योगसूत्र

समाधि पाद

अब योग विषयक अनुशासन ।1।

चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है ।2।

उस समय द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति होती है ।3।

अन्य समय में स्वरूप वृत्ति के ही सदृश होता है ।4।

क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूप से वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं ।5।

प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति ।6।

प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम- ये ‘प्रमाण’ हैं ।7।

वस्तु में किसी अन्य वस्तु का मिथ्या ज्ञान ‘विपर्यय’ है ।8।

वस्तु के न होने पर भी शब्द मात्र से होने वाला ज्ञान ‘विकल्प’ है ।9।

अभाव के प्रत्यय को ग्रहण करने वाली वृत्ति ‘निद्रा’ है ।10।

अनुभूत विषय का न भूलना ‘स्मृति’ है ।11।

इनका निरोध ‘अभ्यास’ और ‘वैराग्य’ से होता है ।12।

इनमें स्थिरता के लिए प्रयत्न करना ‘अभ्यास’ है ।13।

परन्तु वह दीर्घ काल तक निरन्तर और श्रद्धापूर्वक सेवन किये जाने पर दृढ़ अवस्था को प्राप्त होता है ।14।

देखे-सुने हुए विषयों की तृष्णा रहित अवस्था वशीकार नामक वैराग्य है ।15।

‘पुरुष’ के ज्ञान से प्रकृति के गुणों में तृष्णा का अभाव ‘परम वैराग्य’ है ।16।

वितर्क, विचार,आनन्द,अस्मिता- से सम्बन्धयुक्त वृत्ति-निरोध ‘सम्प्रज्ञात’ है ।17।

विराम-प्रत्यय के अभ्यास के पहले, जब केवल संस्कार शेष रह जाते हैं, वह ‘असम्प्रज्ञात’ है ।18।

जन्म से ज्ञान, विदेह और प्रकृतिलयों का है, यही भव-प्रत्यय है ।19।

और अन्यों को श्रद्धा, वीर्य, स्मृति, समाधि और प्रज्ञा आदि उपायों से सिद्ध होता है ।20।

तीव्र संवेग वालों को शीघ्रतम सिद्ध होता है ।21।

उनमें भी मृदु, मध्यम और उच्च भेद के कारण विशिष्टता दिखाई देती है ।22।

या ईश्वरप्रणिधान से भी सिद्ध होती है ।23।

क्लेश, कर्म, कर्मफल और कर्म-संस्कार से सर्वथा असम्बन्धित पुरुष-विशिष्ट ‘ईश्वर’ है ।24।

उसमें अतिशय की धारणा से रहित सर्वज्ञता का बीज है ।25।

वह पूर्वजों का भी गुरु है, उसका काल से अवच्छेद नहीं है ।26।

प्रणव उसका वाचक है ।27।

इसका जप और इसके अर्थ की भावना करनी चाहिये ।28।

इससे अन्तर्दृष्टि प्राप्त होती है और विघ्नों का भी अभाव होता है ।29।

व्याधि, मानसिक जड़ता, सन्देह, प्रमाद, आलस्य, विषय-तृष्णा, एकाग्रता न पाना और पाने पर भी उसका न ठहरना- ये चित्त के विक्षेप ही विघ्न हैं ।30।

दुःख, मन का क्षोभ, शरीर हिलना, अनियमित श्वास-प्रश्वास- ये विक्षेपों के साथ उत्पन्न होते हैं ।31।

इनको दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए ।32।

सुख, दुःख, पुण्य और पाप- के प्रति मैत्री, करुणा, मुदित और उपेक्षा की भावना से चित्त प्रसन्न होता है ।33।

प्राणवायु को बाहर निकलने और धारण करने के अभ्यास से भी ।34।

विषयों से सम्बन्धित दिव्य प्रवृत्तियाँ भी उत्पन्न होकर मन की स्थिति को बाँधने वाली हो जाती हैं ।35।

अथवा शोकरहित उस ज्योतिमय प्रवृत्ति से भी ।36।

वीतराग को विषय करने वाला चित्त भी ।37।

स्वप्न और निद्रा के ज्ञान का आलम्बन करने से भी ।38।

अथवा जिसको जो अभिमत हो उसके ध्यान से भी ।39।

इससे, सूक्ष्म से लेकर महान् तक उसकी वशीकार अवस्था हो जाती है ।40।

जिसकी समस्त वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी है, ऐसे स्फटिक मणि की भाँति निर्मल चित्त का ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय में स्थिर और तदाकार हो जाना ही अम्प्रज्ञात समाधि है ।41।

