माण्डूक्यकारिका

आगम प्रकरण

विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ है । इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है ।1।

दक्षिणनेत्ररूप द्वार में विश्व रहता है, तैजस मन के भीतर रहता है, प्राज्ञ हृदयाकाश में उपलब्ध होता है । इस प्रकार वह शरीर में तीन प्रकार से स्थित है ।2।

विश्व सर्वदा स्थूल का भोक्ता है, तैजस सूक्ष्म का भोक्ता है और प्राज्ञ आनन्द का भोक्ता है । इस प्रकार तीन तरह का भोग जानना चाहिए ।3।

स्थूल विश्व को तृप्त करता है, सूक्ष्म तैजस को और आनन्द प्राज्ञ को । इस प्रकार इनकी तृप्ति भी तीन तरह की जानना चाहिए ।4।

तीनों स्थानों में जो भोग्य और भोक्ता बतलाये गए हैं- इन दोनों को जो जानता है, वह भोगते हुए भी लिप्त नहीं होता ।5।

निश्चित ही जो पदार्थ विद्यमान होते हैं उन्हीं सबकी उत्पत्ति हुआ करती है । प्राण ही सबकी उत्पत्ति करता है और चेतन पुरुष उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकट करता है ।6।

सृष्टि के विषय में विचार करने वाले कुछ अन्य लोग विभूतियों को ही जगत की उत्पत्ति मानते हैं तथा कुछ अन्य लोगों द्वारा सृष्टि स्वप्न और माया के समान मानी गयी है ।7।

कोई सृष्टि के विषय में ऐसा निश्चय रखते हैं कि ‘प्रभु की इच्छा ही सृष्टि है’ । तथा काल के विषय में विचार करने वाले काल से ही जीवों की उत्पत्ति मानते हैं ।8।

कुछ लोग ‘सृष्टि भोग के लिए है’ ऐसा मानते हैं और कुछ ‘क्रीड़ा के लिये है’ ऐसा समझते हैं । यह भगवान् का स्वभाव ही है क्योंकि पूर्णकाम को इच्छा ही क्या हो सकती है ।9।

सब प्रकार के दुःखों की निवृत्ति में ईशान- प्रभु है । वह अविकारी, सब पदार्थों का अद्वैतरूप, देव, तुरीय और व्यापक माना गया है ।10।

विश्व और तैजस- ये दोनों कार्य और कारण से बँधे हुए माने जाते हैं, किन्तु प्राज्ञ केवल कारण से ही बद्ध है तथा तुरीय में ये दोनों ही नहीं हैं ।11।

प्राज्ञ तो न अपने को, न पराये को और न सत्य को अथवा अनृत को ही जानता है, किन्तु वह तुरीय सर्वदा सर्वदृक् है ।12।

द्वैत का अग्रहण तो प्राज्ञ और तुरीय दोनों ही को समान है, किन्तु प्राज्ञ बीजस्वरूप निद्रा से युक्त है और तुरीय में वह निद्रा नहीं है ।13।

विश्व और तैजस- ये स्वप्न और निद्रा से युक्त हैं तथा प्राज्ञ स्वप्नरहित निद्रा से युक्त है, किन्तु निश्चित पुरुष तुरीय में न निद्रा ही देखते हैं और न स्वप्न ही ।14।

अन्यथाग्रहण से स्वप्न होता है तथा तत्त्व को न जानने से निद्रा होती है और इन दोनों विपरीत ज्ञानों का क्षय हो जाने पर तुरीय पद की प्राप्ति होती है ।15।

जिस समय अनादि माया से सोया हुआ जीव जागता है, उसी समय उसे अज, अनिद्र और स्वप्नरहित अद्वैत आत्मतत्त्व का बोध प्राप्त होता है ।16।

प्रपञ्च यदि यदि होता तो निवृत्त हो जाता- इसमें सन्देह नहीं । किन्तु यह द्वैत तो माया मात्र है, परमार्थतः तो अद्वैत ही है ।17।

इस विकल्प की यदि किसी ने कल्पना की होती तो यह निवृत्त भी हो जाता । यह वाद तो उपदेशक के ही लिए है । आत्मज्ञान होने पर द्वैत नहीं रहता ।18।

जिस समय विश्व का अत्व- अकारमात्रत्व बतलाना तो उनके प्राथमिकत्व की समानता स्पष्ट ही है तथा उनकी व्याप्तिरूप समानता भी स्फुट ही है ।19।

तैजस को उकार मात्रारूप जानने पर उनका उत्कर्ष स्पष्ट दिखाई देता है । तथा उनका उभयत्व भी स्पष्ट ही है ।20।

प्राज्ञ की मकार-रूपता में उनकी मान करने की समानता स्पष्ट है । इसी प्रकार उनमें लयस्थान होने की समानता भी स्पष्ट ही है ।21।

जो पुरुष तीनों स्थानों में तुल्यता अथवा समानता को निश्चयपूर्वक जानता है वह महामुनि समस्त प्राणियों का पूजनीय और वन्दनीय होता है ।22।

अकार विश्व को प्राप्त करा देता है उकार तैजस को और मकार प्राज्ञ को, किन्तु अमात्र में किसी की गति नहीं है ।23।

ओङ्कार को एक-एक पाद करके जाने, पाद ही मात्राएँ हैं- इसमें सन्देह नहीं । इस प्रकार ओङ्कार को पादक्रम से जानकर कुछ भी चिन्तन न करे ।24।

चित्त को ओङ्कार में समाहित करे, ओङ्कार निर्भय ब्रह्मपद है । ओङ्कार में नित्य समाहित रहने वाले पुरुष को कहीं भी भय नहीं होता ।25।

ओङ्कार ही परब्रह्म है, ओङ्कार ही अपरब्रह्म माना गया है । वह ओङ्कार अपूर्व, अंतर्बाह्यशून्य, अकार्य तथा अव्यय है ।26।

प्रणव ही सबका आदि, मध्य और अन्त है । प्रणव को इस प्रकार जानने के अनन्तर तद्रूपता को प्राप्त हो जाता है ।27।

प्रणव को ही सबके हृदय में स्थित ईश्वर जाने । इस प्रकार सर्वव्यापी ओङ्कार को जानकर बुद्धिमान पुरुष शोक नहीं करता ।28।

जिसने मात्राहीन, अनन्त मात्रा वाले, द्वैत के उपशमस्थान और मंगलमय ओङ्कार को जाना है वही मुनि है, और कोई पुरुष नहीं ।29।

वैतथ्य प्रकरण

स्वप्न में सब पदार्थ शरीर के भीतर स्थित होते हैं, अतः स्थान के संकोच के कारण मनीषिगण स्वप्न में सब पदार्थों का मिथ्यात्व प्रतिपादन करते हैं ।1।

