अष्टावक्र गीता

पहला प्रकरण

जनक ने कहा – ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ? मुक्ति कैसे होती है ? और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है ? प्रभु ! यह मुझसे कहिये ।1।

अष्टावक्र ने कहा – मुक्ति चाहता है तो विषयों को विष के समान छोड़ दे और क्षमा, दया, सरलता, सन्तोष और सत्य को अमृत के समान सेवन कर ।2।

तू न पृथ्वी है, न जल है, न अग्नि है, न वायु है, न आकाश है । मुक्ति के लिए अपने को इन सबका साक्षी चैतन्यरूप जान ।3।

यदि देह को अपने से अलग कर और चैतन्य में विश्राम कर स्थित है तो अभी ही सुखी, शान्त और बन्ध-मुक्त हो जाएगा ।4।

तू ब्राह्मण आदि वर्ण नहीं है और न तू किसी आश्रम वाला है, न आँख आदि इन्द्रियों का विषय है । तू असंग, निराकार और विश्व का साक्षी है, ऐसा जानकर सुखी हो ।5।

हे विभो ! धर्म और अधर्म, सुख और दुःख मन के हैं । तेरे लिए नहीं । तू न कर्ता है, न भोक्ता है । तू तो सर्वदा मुक्त ही है ।6।

तू एक सबका द्रष्टा है और सदा ही मुक्त है । तेरा बन्धन यही है कि तू अपने को छोड़कर दूसरे को द्रष्टा देखता है ।7।

‘मैं कर्ता हूँ’, ऐसा अहंकाररूपी विशाल काले सर्प से दंशित हुआ तू, ‘ मैं कर्ता नहीं हूँ’, ऐसे विश्वास रूपी अमृत को पीकर सुखी हो ।8।

‘मैं एक विशुद्ध बोध हूँ’ ऐसी निश्चय रूपी अग्नि से गहन अज्ञान को जलाकर तू शोक रहित हुआ सुखी हो ।9।

यहाँ यह विश्व रस्सी में सर्प के समान भासता है । यही आनन्द-परमानन्द रूपी बोध है । अतः तू सुखपूर्वक विचर ।10।

मुक्ति का अभिमानी मुक्त है, और बद्ध का अभिमानी बद्ध है । यहाँ यह किवदन्ती सत्य ही है कि जैसी मति वैसी ही गति होती है ।11।

आत्मा साक्षी है, व्यापक है, पूर्ण है, एक है, मुक्त है, चैतन्यस्वरूप है, क्रियारहित है, असंग है, निस्पृह है, शान्त है । यह भ्रम से संसारी जैसा भासता है ।12।

‘मैं अभासरूप हूँ’ ऐसे भ्रम को एवं बाहर-भीतर के भाव को छोड़कर तू कूटस्थ बोधरूप एवं अद्वैत, आत्मा का विचार कर ।13।

हे पुत्र ! तू बहुत काल से देहाभिमान के पाश से बँधा हुआ है । उसी पाश को ‘मैं बोध हूँ’ इस ज्ञान की तलवार से काटकर तू सुखी हो ।14।

तू असंग है, क्रिया रहित है, स्वयंप्रकाश है और निरञ्जन है । तेरा बन्धन यही है कि तू समाधि के लिए अनुष्ठान करता है ।15।

यह संसार तुझमें व्याप्त है, तुझी में पिरोया है । यथार्थतः तू चैतन्यस्वरूप है । अतः क्षुद्रचित्त को मत प्राप्त हो ।16।

तू निरपेक्ष, निर्विकार, स्वनिर्भर है । शान्ति और मुक्ति का स्थान है, अगाध बुद्धिरूप है, क्षोभ-शून्य है । अतः चैतन्यमात्र में निष्ठा वाला हो ।17।

साकार को मिथ्या जान, निराकार को निश्चल जान । इस तत्व के उपदेश से संसार में पुनः उत्पत्ति नहीं होती ।18।

जिस तरह दर्पण अपने में प्रतिबिम्बित रूप के भीतर और बाहर स्थित है । उसी प्रकार परमात्मा इस शरीर के भीतर और बाहर स्थित है ।19।

जिस प्रकार सर्वव्यापी एक आकाश घट के भीतर और बाहर स्थित है, उसी तरह नित्य और निरन्तर ब्रह्म सब भूतों में स्थित है ।20।