शब्द, अर्थ और ज्ञान- ये विकल्प जब मिश्रित अवस्था मे रहते हैं तब वह सवितर्क समाधि है ।42।

स्मृति के परिशुद्ध हो जाने पर, शून्य-स्वरूप, केवल ध्येय का अर्थ मात्र प्रकाशित करने वाली स्थिति निर्वितर्क समाधि है ।43।

इन्हीं से सूक्ष्म-विषयी सविचार और निर्विचार समाधि की भी व्याख्या होती है ।44।

और सूक्ष्म की विषयता अव्यक्त प्रकृति पर्यन्त है ।45।

ये सभी सबीज समाधि हैं ।46।

निर्विचार समाधि की निर्मलता से चित्त की स्थिति दृढ़ हो जाती है ।47।

उस समय बुद्धि ऋतंभरा हो जाती है ।48।

श्रवण और अनुमान वाली बुद्धि से यह बुद्धि भिन्न है, यह विशेष अर्थ वाली है ।49।

इससे उत्पन्न संस्कार अन्य संस्कारों का प्रतिबन्धक है ।50।

और उसका भी निरोध हो जाने पर, सबका निरोध हो जाने से निर्बीज समाधि होती है ।51।

साधन पाद

तप, स्वाध्याय और ईश्वर शरणागति- ये क्रियायोग है।1।

यह समाधि की सिद्धि करने वाला और क्लेशों को क्षीण करने वाला है ।2।

अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश- ये क्लेश हैं ।3।

प्रसुप्त, शिथिल, विच्छिन्न और उदार अवस्था में रहने वाले अन्य क्लेशों का उत्पत्ति क्षेत्र ही ‘अविद्या’ है ।4।

अनित्य, अपवित्र, दुःख और अनात्मा में नित्य, पवित्र, सुख और आत्मभाव की प्रतीति ‘अविद्या’ है ।5।

दृक्-शक्ति और दर्शन-शक्ति के एकात्म का भाव ‘अस्मिता’ है ।6।

सुख की प्रतीति से सम्बद्ध क्लेश ‘राग’ है ।7।

दुःख की प्रतीति से सम्बद्ध क्लेश ‘द्वेष’ है ।8।

स्वभावगत और रूढ़ों और विद्वानों में भी विद्यमान जीवन के प्रति ममता ‘अभिनिवेश’ है ।9।

उन सूक्ष्म संस्कारों का उनके प्रति-प्रसव के द्वारा नाश होता है ।10।

ध्यान के द्वारा उनकी वृत्तियाँ नष्ट होती हैं ।11।

कर्म-समुदाय का मूल क्लेश ही हैं, जो कि उन दृष्ट और अदृष्ट जन्म रूपी वेदना का कारण है ।12।

मूल के विद्यमान रहने तक उसके परिणाम स्वरूप जाति, आयु और भोग होते हैं ।13।

वे पुण्य और अपुण्य के कारण हर्ष और शोकरूप फल देने वाले होते हैं ।14।

परिणाम-दुःख, ताप-दुःख और संस्कार-दुख और तीनों गुणों की वृत्तियों में परस्पर विरोध होने के कारण विवेकी के लिए सब दुःख ही है ।15।

आने वाला दुःख नष्ट करने योग्य है ।16।

द्रष्टा और दृश्य का संयोग दुःख का कारण है ।17।

प्रकाश, क्रिया और स्थिति जिसका स्वभाव है, भूत और इन्द्रियाँ जिसका स्वरूप है, पुरुष के लिए भोग और मुक्ति का सम्पादन ही जिसका प्रयोजन है- ऐसी ‘दृश्य’ है ।18।

विशेष, अविशेष, लिंगमात्र और अलिंग- ये गुणों की अवस्थाएँ हैं ।19।

द्रष्टा चेतनमात्र और शुद्ध स्वरूप है, तो भी बुद्धि की वृत्ति के अनुरूप देखने वाला है ।20।