समय की अदीर्घता होने के कारण वह देह से बाहर जाकर उन्हें नहीं देखता तथा जागने पर भी कोई पुरुष उस देश में विद्यमान नहीं रहता ।2।

श्रुति में भी रथादि का अभाव युक्तिपूर्वक सुना गया है । अतः सिद्ध हुए मिथ्यात्व को ही स्वप्न में स्पष्ट बतलाते है ।3।

इसी से जाग्रत अवस्था में भी पदार्थों का मिथ्यात्व है, क्योंकि जिस प्रकार वे वहाँ स्वप्नावस्था में होते हैं उसी प्रकार जाग्रत अवस्था में भी होते हैं । केवल शरीर के भीतर स्थित होने और स्थान के संकुचित होने में ही स्वप्नदृष्ट पदार्थों का भेद है ।4।

इस प्रकार प्रसिद्ध हेतु से ही पदार्थों में समानता होने के कारण विवेकी पुरुषों ने स्वप्न और जाग्रत अवस्थाओं को एक ही बतलाया है ।5।

जो आदि और अन्त में नहीं है, वह वर्तमान में भी वैसा ही है । ये पदार्थ समूह असत् के समान होते हुए भी सत् जैसे दिखाई देते हैं ।6।

स्वप्न में उनकी सप्रयोजनता में विपरीतता आ जाती है । अतः आदि-अन्त युक्त होने के कारण वे निश्चय मिथ्या ही माने गए हैं ।7।

स्वर्गनिवासियों की तरह ही यह भी स्थानी का अपूर्व धर्म है । उन स्वप्न पदार्थों को यह इसी प्रकार जाकर देखता है जैसे कि इस लोक में सुशिक्षित पुरुष ।8।

स्वप्नावस्था में भी चित्त के भीतर कल्पना किया हुआ पदार्थ असत् और चित्त से बाहर ग्रहण किया हुआ पदार्थ सत् जान पड़ता है, किन्तु इन दोनों का ही मिथ्यात्व देखा गया है ।9।

इसी प्रकार जाग्रत अवस्था में भी चित्त के भीतर कल्पना किया हुआ पदार्थ असत् और बाहर ग्रहण किया हुआ पदार्थ सत् समझा जाता है । परन्तु इन दोनों का ही मिथ्यात्व मानना उचित है ।10।

यदि दोनों ही स्थानों के पदार्थों का मिथ्यात्व है तो इन पदार्थों को जानता कौन है और कौन इनकी कल्पना करने वाला है ।11।

स्वयंप्रकाश आत्मा अपनी माया से स्वयं ही कल्पना करता है और वही सब भेदों को जानता है- यही वेदान्त का निश्चय है ।12।

प्रभु आत्मा अपने अन्तःकरण में स्थित अन्य भावों को नानारूप करता है तथा बहिश्चित्त होकर पृथ्वी आदि नियत और अनियत पदार्थों की भी इसी प्रकार कल्पना करता है ।13।

जो आन्तरिक पदार्थ केवल कल्पना काल तक ही रहने वाले हैं और जो बाह्य पदार्थ द्विकालिक हैं वे सभी कल्पित हैं । उनकी विशेषता का कोई दूसरा कारण नहीं है ।14।

जो आन्तरिक पदार्थ हैं वे अव्यक्त ही हैं और जो बाह्य हैं वे स्पष्ट प्रतीत होने वाले हैं । किन्तु वे सब हैं कल्पित ही । उनकी विशेषता तो केवल इन्द्रियों के ही भेद में है ।15।

सबसे पहले जीव की कल्पना करता है, फिर तरह-तरह के बाह्य और आध्यात्मिक पदार्थों की कल्पना करता है । उस जीव का जैसा विज्ञान होता है वैसी ही स्मृति भी होती है ।16।

जिस प्रकार निश्चय न कि हुई रज्जु अन्धकार में सर्प-धारा आदि भावों से कल्पना की जाती है उसी प्रकार आत्मा में भी तरह-तरह की कल्पनाएँ हो रही हैं ।17।

जिस प्रकार रज्जु का निश्चय हो जाने पर उसमें विकल्प निवृत्त हो जाता है तथा ‘यह रज्जु ही है’ ऐसा अद्वैत निश्चय होता है उसी प्रकार आत्मा का निश्चय है ।18।

यह जो इन प्राण आदि अनन्त भावों से विकल्पित हो रहा है सो यह उस प्रकाशमय आत्मदेव की माया ही है, जिससे कि वह स्वयं ही मोहित हो रहा है ।19।

प्राणोपसक कहते हैं- ‘प्राण ही कारण है’ । भूतज्ञ कहते हैं- ‘महाभूत ही परमार्थ हैं’ । गुणों को जानने वाले कहते हैं- ‘गुण ही सृष्टि के हेतु हैं’ । तथा तत्वज्ञ कहते हैं- ‘तत्त्व ही जगत के प्रवर्तक हैं’ ।20।

पादवेत्ता कहते हैं- ‘विश्व आदि पाद ही सम्पूर्ण व्यवहार के हेतु हैं’ । विषयज्ञ कहते हैं- ‘शब्दादि विषय ही सत्य वस्तु हैं’ । लोकवेत्ताओं का कथन है- ‘लोक ही सत्य है’ । तथा देवोपसक कहते हैं -’इन्द्रादि देवता ही सृष्टि के संचालक हैं’ ।21।

वेदज्ञ कहते हैं- ‘ऋगादि चार वेद ही परमार्थ हैं’ । याज्ञिक कहते हैं- ‘यज्ञ ही संसार के आदि कारण हैं’ । भोक्ता को जानने वाले भोक्ता की ही प्रधानता बतलाते हैं तथा भोज्य के मर्मज्ञ भोज्य पदार्थों की ही सारवत्ता का प्रतिपादन करते हैं ।22।

सूक्ष्मवेत्ता कहते है- ‘आत्मा सूक्ष्म है’ । स्थूलवादी कहते हैं- ‘वह स्थूल है’ । मूर्तवादी कहते हैं- ‘परमार्थ वस्तु मूर्तिमान है’ । तथा अमूर्तवादियों का कथन है कि वह मूर्तिहीन है ।23।

कालज्ञ कहते हैं कि काल ही परमार्थ है । दिशाओं के जानने वाले कहते हैं कि दिशाएँ ही सत्य वस्तु हैं । वादवेत्ता कहते हैं कि वाद ही सत्य वस्तु हैं । तथा भुवनकोश के ज्ञाताओं का कथन है कि भुवन ही परमार्थ हैं ।24।