दूसरा प्रकरण

जनक ने कहा – ‘मैं निरञ्जन हूँ, शान्त हूँ, बोध हूँ, प्रकृति के परे हूँ, आश्चर्य है । किन्तु मैं इतने काल तक मोह के द्वारा ठगा गया हूँ’ ।1।

जैसे इस देह को मैं अकेला ही प्रकाशित करता हूँ, वैसे ही संसार को भी प्रकाशित करता हूँ । इसलिए तो मेरा सम्पूर्ण संसार है अथवा कुछ भी नहीं ।2।

आश्चर्य है कि शरीर सहित विश्व को त्यागकर किसी कुशलता से ही अब मैं परमात्मा को देखता हूँ ।3।

जैसे जल से तरंग, फेन और बुदबुदा भिन्न नहीं है, वैसे ही विश्व आत्मा से भिन्न नहीं है किन्तु आत्मा से ही निकला हुआ है ।4।

जैसे विचार करने पर वस्त्र तन्तु मात्र ही होता है, वैसे ही विचार करने से यह संसार आत्मसत्ता मात्र ही है ।5।

जैसे ईख के रस से बनी हुई शर्करा ईख के रस में व्याप्त है, वैसे ही मुझसे बना हुआ संसार मुझमें भी व्याप्त है ।6।

आत्मा के अज्ञान से संसार भासता है, आत्मा के ज्ञान नहीं भासता है । जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प भासता है, उसके अज्ञान से नहीं भासता है ।7।

प्रकाश मेरा निजी स्वरूप है । मैं उससे भिन्न नहीं हूँ । जब संसार प्रकाशित होता है तब वह मेरे ही से प्रकाशित होता है ।8।

आश्चर्य है कि कल्पित संसार अज्ञान से मुझे ऐसा भासता है जैसे सीपी में चाँदी, रस्सी में साँप, सूर्य की किरणों में जल भासता है ।9।

मुझसे उत्पन्न यह संसार मुझमें ही लय को प्राप्त होगा जैसे मिट्टी में घड़ा, जल में लहर और सोने में आभूषण लय होते हैं ।10।

मैं आश्चर्यमय हूँ । मुझको नमस्कार है । ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त जगत के नाश होने पर भी मेरा नाश नहीं है ।11।

मैं आश्चर्यमय हूँ । मुझको नमस्कार है । मैं देहधारी होते हुए भी अद्वैत हूँ । न कहीं जाता हूँ, न आता हूँ और विश्व में व्याप्त हुआ स्थित हूँ ।12।

मैं आश्चर्यमय हूँ । मुझको नमस्कार है । इस संसार में मेरे समान निपुण कोई नहीं । क्योंकि शरीर को स्पर्श किये बिना ही इस विश्व को सदा धारण किये रहता हूँ ।13।

मैं आश्चर्यमय हूँ । मुझको नमस्कार है । मेरा कुछ भी नहीं है, अथवा मेरा सब कुछ है – जो मन और वाणी का विषय है ।14।

ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता ये तीनों यथार्थ नहीं हैं । जहाँ ये तीनों अज्ञान से ही भासते हैं ।मैं वही निरञ्जन हूँ ।15।

अहो ! दुःख का मूल द्वैत है, उसकी औषधि अन्य कोई नहीं । यह सब दृश्य मिथ्या है । मैं एक विशुद्ध चैतन्यरस हूँ ।16।

मैं बोधमात्र हूँ । किन्तु मेरे द्वारा अज्ञान से उपाधि की कल्पना की गई है । इस प्रकार नित्य विचार करते हुए मैं निर्विकल्प में स्थित हूँ ।17।

आश्चर्य है ! मुझमें स्थित हुआ विश्व वास्तव में मुझमें स्थित नहीं है । इसलिए न मेरा बन्ध है, न मोक्ष ।18।

निश्चय ही शरीरयुक्त यह विश्व कुछ भी नहीं है । यह शुद्ध चैतन्यमात्र आत्मा है तो इसकी कल्पना ही किसमें है ।19।

यह शरीर, स्वर्ग, नरक, बन्ध, मोक्ष व भय कल्पना मात्र ही हैं । उससे मुझ चैतन्य आत्मा को क्या प्रयोजन ।20।