इसी अर्थ के लिए दृश्य का स्वरूप है ।21।

कृतार्थ पुरुष के प्रति नष्ट हुई भी वह नष्ट नहीं है, क्योंकि दूसरों के लिए वह साधारण ही है ।22।

स्व-शक्ति और स्वामी-शक्ति- दोनों के स्वरूप की प्राप्ति के लिए ही दोनों का संयोग है ।23।

उस संयोग का कारण ‘अविद्या’ है ।24।

अविद्या के अभाव से संयोग का अभाव होता है, वही ‘हान’ (अज्ञान-निवृत्ति अथवा दुःख-नाश) है और वही द्रष्टा का कैवल्य है ।25।

निरन्तर विवेक का अभ्यास ही ‘हान’ का उपाय है ।26।

उस विवेकी की प्रज्ञा के सात उच्चतम सोपान हैं ।27।

योग के अनुष्ठान से हुई विशुद्धि से ज्ञान प्रदीप्त होता है, वह अन्तिम स्थिति विवेकख्याति है ।28।

यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि- आठ अंग हैं ।29।

अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह- यम हैं ।30।

जाति, देश, काल और निमित्त से रहित सार्वभौम होने पर ये ही ‘महाव्रत’ कहे जाते हैं ।31।

शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान- ये नियम हैं ।32।

इनके विरोधी भावों की बाधा का प्रतिपक्षी भाव से निषेध करना चाहिए ।33।

हिंसा आदि विरोधी भाव हैं । लोभ, क्रोध अथवा मोह पूर्वक स्वयं किये हुए, दूसरों से करवाये हुए या अनुमोदन किये हुए । मृदु, मध्यम और अधिमात्रा वाले हैं, जो कि दुःख और अज्ञान रूपी अनन्त फल देने वाले हैं । इस प्रकार ही प्रतिपक्ष की भावना है ।34।

अहिंसा में प्रतिष्ठित हो जाने पर उसके सान्निध्य से ही वैर का त्याग हो जाता है ।35।

सत्य में प्रतिष्ठित हो जाने पर कर्मफल के आश्रय का भाव (वचन-सिद्धि) आ जाता है ।36।

अस्तेय में प्रतिष्ठित हो जाने पर सब रत्न प्रकट हो जाते हैं ।37।

ब्रह्मचर्य में प्रतिष्ठा होने से वीर्यलाभ होता है ।38।

अपरिग्रह में प्रतिष्ठित होने पर पूर्व जन्मों की स्मृति का उदय होता है ।39।

‘शौच’ से अपने अंगों के प्रति वैराग्य और दूसरों से संसर्ग की इच्छा नहीं होती ।40।

और अंतःकरण की शुद्धि, मन की प्रसन्नता, एकाग्रता, इन्द्रिय-जय और आत्म-दर्शन की योग्यता उपलब्ध होती है ।41।

‘संतोष’ से उत्तमोत्तम सुख का लाभ होता है ।42।

‘तप’ से अशुद्धि का क्षय होने के कारण शरीर और इन्द्रियों की सिद्धि होती है ।43।

‘स्वाध्याय’ से इष्टदेवता की प्राप्ति होती है ।44।

‘ईश्वर-प्रणिधान’ से समाधि की सिद्धि हो जाती है ।45।

सुखपूर्वक स्थिर होना ही ‘आसन’ है ।46।

प्रयत्न की शिथिलता से और अनन्त में मन लगाने से सिद्ध होता है ।47।

उससे फिर द्वन्दों का आघात नहीं होता ।48।

इसके पश्चात् श्वास-प्रश्वास की गति का संयत होना ‘प्राणायाम’ है ।49।

बह्यवृत्ति, आभ्यन्तरवृत्ति और स्तम्भवृत्ति वाला यह देश, काल और संख्या से देखे जाने से दीर्घ और सूक्ष्म होता है ।50।

बाहर और भीतर के विषयों का त्याग हो जाने पर अपने आप होने वाला चौथा (प्राणायाम) है ।51।

उससे प्रकाश का आवरण क्षीण हो जाता है ।52।

तथा धारणा में मन की योग्यता हो जाती है ।53।

इन्द्रियों का अपने विषयों को छोड़कर चित्त के ही स्वरूपाकार सा हो जाना ‘प्रत्याहार’ है ।54।