मनोविद कहते हैं कि मन ही आत्मा है । बौद्धों का कथन है कि बुद्धि ही आत्मा है । चित्तज्ञों का विचार है कि चित्त ही सत्य वस्तु है तथा धर्माधर्मवेत्ता धर्माधर्म को ही परमार्थ मानते हैं ।25।

कोई पच्चीस तत्त्वों को, कोई छब्बीस तत्त्वों को और कोई इकतीस तत्त्वों को सत्य मानते हैं तथा अन्य मतावलम्बी परमार्थ को अनन्त भेदों वाला मानते हैं ।26।

लौकिक पुरुष लोकानुरंजन को और आश्रमवादी आश्रमों को ही प्रधान बतलाते हैं । लिंगवादी स्त्रीलिंग, पुल्लिंग और नपुंसकलिंग को तथा दूसरे लोग पर और अपर ब्रह्म को ही परमार्थ मानते हैं ।27।

सृष्टिवेत्ता कहते हैं कि सृष्टि ही सत्य है । लयवादी कहते हैं कि लय ही परमार्थ वस्तु है तथा स्थितिवेत्ता कहते हैं कि स्थिति ही सत्य है । इस प्रकार ये सभी वाद इस आत्मतत्त्व में सर्वदा कल्पित हैं ।28।

जिसे जो भाव दिखला देता है वह उसी को आत्म स्वरूप से देखने लगता है तथा इस प्रकार देखने वाले उस व्यक्ति की वह भाव तद्रूप होकर रक्षा करने लगता है और उसमें होने वाला अभिनिवेश उस को प्राप्त हो जाता है ।29।

इन प्राण आदि अपृथक भावों से यह आत्मा भिन्न ही माना गया है । इस बात को जो वास्तविक रूप से जानता है वह निःशंक होकर कल्पना कर सकता है ।30।

जिस प्रकार स्वप्न और माया देखे गए हैं तथा जैसा गंधर्वनगर जाना गया है, उसी प्रकार विचक्षण पुरुष ने वेदान्तों में इस जगत को देखा है ।31।

न प्रलय है, न उत्पत्ति है, न बद्ध है, न साधक है, न मुमुक्षु है और न मुक्त ही है- यही परमार्थता है ।32।

यह प्राण आदि असत् भावों से और अद्वैतरूप से कल्पित है । वे असत् भाव भी अद्वैत से ही कल्पना किये गए हैं इसलिए अद्वैत भाव ही मंगलमय है ।33।

यह नानात्व न तो आत्मस्वरूप से है और न अपने ही स्वरूप से कुछ है । कोई भी वस्तु न तो ब्रह्म से पृथक है और न ही अप्रथक ही- ऐसा तत्त्ववेत्ता जानते हैं ।34।

जिनके राग, भय और क्रोध निवृत्त हो गए हैं उन वेद के पारगामी मुनियों द्वारा ही यह निर्विकल्प प्रपञ्चोपशम अद्वय तत्त्व देखा गया है ।35।

इसलिए इस को जानकर अद्वैत में मनोनिवेश करे और अद्वैततत्त्व को प्राप्त कर लोक में जड़वत् व्यवहार करे ।36।

यति को स्तुति, नमस्कार और स्वधाकार- से रहित हो चल और अचल में ही विश्राम करने वाला होकर यादृच्छिक हो जाना चाहिए ।37।

आध्यात्मिक तत्त्व को देखकर और बाह्य तत्त्व का भी अनुभव कर, तत्त्वीभूत और तत्त्व में ही रमण करने वाला होकर तत्त्व से च्युत न हो ।38।

अद्वैत प्रकरण

उपासना का आश्रय लेने वाला जीव कार्यब्रह्म में ही रहता है और समझता है कि उत्पत्ति से पूर्व ही सब अज था । इसलिए वह कृपण माना गया है ।1।

इसलिए अब मैं सर्वत्र समानभाव को प्राप्त जन्मरहित अकृपणभाव का वर्णन करता हूँ कि किस प्रकार सब ओर उत्पन्न होने पर भी कुछ उत्पन्न नहीं हुआ ।2।

आत्मा आकाश के समान है, वह घटाकाशों के समान जीवरूप से उत्पन्न हुआ है । तथा घटादि के समान देहसंघातरूप से भी उत्पन्न हुआ कहा जाता है । आत्मा की उत्पत्ति के विषय में यही दृष्टांत है ।3।

घटादि के लीन होने पर घटाकाश आदि महाकाश में लीन हो जाते हैं उसी प्रकार जीव इस आत्मा में विलीन हो जाते हैं ।4।

जिस प्रकार एक घटाकाश के धूलि और धुएँ आदि से युक्त होने पर समस्त घटाकाश उनसे युक्त नहीं होते उसी प्रकार जीव भी सुख आदि धर्मों से लिप्त नहीं होते ।5।

भिन्न-भिन्न आकाशों के रूप, कार्य और नामों में तो भेद है, परन्तु आकाश में तो कोई भेद नहीं है । उसी प्रकार जीवों के विषय में भी निश्चय समझना चाहिए ।6।

जिस प्रकार घटाकाश आकाश का विकार या अवयव नहीं है उसी प्रकार जीव भी आत्मा का विकार या अवयव नहीं है ।7।

जिस प्रकार बालबुद्धि लोगों को मल के कारण आकाश मलिन जान पड़ता है उसी प्रकार अविवेकी पुरुषों की दृष्टि में मल से मलिन जान पड़ता है ।8।

यह आत्मा सम्पूर्ण शरीरों में मृत्यु, जन्म, लोकान्तर में गमनागमन और स्थित रहने में भी आकाश से अविलक्षण है ।9।

देहादि समस्त संघात स्वप्न के समान आत्मा की माया से ही रचे हुए हैं । उनके अपेक्षाकृत उत्कर्ष अथवा सबकी समानता में भी कोई हेतु नहीं है ।10।

तैत्तिरीय श्रुति में जिन रसादि कोशों की व्याख्या की गयी है, आकाशवत् परमात्मा ही उनके आत्मा जीव रूप से प्रकाशित किया गया है ।11।

लोक में जिस प्रकार पृथ्वी और उदर में एक ही आकाश प्रकाशित हो रहा है उसी प्रकार मधु ब्राह्मण में दोनों स्थानों में एक ही ब्रह्म निरूपित किया गया है ।12।

क्योंकि जीव और आत्मा के अभेदरूप से एकत्व की प्रशंसा की गयी है और उसके नानात्व की निन्दा की गयी है, इसलिए वही ठीक है ।13।

पहले उत्पत्तिबोधक वाक्यों द्वारा जो जीव और परमात्मा का पृथक्त्व बतलाया है वह भविष्यद् वृत्ति से गौण है, उसे मुख्य अर्थ मानना ठीक नहीं है ।14।

