गति, जाति, शरीर, अंगोपांग, निर्माण, बन्धन, संघात, संस्थान, संहनन, स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण, अनुपूर्वी, अगुरुलघु, उपघात, परघात, आतप, उद्योत, उच्छ्वास, और विहायोगति- ये इक्कीस तथा प्रत्येक शरीर, त्रस, सुभग, सुस्वर, शुभ, सूक्ष्म, पर्याप्ति, स्थिर, आदेय और यशःकीर्ति- ये दस और इनके विलोम दस और तीर्थकरत्व, इस प्रकार नामकर्म के बयालीस भेद हैं ।11।

उच्च और नीच गोत्रकर्म के भेद हैं ।12।

दान, लाभ, भोग, उपभोग और वीर्य- ये पाँच अन्तराय कर्म के भेद हैं ।13।

ज्ञानावरण, दर्शनावरण, वेदनीय तथा अन्तराय इन चार कर्मों की उत्कृष्ट स्थिति तीस कोटिकोटि सागर की है ।14।

मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट स्थिति सत्तर कोटिकोटि सागर की है ।15।

नाम और गोत्र कर्म की उत्कृष्ट स्थिति बीस कोटिकोटि सागर की है ।16।

आयु कर्म की उत्कृष्ट स्थिति तेतीस सागर की है ।17।

वेदनीय कर्म की जघन्य स्थिति बारह मुहूर्त की है ।18।

नाम और गोत्र कर्म की जघन्य स्थिति आठ मुहूर्त की है ।19।

बाकी के पाँच कर्मों की जघन्य स्थिति अनन्त महूर्त की है ।20।

अनुभव ही कर्मों का विपाक है ।21।

यह कर्मों के नाम के अनुसार ही होता है ।22।

फल देने के बाद उन कर्मों की निर्जरा हो जाती है ।23।

ज्ञानावरण आदि कर्म प्रकृतियों का कारण, समस्त भावों में योग विशेष से सूक्ष्म, एकक्षेत्रअवगाहरुप स्थित और सर्व आत्मप्रदेशों में जो कर्म पुदगल के अनन्तानन्त प्रदेश हैं वह प्रदेशबन्ध है ।24।

सत् वेदनीय, शुभ आयु, शुभ नाम, और शुभ गोत्र ये पुण्य-प्रकृतियाँ हैं ।25।

इन पुण्य प्रकृतियों से अन्य शेष पाप प्रकृतियाँ हैं ।26।

नवम अध्याय

आस्रव का निरोध संवर है ।1।

गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय और चरित्र- इन कारणों से संवर होता है ।2।

तप से निर्जरा होती है ।3।

सम्यक् रूप से योग का निग्रह करना गुप्ति है ।4।

सम्यक् ईर्या, भाषा, एषणा, आदाननिक्षेप और उत्सर्ग- ये समिति हैं ।5।

उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य- ये धर्म हैं ।6।

अनित्य, अशरण, संसार, एकत्व, अन्यत्व, अशुचि, आस्रव, संवर, निर्जरा, लोक, बोधिदुर्लभ और धर्म- इनका चिन्तन अनुप्रेक्षा है ।7।

मार्ग से च्युत न होने और निर्जरा के लिए परिषह सहन करने योग्य हैं ।8।

क्षुधा, तृषा, शीत, उष्ण, दंशमशक, नाग्न्य, अरति, स्त्री, चर्या, निषद्या, शय्या, आक्रोश, वध, याचना, अलाभ, रोग, तृणस्पर्श, मल, सत्कारपुरुस्कार, प्रज्ञा, अज्ञान और अदर्शन- ये बाइस परिषह हैं ।9।

सूक्ष्मसाम्पराय वाले जीवों के और छ्द्मस्थ वीतरागों के चौदह परिषह होते हैं ।10।

जिनदेव के ग्यारह परिषह होते हैं ।11।

बादरसाम्पराय वाले जीवों के सर्व परिषह होते हैं ।12।

ज्ञानावरणीय कर्म के उदय से प्रज्ञा और अज्ञान ये दो परिषह होते हैं ।13।

दर्शनमोहनीय और अन्तराय कर्म के उदय से क्रम से अदर्शन और अलाभ परिषह होते हैं ।14।

चरित्रमोहनीय कर्म के उदय से नग्नता, अरति, स्त्री, निषद्या, आक्रोश, याचना और सत्कारपुरुस्कार- ये सात परिषह होते हैं ।15।

वेदनीय कर्म के उदय से शेष ग्यारह परिषह होते हैं ।16।

एक जीव के एक साथ एक से लेकर उन्नीस परिषह तक जानना चाहिए ।17।

सामायिक, छेदोपस्थापना, परिहारविशुद्धि, सूक्ष्मसाम्पराय और यथाख्यात- ये चरित्र के भेद हैं ।18।

सम्यक् अनशन, अवमौदर्य, वृत्तिपरिसंख्यान, रसपरित्याग, विविक्तिशय्यासन और कायक्लेश- ये छह बाह्य तप हैं ।19।

सम्यक् प्रायश्चित, विनय, वैयावृत्य, स्वाध्याय, वयुत्सर्ग और ध्यान- ये छह अभ्यन्तर तप हैं ।20।