उससे इन्द्रियों पर सम्पूर्ण रूप से जय प्राप्त होती है ।55।

विभूति पाद

चित्त का किसी देश में निबन्धित होना ‘धारणा’ है ।1।

उसी में वृत्ति का एकतार चलना ‘ध्यान’ है ।2।

शून्य-स्वरूप जब अर्थ मात्र की ही प्रतीति रहे तब वह ‘समाधि’ है ।3।

तीनों का एक साथ अभ्यास ही ‘संयम’ है ।4।

उसको जीत लेने से प्रज्ञा का प्रकाश होता है ।5।

उसका प्रयोग सोपान-क्रम से करना चाहिए ।6।

पहले कहे गए अंगों की अपेक्षा ये तीनों अन्तरंग हैं ।7।

निर्बीज समाधि के लिए तो ये भी बहिरंग ही हैं ।8।

व्युत्थान अवस्था के संस्कारों का दब जाना और निरोध अवस्था के संस्कारों का प्रकट हो जाना- इस प्रकार निरोधकाल में चित्त का निरोध-संस्कार के अनुगत होना निरोध परिणाम है ।9।

इस संस्कार से चित्त की गति प्रशान्त होती है ।10।

समस्त विषयों की चिन्तन-वृत्ति का क्षय और एकाग्रता-शक्ति का उदय होना- यह चित्त का समाधि परिणाम है ।11।

तब फिर शान्त और उदय होने वाली दोनों ही वृत्तियाँ एक सी हो जाती हैं, तब वह चित्त का एकाग्रता परिणाम है ।12।

इन्हीं से समस्त भूतों और इन्द्रियों में होने वाले धर्म, लक्षण और अवस्था परिणाम भी कहे गए ।13।

शान्त, उदित और आने वाले धर्म जिसमें अवस्थित हैं वही धर्मी है ।14।

क्रम की भिन्नता ही परिणाम की भिन्नता का कारण है ।15।

तीनों परिणामों में संयम करने से भूत और भविष्य का ज्ञान होता है ।16।

शब्द, अर्थ और प्रत्यय- इनका आपस में अध्यास हो जाने के कारण जो संकरण हो रहा है उसके विभाग में संयम करने से समस्त प्राणियों की वाणी का ज्ञान होता है ।17।

संयम द्वारा संस्कारों का साक्षात्कार करने से पूर्व जन्मों का ज्ञान होता है ।18।

दूसरों की चित्त वृत्ति के संयम से उसके चित्त का ज्ञान होता है ।19।

किन्तु उसे आलम्बन सहित नहीं जान सकते क्योंकि वह संयम का विषय नहीं है ।20।

शरीर के रूप में संयम करने से जब उसकी ग्राह्य शक्ति रोक ली जाती है, तब चक्षु के प्रकाश का उसके साथ सम्बन्ध न होने के कारण अन्तर्धान हो जाता है ।21।

इसी से शब्द आदि के अन्तर्धान होने की व्याख्या भी होती है ।22।

शीघ्र और देर से फल देने वाले- ऐसे दो प्रकार के कर्मों में संयम करने से और अरिष्टों से भी मृत्यु का समय जान लेता है ।23।

मैत्री आदि गुणों में संयम करने से वे प्रबल होते हैं ।24।

हाथी आदि के बल में संयम करने से उसके सदृश बल प्राप्त होता है ।25।

महाज्योति में संयम करने से सूक्ष्म, व्यवधान-युक्त अथवा दूरवर्ती वस्तुओं का ज्ञान होता है ।26।

सूर्य में संयम करने से सम्पूर्ण भुवन का ज्ञान होता है ।27।

चन्द्रमा में संयम करने से तारासमूह का ज्ञान होता है ।28।

ध्रुव तारे में संयम से ताराओं की गति का ज्ञान होता है ।29।

नाभिचक्र में संयम से शरीर के व्यूह का ज्ञान होता है ।30।

कण्ठकूप में संयम से भूख और प्यास की निवृत्ति हो जाती है ।31।

कूर्मनाड़ी में संयम से स्थिरता प्राप्त होती है ।32।

कपाल-ज्योति में संयम से सिद्धों के दर्शन होते हैं ।33।

अथवा नैसर्गिक प्रतिभा से भी इन सबका ज्ञान हो जाता है ।34।

हृदय में संयम करने से चित्त के स्वरूप का ज्ञान होता है ।35।

बुद्धि और पुरुष जो अत्यन्त भिन्न हैं, इन दोनों की प्रतीति का जो अभेद है वही भोग है । उसमें परार्थ-प्रतीति से भिन्न जो स्वार्थ-प्रतीति है उसमें संयम करने से पुरुष का ज्ञान होता है ।36।