जो मृत्तिका, लोहखण्ड और विस्फुलिंग आदि दृष्टांतों द्वारा भिन्न-भिन्न प्रकार से सृष्टि का निरूपण किया है वह बुद्धि का प्रवेश कराने का उपाय है, वस्तुतः उनमें कुछ भी भेद नहीं है ।15।

आश्रम तीन प्रकार के हैं- हीन, मध्यम और उत्कृष्ट दृष्टि वाले । उन पर कृपा करके उन्हीं के लिए यह उपासना उपदेश की गयी है ।16।

द्वैतवादी अपने-अपने सिद्धान्तों की व्यवस्था में दृढ़ आग्रही होने के कारण आपस में विरोध रखते हैं, परन्तु यह उनसे विरोध नहीं रखता ।17।

अद्वैत परमार्थ है और द्वैत उसी का भेद कहा जाता है, तथा उनके मत में दोनों प्रकार से द्वैत ही है, इसलिए उनसे इसका विरोध नहीं है ।18।

इस अजन्मा अद्वैत में माया ही के कारण भेद है और किसी प्रकार नहीं, यदि इसमें वास्तविक भेद होता तो यह अमृतस्वरूप मरणशीलता की प्राप्त हो जाता ।19।

द्वैतवादी लोग जन्महीन आत्मा के भी जन्म की इच्छा करते हैं, किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजन्मा और मरणहीन है वह मरणशीलता को किस प्रकार प्राप्त हो सकता है ।20।

मरणहीन वस्तु कभी मरणशील नहीं होती और मरणशील कभी अमर नहीं होती । किसी भी प्रकार स्वभाव की विपरीतता नहीं हो सकती ।21।

जिसके मत में स्वभाव से मरणहीन पदार्थ भी मर्त्यत्व को प्राप्त हो जाता है, उसके सिद्धान्तानुसार कृतक होने के कारण वह अमृत पदार्थ चिरस्थायी कैसे हो सकता है ।22।

पारमार्थिक अथवा अपारमार्थिक किसी भी प्रकार की सृष्टि होने में श्रुति तो समान ही होगी । अतः उनमें जो निश्चित और युक्तियुक्त मत हो वही हो सकता है, अन्य नहीं ।23।

‘यहाँ नाना वस्तु कुछ भी नहीं है’, ‘इन्द्र माया से ही अनेकरूप हो जाता है’ तथा ‘उत्पन्न न होकर भी अनेक प्रकार से उत्पन्न होता है’ – इन श्रुति वाक्यों के अनुसार वह माया से ही उत्पन्न होता है ।24।

श्रुति में सम्भूति की निन्दा द्वारा कार्यवर्ग का प्रतिषेध किया गया है तथा ‘इसे कौन उत्पन्न करे’ इस वाक्य द्वारा कारण का कारण का प्रतिषेध किया गया है ।25।

क्योंकि ‘स एष नेति नेति’ इत्यादि श्रुति आत्मा के अग्राह्यत्व के कारण पहले बताए हुए सभी भावों का निषेध करती है, अतः इस हेतु के द्वारा ही अजन्मा आत्मा प्रकाशित होता है ।26।

सद्वस्तु का जन्म माया से ही हो सकता है, वस्तुतः नहीं । जिसके मत में वस्तुतः जन्म होता है उसके सिद्धान्तानुसार भी उत्पत्तिशील वस्तु का ही जन्म हो सकता है ।27।

असद्वस्तु का जन्म तो माया अथवा तत्त्वतः किसी प्रकार भी होना सम्भव नहीं है । बन्ध्या का पुत्र न तो वस्तुतः उत्पन्न होता है और न माया से ही ।28।

जिस प्रकार स्वप्नकाल में मन माया से ही द्वैताभासरूप से स्फुरित होता है, उसी प्रकार जाग्रतकाल में भी वह माया से ही द्वैताभासरूप से स्फुरित होता है ।29।

इसमें सन्देह नहीं, स्वप्नावस्था में अद्वय मन ही द्वैतरूप से भासने वाला है, इसी प्रकार जाग्रतकाल में भी निःसन्देह अद्वय मन ही द्वैतरूप से भासता है ।30।

यह जो कुछ चराचर द्वैत है सब मन का ही दृश्य है क्योंकि मन का अमनीभाव हो जाने पर द्वैत की उपलब्धि नहीं होती ।31।

जिस समय आत्म सत्य की उपलब्धि होने पर मन संकल्प नहीं करता उस समय वह अमनी भाव को प्राप्त हो जाता है, उस अवस्था में ग्राह्य का अभाव हो जाने के कारण वह ग्रहण करने के विकल्प से रहित हो जाता है ।32।

उस सर्वकल्पनाशून्य अजन्मा ज्ञान को विवेकी लोग ज्ञेयब्रह्म से अभिन्न बतलाते हैं । ब्रह्म जिसका विषय है वह ज्ञान अजन्मा और नित्य है । उस अजन्मा ज्ञान से अजन्मा आत्मतत्त्व स्वयं ही जाना जाता है ।33।

निग्रहीत, निर्विकल्प और विवेकसम्पन्न चित्त का जो व्यापार है वह विशेष रूप से ज्ञातव्य है । सुषुप्ति अवस्था में जो चित्त की वृत्ति है वह अन्य प्रकार की है, वह उसके समान नहीं है ।34।

सुषुप्ति अवस्था में मन लीन हो जाता है, किन्तु निरुद्ध होने पर वह उसमें लीन नहीं होता । उस समय तो सब ओर से चित्प्रकाशमय निर्भय ब्रह्म ही रहता है ।35।

वह ब्रह्म जन्मरहित, निद्रारहित, स्वप्नशून्य, नामरूप से रहित, नित्य प्रकाशस्वरूप और सर्वज्ञ है, उसमें किसी प्रकार का कर्तव्य नहीं है ।36।

वह सब प्रकार के वाग्व्यापार से रहित, सब प्रकार के चिन्तन से ऊपर, अत्यन्त शान्त, नित्यप्रकाश, समाधिस्वरूप, अचल और निर्भय है ।37।

जिसमें किसी प्रकार का चिन्तन नहीं है उसमें किसी प्रकार का ग्रहण और त्याग भी नहीं है । उस अवस्था में आत्मनिष्ठ ज्ञान जन्मरहित और समता को प्राप्त हुआ रहता है ।38।

यह अस्पर्श योग निश्चय ही योगियों के लिए कठिनता से दिखायी देने वाला है । इस अभय पद में भय देखने वाले योगी लोग इससे भय मानते हैं ।39।