आश्चर्य है कि जन समूह में भी मुझे द्वैत दिखाई नहीं देता है । यह अरण्यवत् हो गया है तो फिर मैं किससे प्रेम करूँ ।21।

न मैं शरीर हूँ, न मेरा शरीर है, मैं जीव नहीं हूँ, निश्चय ही मैं चैतन्यमात्र हूँ । मेरा यही बन्ध था कि मेरी जीने की इच्छा थी ।22।

आश्चर्य की अनन्त समुद्ररूप मुझमें चित्तरूपी हवा के उठने पर शीघ्र ही विचित्र जगतरूपी तरंगें पैदा होती हैं ।23।

अनन्त महासागररूप मुझ में चित्तरूप वायु के शान्त होने पर जीवरूप व्यापारी के अभाग्य से जगत रूपी नौका नाश को प्राप्त होती है ।24।

आश्चर्य है कि अनन्त महासागररूप मुझमें जीवरूप तरंगें उठती हैं, परस्पर संघर्ष करती हैं, खेलती हैं तथा स्वभाव से ही लय हो जाती हैं ।25।

तीसरा प्रकरण

अष्टावक्र कहते हैं – आत्मा को तत्वतः एक और अविनाशी जानकर भी तुझ आत्मज्ञानी धीर को धन कमाने में आसक्ति क्यों है ।1।

आश्चर्य कि आत्मा के अज्ञान से विषय का भ्रम होने पर वैसी ही प्रीति होती है जैसी सीपी के अज्ञान से चाँदी की भ्रान्ति में लोभ होता है ।2।

जहाँ यह विश्व आत्मा में समुद्र में तरंग के समान स्फुरित होता है, ‘वही मैं हूँ’, ऐसा जानकर क्यों तू दीन की तरह दौड़ता है ।3।

आत्मा को शुद्ध चैतन्य व अति सुन्दर सुनकर भी कैसे कोई इन्द्रिय के विषय में अत्यन्त आसक्त होकर मलिनता को प्राप्त होता है ।4।

सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों को जानकर भी मुनि को ममता होती है । यही आश्चर्य है ।5।

परम अद्वैत में स्थित हुआ और मोक्ष के लिए भी उद्यत हुआ पुरुष काम के वश होकर क्रीड़ा के अभ्यास से व्याकुल होता है । यही आश्चर्य है ।6।

काम को उद्भूत ज्ञान का शत्रु जानकर भी अति दुर्बल और अन्तकाल को प्राप्त हुआ पुरुष काम भोग की इच्छा करता है । यही आश्चर्य है ।7।

जो इहलोक और परलोक के भोग से विरक्त है और जो नित्य और अनित्य का विवेक रखता है वह भी मोक्ष से भय करता है । यही आश्चर्य है ।8।

धीर पुरुष तो भोगता हुआ भी और पीड़ित होता हुआ भी नित्य केवल आत्मा को देखता हुआ न प्रसन्न होता है, न क्रुद्ध होता है ।9।

जो अपने चेष्टारत शरीर को दूसरे के शरीर की भाँति देखता है, वह महाशय पुरुष स्तुति और निन्दा में भी कैसे क्षोभ को प्राप्त हो सकता है ।10।

जो इस विश्व को मायामात्र देखता है, और जो आश्चर्य को पार कर गया है, वह धीर पुरुष मृत्यु के आने पर भी क्यों भयभीत होता है ।11।

जिस महात्मा का मन नैराश्य में भी स्पृहा नहीं रखता, उस आत्मज्ञान से तृप्त पुरुष की तुलना किससे की जाए ।12।

जो जानता है कि यह दृश्य स्वभाव से ही कुछ नहीं है, वह धीर बुद्धि कैसे देख सकता है कि यह ग्रहण करने योग्य है और यह त्यागने योग्य ।13।

जिसने अन्तःकरण के कषाय को त्याग दिया है, और जो द्वन्द्वरहित और आशारहित है । ऐसे पुरुष को दैवयोग से प्राप्त भोगों में न दुःख है, सुख ।14।

चौथा प्रकरण

हन्त ! भोग-विलास के साथ खेलते हुए आत्मज्ञानी धीर पुरुष की बराबरी संसार को सिर पर ढोने वाले मूढ़ पुरुषों के साथ कैसे की जा सकती है ।1।