इससे प्रातिभ, श्रावण, वेदन, दर्शन, अस्वाद, और वार्ता ये छः सिद्धियाँ प्रकट होती हैं ।37।

ये समाधि की सिद्धि में विघ्न हैं और व्युत्थान में सिद्धियाँ हैं ।38।

बन्धन के कारण की शिथिलता से और चित्त की गति का भली-भाँति ज्ञान होने से चित्त का दूसरे के शरीर में प्रवेश किया जा सकता है ।39।

उदान वायु को जीत लेने से जल, कीचड़, कंटक आदि से शरीर का संयोग नहीं होता और उर्ध्व गति भी होती है ।40।

समान वायु को जीत लेने से दीप्तिमान हो जाता है ।41।

श्रोत्र और आकाश के परस्पर सम्बन्ध में संयम करने से दिव्य श्रोत्र प्राप्त होता है ।42।

शरीर और आकाश के सम्बन्ध में संयम करने और हल्की वस्तु में संयम करने से आकाश गमन कर सकता है ।43।

शरीर के बाहर अकल्पित वृत्ति महाविदेहा है, उससे ज्ञान के आवरण का नाश होता है ।44।

भूतों की स्थूल, सूक्ष्म, स्वरूप, अन्वय और अर्थ तत्त्व- इन पाँच प्रकार की अवस्थाओं में संयम करने से पाँचों भूतों पर विजय प्राप्त होती है ।45।

उस भूत विजय से अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ, शरीर की सम्पदाएँ और उन भूतों के धर्मों से बाधा न होना- ये तीनों प्राप्त होते हैं ।46।

रूप, लावण्य, बल और वज्र के समान संगठन- ये शरीर की सम्पदाएँ हैं ।47।

ग्रहण, स्वरूप, अस्मिता, अन्वय और अर्थवत्त्व- इनमें संयम करने से इन्द्रियों पर विजय प्राप्त होती है ।48।

इससे शरीर को मन के सदृश गति, शरीर के बिना भी विषयों के अनुभव की शक्ति और प्रकृति पर विजय होती है ।49।

बुद्धि और पुरुष के भेद को जानने वाले का सब भावों पर स्वामित्व और सर्वज्ञ भाव हो जाता है ।50।

इन सब में भी वैराग्य हो जाने से दोष के बीज का नाश हो जाने पर कैवल्य की प्राप्ति होती है ।51।

देवताओं के बुलाने पर न तो संग करना चाहिए न अभिमान करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से पुनः अनिष्ट होना सम्भव है ।52।

क्षण और उसके क्रम में संयम करने से विवेक ज्ञान उत्पन्न होता है ।53।

जाति, लक्षण और देशभेद से जिन वस्तुओं का भेद न किये जा सकने के कारण जो तुल्य प्रतीत होती हैं, उनको भी इस विवेक से जाना जा सकता है ।54।

जो संसार से तारने वाला है, सब को जानने वाला है, सब प्रकार से जानने वाला है और बिना क्रम के जानने वाला है वह विवेक जनित ज्ञान है ।55।

बुद्धि और पुरुष की जब समान भाव से शुद्धि हो जाती है तब कैवल्य होता है ।56।

कैवल्य पाद

सिद्धियाँ जन्म, औषधि, मन्त्र, तप और समाधि से होती हैं ।1।

एक जाति से दूसरी जाति में बदल जाना प्रकृति के पूर्ण होने पर होता है ।2।

निमित्त प्रकृतियों को चलाने वाला नहीं है, उससे तो किसान की भाँति रुकावट का छेदन किया जाता है ।3।