समस्त योगियों के अभय, दुःखक्षय, प्रबोध और अक्षय शान्ति मन के निग्रह के ही अधीन है ।40।

जिस प्रकार कुशा के अग्रभाग से एक-एक बूँद द्वारा समुद्र को उलीचा जा सकता है उसी प्रकार सब प्रकार की खिन्नता का त्याग कर देने पर मन का निग्रह हो सकता है ।41।

काम्यविषयक और भोगों में विक्षिप्त हुए चित्त का उपायपूर्वक निग्रह करे तथा लय अवस्था में अत्यन्त प्रसन्नता को प्राप्त हुए चित्त का भी संयम करे, क्योंकि जिस काम है वैसा लय भी है ।42।

सम्पूर्ण द्वैत दुःखरूप है- ऐसा निरन्तर स्मरण करते हुए चित्त को कामजनित भोगों से हटावे । इस प्रकार निरन्तर सब वस्तुओं को अजन्मा ब्रह्मरूप स्मरण करता हुआ फिर कोई जात पदार्थ नहीं देखता ।43।

चित्त लीन होने लगे तो उसे आत्मविवेक में नियुक्त करे, यदि विक्षिप्त हो जाये तो उसे पुनः शान्त करे और सकषाय- रागयुक्त समझे तथा साम्यावस्था को प्राप्त हुए चित्त को चञ्चल न करे ।44।

उस साम्यावस्था में सुख का आस्वादन न करे, बल्कि विवेकवती बुद्धि के द्वारा उससे निःसंग रहे । फिर यदि चित्त बाहर निकलने लगे तो उसे प्रयत्नपूर्वक निश्चल और एकाग्र करे ।45।

जिस समय चित्त सुषुप्ति में लीन न हो और फिर विक्षिप्त भी न हो तथा निश्चल और विषयाभास से रहित हो जाये उस समय वह ब्रह्म ही हो जाता है ।46।

स्वस्थ, शान्त, निर्वाणयुक्त, अकथनीय, निरतिशय सुखस्वरूप, अजन्मा, अजन्मा ज्ञेय – से अभिन्न और सर्वज्ञ बतलाते हैं ।47।

कोई भी जीव उत्पन्न नहीं होता, क्योंकि उसका कोई कारण ही नहीं है । जिस अजन्मा ब्रह्म में किसी की उत्पत्ति नहीं होती वही सर्वोत्तम सत्य है ।48।

अलातशान्ति प्रकरण

जिसने ज्ञेय से अभिन्न आकाश सदृश ज्ञान से आकाश सदृश धर्मों को जाना है उस पुरुषोत्तम को मैं नमस्कार करता हूँ ।1।

जिस सम्पूर्ण प्राणियों के लिए सुखकर, हितकारी, निर्विवाद और अविरोधी अस्पर्शयोग का उपदेश किया गया है, उसे मैं नमस्कार करता हूँ ।2।

उनमें से कोई-कोई वादी तो सत् पदार्थ की उत्पत्ति मानते हैं और कोई दूसरे बुद्धिशाली परस्पर विवाद करते हुए असत् पदार्थ की उत्पत्ति स्वीकार करते हैं ।3।

कोई कहते हैं कि सत् वस्तु उत्पन्न नहीं होती और कोई कहते हैं कि असत् वस्तु का जन्म नहीं होता- इस प्रकार परस्पर विवाद करने वाले ये अद्वैतवादी अजाति को ही प्रकाशित करते हैं ।4।

उनके द्वारा प्रकाशित की हुई अजाति का हम भी अनुमोदन करते हैं । हम उनसे विवाद नहीं करते । अतः तुम उस निर्विवाद को अच्छी तरह समझ लो ।5।

ये वादी लोग अजात वस्तु का जन्म होना स्वीकार करते हैं । किन्तु जो पदार्थ निश्चय ही अजात और अमृत है वह मरणशीलता को कैसे प्राप्त हो सकता है ।6।

मरणरहित वस्तु कभी मरणशील नहीं हो सकती और मरणशील कभी मरणहीन नहीं हो सकती, क्योंकि किसी के स्वभाव का विपर्यय किसी प्रकार होने वाला नहीं है ।7।

जिसके मत में स्वभाव से ही मरणहीन धर्म मरणशीलता को प्राप्त हो जाता है, उसके सिद्धान्तानुसार कृतक होने के कारण वह अमृत पदार्थ निश्चल कैसे रह सकेगा ।8।

जो उत्तम सिद्धि द्वारा प्राप्त, स्वाभवसिद्धा, सहजा और अकृता है तथा कभी अपने स्वभाव का परित्याग नहीं करती वही ‘प्रकृति’ है- ऐसा जानना चाहिए ।9।

समस्त जीव स्वभाव से ही जरा मरण से रहित हैं । उनके जरा मरण स्वीकार करने वाले लोग, इस विचार के कारण ही स्वभाव से च्युत हो जाते हैं ।10।

जिसके मत में कारण ही कार्य है उसके सिद्धान्तानुसार कारण ही उत्पन्न होता है किन्तु जबकि वह जन्म लेने वाला है तो अजन्मा कैसे हो सकता है और भिन्न होने पर भी नित्य कैसे हो सकता है ।11।

यदि कारण से कार्य की अभिन्नता है तब तो तुम्हारे मत में कार्य भी अजन्मा है, और यदि ऐसी बात है तो उत्पन्न होने वाले कार्य से अभिन्न होने पर कारण भी किस प्रकार निश्चल रह सकता है ।12।

जिसके मत में अजन्मा वस्तु से ही किसी कार्य की उत्पत्ति होती है उसके पास निश्चय ही इसका कोई दृष्टांत नहीं है । और यदि जात पदार्थ से ही कार्य की उत्पत्ति मानी जाए तो अनवस्था उपस्थित हो जाती है ।13।

जिसके मत में हेतु का कारण फल है और फल का कारण हेतु है वे हेतु और फल के अनादित्व का प्रतिपादन कैसे करते हैं ।14।

जिनके मत में हेतु का कारण फल है और फल का कारण हेतु है उनकी उत्पत्ति ऐसी ही है जैसे पुत्र से पिता का जन्म होना ।15।

तुम्हें हेतु और फल की उत्पत्ति में क्रम स्वीकार करना चाहिए, क्योंकि उनके साथ-साथ उत्पन्न होने में तो सींगों के समान परस्पर सम्बन्ध हो ही नहीं सकता ।16।

तुम्हारे मत में यदि हेतु फल से उत्पन्न होता है तो वह सिद्ध ही नहीं हो सकता और असिद्ध हेतु फल को उत्पन्न कैसे करेगा ।17।