ध्यान के पहले के पाँच तप के क्रमशः नव, चार, दस, पाँच और दो भेद हैं ।21।

आलोचना, प्रतिक्रमण, तदुभय, विवेक, व्युत्सर्ग, तप, छेद, परिहार, उपस्थापना- ये प्रायश्चित तप के भेद हैं ।22।

ज्ञान, दर्शन, चरित्र और उपचार- ये विनय तप के भेद हैं ।23।

आचार्य, उपाध्याय, तपस्वी, शैक्ष्य, ग्लान, गण, कुल, संघ, साधु और मनोज्ञ- ये वैयावृत्य तप के भेद हैं ।24।

वाचना, पृच्छना, अनुप्रेक्षा, आम्नाय और धर्मोपदेश- ये स्वाध्याय के भेद हैं ।25।

बाह्यउपाधि और अभ्यन्तरउपाधि व्युत्सर्ग तप के भेद हैं ।26।

उत्तम संहनन वाले के अन्तर्मुहूर्त तक एकाग्रतापूर्वक चिन्ता का निरोध ध्यान है ।27।

आर्त, रौद्र, धर्म और शुक्ल- ये ध्यान के चार भेद हैं ।28।

धर्म और शुक्ल मोक्ष के कारण हैं ।29।

अनिष्ट का संयोग होने पर उसके वियोग के लिए बारम्बार चिन्तन करना आर्तध्यान है ।30।

और इसके विपरीत इष्ट के संयोग का चिन्तन भी ।31।

वेदना को दूर करने का चिन्तन भी ।32।

और विषयों का चिन्तन भी ।33।

यह आर्तध्यान अविरत, देशविरत और प्रमत्तसंयत में होता है ।34।

हिंसा, असत्य, चोरी और विषय-संरक्षण के भाव से उत्पन्न हुआ रौद्रध्यान है, जो अविरत और देशविरत में होता है ।35।

आज्ञाविचय, अपायविचय, विपाकविचय और संस्थानविचय के लिए चिन्तन करना धर्मध्यान है ।36।

पहले दो प्रकार के शुक्लध्यान पूर्वज्ञानधारियों को होते हैं ।37।

अन्तिम दो प्रकार के शुक्लध्यान केवली को होते हैं ।38।

पृथक्त्ववितर्क, एकत्ववितर्क, सूक्ष्मक्रियाप्रतिपाति और व्युपरतक्रियानिवर्ति- ये शुक्लध्यान के चार भेद हैं ।39।

ये क्रमशः तीन योग वाले, एक योग वाले, मात्र काययोग वाले और अयोगी के होते हैं ।40।

एक आश्रय से रहने वाले पहले दो भेद वितर्क और वीचार सहित हैं ।41।

दूसरा शुक्लध्यान वीचार से रहित है ।42।

श्रुतज्ञान को वितर्क कहते हैं ।43।

अर्थ, व्यञ्जन और योग का बदलना वीचार है ।44।

सम्यग्दृष्टि, श्रावक, विरत-मुनि, अनन्तानुबन्धी का विसंयोजन करने वाला, दर्शनमोह का क्षय करने वाला, उपशमश्रेणी मांडने वाला, उपशान्तमोह, क्षपकश्रेणी मांडनेवाला, क्षीणमोह और जिन- इन सबके प्रति समय क्रम से निर्जरा होती है ।45।

पुलाक, बकुश, कुशील, निर्ग्रन्थ और स्नातक- ये निर्ग्रन्थ मुनि हैं ।46।

जो कि संयम, श्रुत, प्रतिसेवना, तीर्थ, लिंग, लेश्या, उपपाद और स्थान के भेदों से साध्य हैं ।47।

दशम अध्याय

मोह का क्षय होने से और ज्ञानावरण, दर्शनावरण एवं अन्तराय कर्मों का क्षय होने से केवलज्ञान उत्पन्न होता है ।1।

बन्ध के कारणों का अभाव तथा निर्जरा के द्वारा समस्त कर्मों का अत्यन्त नाश हो जाना मोक्ष है ।2।

और औपशमिक आदि भाव तथा भव्यत्व का अभाव हो जाता है ।3।

केवलसम्यकत्व, केवलज्ञान, केवलदर्शन और सिद्धत्व, इन भावों के अतिरिक्त अन्य भावों के अभाव से मोक्ष होता है ।4।

तुरन्त ही उर्ध्वगमन करके लोक के अग्रभाग तक जाता है ।5।

कुम्हार द्वारा घुमाए हुए चाक की तरह पूर्व प्रयोग से, लेप के छूट जाने की तरह संग रहित होने से, एरण्ड के बीज की तरह बन्ध का नाश होने से और अग्निशिखा की तरह उर्ध्वगामी स्वभाव होने से- मुक्त जीव उर्ध्वगमन करता है ।6-7।

फिर वहाँ धर्मास्तिकाय का अभाव है ।8।

क्षेत्र, काल, गति, लिंग, तीर्थ, चरित्र, प्रत्येकबोधित एवं बुद्धबोधित, ज्ञान, अवगाहना, अन्तर, संख्या और अल्पबहुत्व- इनसे मुक्त जीवों में भी भेद सिद्ध किये जा सकते हैं ।9।

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