जिस पद की इच्छा करते हुए इन्द्रादि सम्पूर्ण देवता दीन हो रहे हैं, उस पर स्थित हुआ भी योगी हर्ष को प्राप्त नहीं होता । यही आश्चर्य है ।2।

उस पद को जानने वाले के अन्तःकरण का स्पर्श वैसे ही पुण्य और पाप के साथ नहीं होता जैसे आकाश का सम्बन्ध भासता हुआ भी धुएँ के साथ नहीं होता ।3।

जिस महात्मा ने इस सम्पूर्ण जगत को आत्मा की तरह जान लिया है, उस ज्ञानी को अपनी इच्छा के अनुसार व्यवहार करने से कौन रोक सकता है ।4।

ब्रह्मा से चींटी पर्यन्त चार प्रकार के जीवों के समूह में ज्ञानी को ही इच्छा और अनिच्छा को रोकने की सामर्थ्य है ।5।

कोई विरला ही आत्मा को अद्वय और जगदीश्वर रूप में जानता है । वह जिसे करने योग्य मानता है उसे करता है । उसे किसी प्रकार का भय नहीं ।6।

पाँचवाँ प्रकरण

तेरा किसी से भी संग नहीं है, इसलिए तू शुद्ध है, फिर किसको त्यागना चाहता है । इस प्रकार देहभमान के त्याग की इच्छा करके लय को प्राप्त हो ।1।

तुझसे संसार उत्पन्न होता है, जैसे समुद्र से बुलबुला । इस प्रकार आत्मा को एक जानकर मोक्ष को प्राप्त हो ।2।

दृश्यमान जगत प्रत्यक्ष होता हुआ भी रज्जु सर्प की भाँति तुझ शुद्ध के लिए नहीं है । इसलिए तू मोक्ष को प्राप्त हो ।3।

दुःख और सुख जिसके लिए समान है, जो पूर्ण है, जो आशा और निराशा में समान है, जीवन और मृत्यु में समान है । ऐसा होकर तू मोक्ष को प्राप्त हो ।4।

छठा प्रकरण

मैं आकाश की भाँति अनन्त हूँ । यह संसार घड़े की भाँति प्रकृतिजन्य है, ऐसा ज्ञान है । इसलिए न इसका त्याग है, न ग्रहण और न लय है ।1।

मैं समुद्र के समान हूँ, यह संसार तरंगों के समान है, ऐसा ज्ञान है । इसलिए न इसका त्याग है, न ग्रहण और न इसका लय है ।2।

मैं सीपी के समान हूँ, विश्व की कल्पना चाँदी के समान है । ऐसा ज्ञान है । अतएव इसका न त्याग है, न ग्रहण है और न लय है ।3।

मैं निश्चित ही सब भूतों में हूँ और ये सब भूत मुझमें हैं । ऐसा ज्ञान है । इसलिए इसका न त्याग है, न ग्रहण है और न लय है ।4।

सातवाँ प्रकरण

मुझ अन्तहीन महासमुद्र में विश्वरूपी नाव अपनी ही प्रकृत वायु से इधर-उधर डोलती है । मुझे असहिष्णुता नहीं है ।1।

मुझ अन्तहीन महासमुद्र में जगतरूपी लहर स्वभाव से उदय हो, चाहे मिठे । मेरी न वृद्धि है, न हानि ।2।

मुझ अन्तहीन महासमुद्र में निश्चय ही संसार कल्पनामात्र है । मैं अत्यन्त शान्त हूँ, निराकार हूँ और इसी अवस्था में स्थित हूँ ।3।

आत्मा विषयों में नहीं है और विषय उस अनन्त निरञ्जन आत्मा में नहीं है । इस प्रकार मैं अनासक्त हूँ, स्पृहामुक्त हूँ, और इसी अवस्था में स्थित हूँ ।4।

अहो ! मैं चैतन्यमात्र हूँ । संसार इन्द्रजाल की भाँति है । तब मेरी हेय और उपादेय की कल्पना किसमें हो ।5।

आठवाँ प्रकरण

जब चित्त कुछ चाहता है, कुछ सोचता है, कुछ त्याग करता है, कुछ ग्रहण करता है, जब दुःखी और सुखी होता है – तब बन्ध है ।1।