यदि फल से हेतु की सिद्धि होती है और हेतु से फल की सिद्धि होती है तो उनमें पहले कौन हुआ ? जिसकी अपेक्षा से कि दूसरे का आविर्भाव माना जाए ।18।

यह अशक्ति अज्ञान है अथवा फिर तो इससे उपर्युक्त क्रम का भी विपर्यय हो जाता है । इस प्रकार उन बुद्धिमानों ने सर्वथा अजाति को ही प्रकाशित किया है ।19।

बीज-अंकुर नाम से जो दृष्टांत है वह तो सदा साध्य के ही समान है वह साध्य की सिद्धि में उपयोगी नहीं होता ।20।

पौर्वापर्य का जो अज्ञान है वह अनुत्पत्ति का ही प्रकाशक है, क्योंकि यदि कार्य उत्पन्न हुआ होता तो उसका कारण क्यों न ग्रहण किया जाता ।21।

स्वतः अथवा परतः कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती क्योंकि सत्, असत् अथवा सदसत् ऐसी कोई भी वस्तु उत्पन्न नहीं होती ।22।

अनादि फल से कोई हेतु उत्पन्न नहीं हो सकता और इसी प्रकार स्वभाव से ही फल की भी उत्पत्ति नहीं हो सकती, क्योंकि जिस वस्तु का कोई आदि कारण नहीं होता इसका आदि जन्म भी नहीं होता ।23।

प्रज्ञप्ति को सनिमित्त मानना चाहिए नहीं तो द्वैत का नाश हो जाएगा । इसके सिवा क्लेश की उपलब्धि से भी अन्य मतावलम्बियों के शास्त्र द्वारा प्रतिपादित द्वैत की सत्ता मानी गयी है ।24।

पूर्वोक्त युक्ति के अनुसार तुम प्रज्ञप्ति का सविषयत्व स्वीकार करते हो । परन्तु तत्त्व दृष्टि से हम उस विषय का अविष्यत्व मानते हैं ।25।

चित्त किसी पदार्थ का स्पर्श नहीं करता और इसी प्रकार न किसी अर्थाभास का ही ग्रहण करता है । क्योंकि पदार्थ है ही नहीं, इसलिये पदार्थाभास भी उस चित्त से पृथक नहीं है ।26।

तीनों अवस्थाओं में चित्त किसी भी विषय को स्पर्श नहीं करता । फिर उसे बिना निमित्त के ही विपरीत ज्ञान कैसे हो सकता है ।27।

इसलिए चित्त भी उत्पन्न नहीं होता और न चित्त का दृश्य ही उत्पन्न होता है । जो लोग उसका जन्म देखते हैं वे निश्चय ही आकाश में चरण देखते हैं ।28।

क्योंकि अजन्मा चित्त का ही जन्म होता है, इसलिये अजाति ही उसका स्वभाव है, और स्वभाव की विपरीतता किसी प्रकार नहीं होगी ।29।

अनादि संसार का तो कभी अन्तवत्त्व सिद्ध नहीं हो सकेगा और सादि मोक्ष की कभी अनन्तता नहीं हो सकेगी ।30।

जो आदि और अन्त में नहीं है वह वर्तमान में भी वैसा ही है । ये पदार्थ समूह असत् के समान होकर भी सत् जैसे दिखाई देते हैं ।31।

उन जाग्रत पदार्थों की सप्रयोजनता स्वप्नावस्था में असिद्ध हो जाती है । अतः आदि-अन्त युक्त होने के कारण वे निश्चय ही मिथ्या माने गए हैं ।32।

जबकि शरीर के भीतर देखे जाने के कारण स्वप्नावस्था में सभी पदार्थ मिथ्या हैं तो इस संकुचित स्थान में ही भूतों का दर्शन कैसे हो सकता है ।33।

देशान्तर में जाने में जो समय लगता है उसका नियम न होने के कारण स्वप्न के पदार्थों को उनके पास जाकर देखना तो सम्भव नहीं है । इसके सिवा जागने पर भी कोई उस देश में नहीं रहता ।34।

मित्र आदि के साथ मन्त्रणा कर जागने पर उसे नहीं पाता तथा उसने जो कुछ ग्रहण किया होता है उसे जागने पर नहीं देखता ।35।

स्वप्न में जो शरीर होता है वह भी अवस्तु है, क्योंकि उससे भिन्न एक दूसरा शरीर देखा जाता है । जैसा वह शरीर है वैसा ही सम्पूर्ण चित्तदृश्य अवस्तुरूप है ।36।

जाग्रत के समान ग्रहण किया जाने के कारण स्वप्न उसका कार्य माना जाता है । किन्तु जाग्रत का कार्य होने के कारण स्वप्नद्रष्टा के लिए ही जाग्रत अवस्था सत्य मानी जाती है ।37।

उत्पत्ति के प्रसिद्ध न होने के कारण सब कुछ अज ही कहा जाता है । इसके सिवा सत् वस्तु से असत् की उत्पत्ति किसी प्रकार हो भी नहीं सकती ।38।

जाग्रत अवस्था में असत् पदार्थों को देखकर उन्हीं के संस्कारों से युक्त हो उन्हें स्वप्न में देखता है, किन्तु स्वप्नावस्था में भी असत् पदार्थों को ही देखकर जागने पर उन्हें नहीं देखता ।39।

न तो असत् पदार्थ ही असत् कारण वाला है और न सत् पदार्थ ही असत् कारण वाला है । इसी प्रकार सत् पदार्थ भी सत् कारण वाला नहीं है, फिर असत् पदार्थ ही सत् कारण वाला कैसे हो सकता है ।40।

जिस प्रकार मनुष्य भ्रान्तिवश जाग्रत्कालीन अचिन्त्य पदार्थों को यथार्थवत् ग्रहण करता है उसी प्रकार स्वप्न में भी भ्रान्तिवश पदार्थों को वहीं देखता है ।41।

उपलब्धि और आचार के कारण जो पदार्थों की सत्ता स्वीकार करते हैं तथा अजाति से भय मानते हैं, विद्वानों ने सर्वदा उन्हीं के लिए जाति का उपदेश दिया है ।42।

द्वैत की उपलब्धि के कारण जो विपरीत मार्ग में प्रवृत्त होते हैं, अजाति से भय मानने वाले उन लोगों के लिए जातिसम्बन्धी दोष सिद्ध नहीं हो सकते, और यदि होगा भी तो थोड़ा सा ही दोष होगा ।43।

उपलब्धि और आचरण के कारण जिस प्रकार माया जनित हाथी को कहा जाता है उसी प्रकार उपलब्धि और आचरण के कारण ‘वस्तु है’ ऐसा कहा जाता है ।44।