निर्माण हुए चित्त केवल अस्मिता से होते हैं ।4।

अनेक चित्तों को नाना प्रकार की प्रवृत्तियों में नियुक्त करने वाला एक चित्त ही है ।5।

उनमें से जो ध्यान जनित चित्त होता है वह कर्म संस्कारों से रहित होता है ।6।

योगी के कर्म अशुक्ल और अकृष्ण होते हैं, अन्यों के तीन प्रकार के ।7।

उनसे उनके फलभोग के अनुसार वासनाओं की ही अभिव्यक्ति होती है ।8।

स्मृति और संस्कार एकरूप होने के कारण जाति, देश और काल का व्यवधान रहने पर भी, वासनाओं का अन्तर नहीं होता, ये एकरूप रहती हैं ।9।

सुख की इच्छा नित्य होने के कारण वासनाएँ भी अनादि हैं ।10।

हेतु, फल, आश्रय और विषय- इनसे वासनाओं का संग्रह होता है, इसलिए इन का अभाव होने से उनका भी अभाव हो जाता है ।11।

धर्मों में काल का भेद होता है इस कारण अतीत और अनागत धर्म भी स्वरूप में विद्यमान रहते हैं ।12।

वे व्यक्त और सूक्ष्म में गुणस्वरूप ही हैं ।13।

परिणाम की एकता से वस्तु तत्त्व एक है ।14।

वस्तु में समता होने पर भी चित्त के भेद से वस्तु और चित्त का मार्ग भिन्न है ।15।

इसके सिवाय दृश्य वस्तु किसी एक चित्त के अधीन नहीं है अन्यथा चित्त के अभाव में वस्तु का क्या होगा ।16।

विषय का चित्त पर प्रतिबिम्ब पड़ने से वस्तु का ज्ञान होता है । प्रतिबिम्ब न होने से ज्ञान भी नहीं होता ।17।

उस चित्त का स्वामी पुरुष परिणामी नहीं है इसलिए चित्त की वृत्तियाँ उसे सदा ज्ञात रहती हैं ।18।

वह चित्त स्वप्रकाश नहीं है क्योंकि वह दृश्य है ।19।

तथा एक समय में चित्त और विषय दोनों का ग्रहण नहीं हो सकता ।20।

एक चित्त को दूसरे चित्त का दृश्य मान लेने पर वह दूसरा चित्त फिर तीसरे चित्त का दृश्य होगा- इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृति का भी मिश्रण हो जाएगा ।21।

चित्त-शक्ति क्रियारहित और असंग है तो भी तदाकार हो जाने पर अपनी बुद्धि का ज्ञान होता है ।22।

द्रष्टा और दृश्य- इन दोनों से रंगा हुआ चित्त सब अर्थ वाला हो जाता है ।23।

वह असंख्य वासनाओं से चित्रित होने पर भी दूसरे के लिए है, क्योंकि वह संयुक्त होकर कार्य करने वाला है ।24।

इस प्रकार विशेषदर्शी का चित्त में आत्मभाव नही रह जाता ।25।

तब चित्त विवेक में झुका हुआ कैवल्य के अभिमुख हो जाता है ।26।

उसके बीच जो अन्यान्य ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे संस्कारों से आते हैं ।27।

इन संस्कारों का नाश क्लेशों की भाँति कहा गया है ।28।

जिसका विवेक ज्ञान की महिमा में भी वैराग्य हो जाता है, उसका विवेक सर्वथा प्रकाशित रहने के कारण उसे धर्ममेघ समाधि की प्राप्ति होती है ।29।

उससे क्लेश और कर्म का सर्वथा नाश हो जाता है ।30।

तब ज्ञान समस्त आवरण और अशुद्धि से रहित होने के कारण अनन्त हो जाता है, अतः ज्ञेय अल्प हो जाता है ।31।

जब गुणों का काम समाप्त हो जाता है, तब गुणों के परिणाम-क्रम की भी समाप्ति हो जाती है।32।

प्रतिक्षण होने वाले परिणामों के पश्चात् ग्रहण करने योग्य ज्ञान को ‘क्रम’ कहते हैं ।33।
पुरष के अर्थ से शून्य गुणों का प्रतिलोम क्रम से लय हो जाना अथवा चित्त-शक्ति का अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाना ‘कैवल्य’ है ।34।

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