जो कुछ जाति के समान भासने वाला, चल के समान भासने वाला और वस्तु के समान भासने वाला है वह अज, अचल और अवस्तुरूप शान्त और अद्वितीय विज्ञान ही है ।45।

इस प्रकार चित्त उत्पन्न नहीं होता, इसी से आत्मा अजन्मा माने गए हैं । ऐसा जानने वाले लोग ही भ्रम में नहीं पड़ते ।46।

जिस प्रकार अलात (उल्का) का घूमना ही सीधे-टेढ़े आदि रूपों में भासित होता है, उसी प्रकार विज्ञान का स्फुरण ही ग्रहण और ग्राहक आदि रूपों में भास रहा है ।47।

जिस प्रकार स्पन्दनरहित अलात आभासशून्य और अज है, उसी प्रकार स्पन्दनरहित विज्ञान भी आभासशून्य और अज है ।48।

अलात के स्पन्दित होने पर भी वे आभास किसी अन्य कारण से नहीं होते, तथा उसके स्पन्दरहित होने पर भी कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न वे अलात में ही प्रवेश करते हैं ।49।

उनमें द्रव्यत्व के अभाव का योग होने के कारण वे अलात से भी नहीं निकलते हैं । इसी प्रकार आभासत्व में समानता होने के कारण विज्ञान के विषय में भी समझना चाहिए ।50।

विज्ञान के स्पन्दित होने पर भी उसके आभास किसी अन्य कारण से नहीं होते तथा उसके स्पन्दरहित होने पर कहीं अन्यत्र नहीं चले जाते और न विज्ञान में ही प्रवेश कर जाते हैं ।51।

द्रव्यत्व के अभाव का योग होने के कारण वे विज्ञान से भी नहीं निकले, क्योंकि कार्य-कारणता का अभाव होने के कारण वे सदा ही अचिन्तनीय हैं ।52।

द्रव्य का कारण द्रव्य ही हो सकता है और वह भी अन्य द्रव्य का अन्य ही द्रव्य कारण होना चाहिए, किन्तु आत्माओं में द्रव्यत्व और अन्यत्व दोनों ही संभव नहीं हैं ।53।

इस प्रकार न तो बाह्य पदार्थ ही चित्त से हुए हैं और न चित्त ही बाह्य पदार्थों से उत्पन्न हुआ है । अतः मनीषी लोग कार्य-कारण की अनुत्पत्ति ही निश्चित करते है ।54।

जब तक हेतु और फल का आग्रह है तब तक ही हेतु और फल की उत्पत्ति भी है । हेतु और फल का आवेश क्षीण हो जाने पर फिर हेतु और फलरूप संसार की उत्पत्ति भी नहीं होती ।55।

जब तक हेतु और फल का आग्रह है तब तक संसार बढ़ा हुआ है । हेतु और फल का आवेश नष्ट होने पर विद्वान संसार को प्राप्त नहीं होता ।56।

सारे पदार्थ व्यवहारिक दृष्टि से उत्पन्न होते हैं, इसलिए वे नित्य नहीं हैं । परमार्थ दृष्टि से तो सब कुछ अज ही है, इसलिए किसी का विनाश भी नहीं है ।57।

धर्म जो उत्पन्न होते कहे जाते हैं, वे वस्तुतः उत्पन्न नहीं होते । उनका जन्म माया के सदृश है और वह माया भी है नहीं ।58।

जिस प्रकार मायामय बीज से मायामय अंकुर उत्पन्न होता है और वह न तो नित्य ही होता है और न नाशवान ही, उसी प्रकार धर्मों के विषय में भी युक्ति समझनी चाहिए ।59।

इन सम्पूर्ण अजन्मा धर्मों में नित्य-अनित्य नामों की प्रवृत्ति नहीं है, जहाँ शब्द ही नहीं है उस आत्म तत्त्व में विवेक भी नहीं कहा जा सकता ।60।

जिस प्रकार स्वप्न में चित्त माया से द्वैताभासरूप से स्फुरित होता है, उसी प्रकार जाग्रत्कालीन द्वैताभासरूप से भी चित्त माया से ही स्फुरित होता है ।61।

इसमें सन्देह नहीं, स्वप्नावस्था में अद्वय चित्त ही द्वैतरूप से भासने वाला है, इसी प्रकार जाग्रत काल में भी अद्वय मन ही द्वैतरूप से भासने वाला है- इसमें कोई सन्देह नहीं ।62।

स्वप्नद्रष्टा स्वप्न में घूमते-घूमते दसों दिशाओं में स्थित जिन अण्डज अथवा स्वेदज जीवों को सर्वदा देखा करते हैं, वे सब स्वप्नद्रष्टा के चित्त के दृश्य उससे पृथक नहीं होते । इसी प्रकार उस स्वप्नद्रष्टा का यह चित्त भी उसी का दृश्य माना जाता है ।63-64।

जाग्रत अवस्था में घूमते-घूमते जाग्रत अवस्था का साक्षी दसों दिशाओं में स्थित जिन अण्डज अथवा स्वेदज जीवों को सर्वदा देखाता है, वे जाग्रत-चित्त के दृश्य उससे पृथक नहीं होते । इसी प्रकार वह जाग्रत-चित्त भी उसी का दृश्य माना जाता है ।65-66।

वे दोनों एक दूसरे के दृश्य हैं, वे हैं क्या वस्तु- सो कहा नहीं जा सकता । वे दोनों ही प्रमाणशून्य हैं और केवल तच्चित्तता के कारण ही ग्रहण किये जाते हैं ।67।

जिस प्रकार स्वप्न का जीव उत्पन्न होता है और मरता है, उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते और मरते भी हैं ।68।

जिस प्रकार मायामय जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते और मरते भी हैं ।69।

जिस प्रकार मन्त्र आदि से रचा हुआ जीव उत्पन्न होता है और मरता भी है, उसी प्रकार ये सब जीव भी उत्पन्न होते और मरते भी हैं ।70।

कोई जीव उत्पन्न नहीं होता, उसके जन्म की सम्भावना ही नहीं है । उत्तम सत्य तो यही है कि जिसमें किसी वस्तु की उत्पत्ति ही नहीं होती ।71।

विषय और इन्द्रियों के सहित यह सम्पूर्ण द्वैत चित्त का ही स्फुरण है, किन्तु चित्त निर्विषय है, इसी से उसे नित्य असंग कहा गया है ।72।

जो पदार्थ कल्पित व्यवहार के कारण होता है वह परमार्थतः नहीं होता और यदि अन्य मतावलम्बियों के शास्त्रों की परिभाषा के अनुसार हो भी, तो भी वह परमार्थतः नहीं हो सकता ।73।

आत्मा ‘अज’ भी कल्पित व्यवहार के कारण ही कहा जाता है, परमार्थतः तो ‘अज’ भी नहीं है । अन्य मतावलम्बियों के शास्त्रों से सिद्ध जो संवृति है उसके अनुसार उसका जन्म होता है ।74।

लोगों का द्वैत के विषय में केवल आग्रह है । वहाँ द्वैत है ही नहीं । जीव द्वैतभाव का बोध प्राप्त करके ही, फिर कोई कारण न रहने से जन्म नहीं लेता ।75।

जिस समय चित्त उत्तम, मध्यम और अधम हेतुओं को प्राप्त नहीं करता उस समय उसका जन्म भी नहीं होता, क्योंकि हेतु का अभाव होने पर फिर फल कहाँ हो सकता है ।76।

निमित्तशून्य चित्त की जो अनुत्पत्ति है वह सर्वथा निर्विशेष और अद्वितीय है । वह सर्वदा अजात चित्त की ही होती है, क्योंकि यह जो कुछ है, सब चित्त का ही दृश्य है ।77।

अनिमित्तता ही सत्य जानकर और किसी अन्य हेतु को न पाकर विद्वान शोक और काम से रहित अभयपद प्राप्त कर लेता है ।78।

चित्त द्वैत के अभिनिवेश से ही तदनुरूप विषयों में प्रवृत्त होता है तथा वस्तु के अभाव का बोध होने पर ही वह उससे निःसंग होकर लौट आता है ।79।

इस प्रकार निवृत्त और प्रवृत्त न हुए चित्त की उस समय निश्चल स्थिति रहती है । वह परमार्थदर्शी पुरुषों का ही विषय है और वही परम साम्य, अज और अद्वय है ।80।

वह अज, अनिद्र, अस्वप्न और स्वयंप्रकाश है । यह धर्म अपने वस्तुस्वभाव से ही नित्य प्रकाशमान है ।81।

वे भगवान् जिस-तिस द्वैत वस्तु के आग्रह से अनायास ही आच्छादित हो जाते हैं और सदा कठिनता से प्रकट होते हैं ।82।

आत्मा है, नहीं है, है भी और नहीं भी है तथा नहीं है-नहीं है – इस प्रकार क्रमशः चल, स्थिर, उभयरूप और अभावरूप कोटियों से मूर्खलोग परमात्मा को आच्छादित ही करते हैं ।83।

जिनके अभिनिवेश से आत्मा सदा ही आवृत रहता है वे ये चार ही कोटियाँ हैं । इनसे असंस्पृष्ट भगवान् को जिसने देखा है वही सर्वज्ञ है ।84।

इस पूर्ण सर्वज्ञता और आदि, मध्य एवं अन्त से रहित अद्वितीय ब्राह्मण्य पद को पाकर भी क्या फिर कोई चेष्टा करता है ।85।

यह उन ब्राह्मणों का विनय है, यही उनका स्वाभाविक शम कहा जाता है तथा स्वभाव से ही जितेन्द्रिय होने के कारण यही उनका दम भी है । इस प्रकार विद्वान शान्ति को प्राप्त हो जाता है ।86।

वस्तु और उपलब्धि दोनों के सहित जो द्वैत है उसे लौकिक कहते हैं तथा जो द्वैत वस्तु के बिना केवल उपलब्धि के सहित है, उसे शुद्ध लौकिक कहते हैं ।87।

जो वस्तु और उपलब्धि दोनों से रहित है वह अवस्था लोकोत्तर मानी गयी है । इस प्रकार विद्वानों ने सर्वदा ही ज्ञान और ज्ञेय तथा विज्ञेय का निरूपण किया है ।88।

ज्ञान और तीन प्रकार के ज्ञेय को क्रमशः जान लेने पर इस लोक में उस महाबुद्धिमान को स्वयं ही सर्वत्र सर्वज्ञता हो जाती है ।89।

हेय, ज्ञेय, प्राप्तव्य साधन और प्रशमनीय- ये सबसे पहले जानने योग्य हैं । इनमें से ज्ञेय को छोड़कर शेष तीनों में तो केवल अविद्याकल्पितत्व ही माना गया है ।90।

सम्पूर्ण जीवों को स्वभाव से ही आकाश के समान और अनादि जानना चाहिए । उनका नानात्व कहीं कुछ भी नहीं है ।91।

सम्पूर्ण आत्मा स्वभाव से ही नित्य बोधस्वरूप और सुनिश्चित हैं- जिसे ऐसा समाधान हो जाता है वह अमरत्व प्राप्ति में समर्थ होता है ।92।

सम्पूर्ण आत्मा नित्य शान्त, अजन्मा, स्वभाव से ही अत्यन्त उपरत तथा सम और अभिन्न हैं । आत्मतत्त्व अज, समतारूप और विशुद्ध है ।93।

जो लोग सर्वदा भेद में ही विचरते रहते हैं, निश्चय ही उनकी विशुद्धि नहीं होती । द्वैतवादी लोग भेद की ही ओर प्रवृत्त होने वाले हैं, इसलिए वे कृपण माने गए हैं ।94।

जो कोई उस अज और साम्यरूप परमार्थतत्त्व में अत्यन्त निश्चित होंगे वे ही लोक में परम ज्ञानी हैं । उस तत्त्व का सामान्य लोक अवगाहन नहीं कर सकता ।95।

अजन्मा आत्माओं में स्थित अज ज्ञान असंक्रान्त माना जाता है । क्योंकि वह ज्ञान अन्य विषयों में संक्रमित नहीं होता इसलिए उसे असंग बतलाया गया है ।96।

किसी अणुमात्र भी विधर्मी वस्तु की उत्पत्ति मानने पर तो अविवेकी पुरुष की असंगता भी कभी नहीं हो सकती, फिर उसके आवरणनाश के विषयों में तो कहना ही क्या है ।97।

समस्त आत्मा आवरणशून्य, स्वभाव से ही निर्मल तथा नित्य बुद्ध और मुक्त हैं । तथापि स्वामीलोग ‘वे जाने जाते हैं’ ऐसा उनके विषय में कहते हैं ।98।

अखण्ड प्रज्ञावान परमार्थदर्शी का ज्ञान धर्मों में संक्रमित नहीं होता और न सम्पूर्ण धर्म ही कहीं जाते हैं । परन्तु ऐसा ज्ञान बुद्धदेव ने नहीं कहा ।99।

दुर्दर्श, अत्यन्त गम्भीर, अज, निर्विशेष और विशुद्ध पद को भेद रहित जानकर हम उसे यथाशक्ति नमस्कार करते हैं ।100।

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

w

Connecting to %s