जब मन न चाह करता है, न सोचता है, न त्यागता है, न ग्रहण करता है, जब यह न सुखी होता है, न दुखी होता है – तभी मुक्त है ।2।

जब चित्त किसी दृष्टि अथवा विषय में लगा है तब बन्ध है और चित्त जब सब दृष्टियों से अनासक्त है तब मोक्ष है ।3।

जब तक ‘मैं’ है तब तक बन्ध है, जब ‘मैं’ नहीं है तब मोक्ष है । इस प्रकार का विचारकर, न इच्छा कर, न ग्रहण कर, न त्याग कर ।4।

नवाँ प्रकरण

कृत्य-अकृत्य और द्वन्द्व किसके कब शान्त हुए हैं । इस प्रकार निश्चिन्त जानकर इस संसार से निर्वेद होकर त्याग और अव्रती हो ।1।

हे तात ! लोक की चेष्टा को देखकर किसी भाग्यशाली की ही जीने की कामना, भोगने की वासना और ज्ञान की इच्छा शान्त हुई है ।2।

यह सब अनित्य है, तीनों तापों से दूषित है, सारहीन है, निन्दित है, हेय है । ऐसा निश्चित होने पर शान्ति प्राप्त होती है ।3।

वह कौन सा काल है व कौन सी अवस्था है जिसमें मनुष्य को द्वन्द्व न हों । उनकी उपेक्षा कर यथाप्राप्य वस्तुओं में संतोष करने वाला मनुष्य सिद्धि को प्राप्त होता है ।4

महर्षियों के, योगियों के एवं साधुओं के अनेक मत हैं । ऐसा देखकर उपेक्षा को प्राप्त हुआ कौन मनुष्य शान्ति को प्राप्त नहीं होता ।5।

जो उपेक्षा, समता और युक्ति के द्वारा चैतन्य के सच्चे स्वरूप को जानकर संसार में अपने को तारता है, क्या वह गुरु नहीं है ।6।

जब भूत-विकारों को तू यथार्थतः भूतमात्र देखेगा – उसी क्षण बन्ध से मुक्त होकर अपने स्वरूप में स्थित हो जाएगा ।7।

वासना ही संसार है इसलिये इन सबका त्यागकर । वासना के त्याग से ही संसार का त्याग है । अब जहाँ चाहे वहाँ रह ।8।

दसवाँ प्रकरण

वैर स्वरूप काम को और अनर्थ से भरे अर्थ को त्यागकर और दोनों के कारण-रूप धर्म को भी छोड़कर तू सबकी उपेक्षा कर ।1।

मित्र, खेत, धन, मकान, स्त्री, भाई आदि सम्पदा को तू स्वप्न और इन्द्रजाल के समान देख जो तीन या पाँच दिन ही टिकते हैं ।2।

जहाँ-जहाँ तृष्णा हो वहाँ-वहाँ ही संसार जान । प्रौढ़ वैराग्य को आश्रय करके वीततृष्णा होकर सुखी हो ।3।

तृष्णामात्र ही आत्मा का बन्ध है और उसका नाश मोक्ष कहा जाता है । संसार मात्र से अनासक्त होने से निरन्तर प्राप्ति और तुष्टि होती है ।4।

तू एक शुद्ध चैतन्य है, संसार जड़ और असत् है । यह अविद्या भी असत् है । इस पर भी तू क्या जानने की इच्छा रखता है ।5।

तेरे राज्य, पुत्र, पुत्रियाँ, शरीर और सुख जन्म-जन्म से नष्ट हुए हैं, यद्यपि तू उनमें आसक्त था ।6।

अर्थ, काम और सुकृत कर्म बहुत हो चुके । इनमें भी संसाररूपी जंगल में मन विश्रान्ति को प्राप्त नहीं हुआ ।7।

कितने जन्मों तक तूने क्या शरीर, मन और वाणी के दुखपूर्ण और श्रमपूर्ण कर्म नहीं किये हैं । अब तो आराम कर ।8।

ग्यारहवाँ प्रकरण

भाव और अभाव का विकार स्वभाव से होता है ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह निर्विकार और क्लेशरहित पुरुष सुखपूर्वक ही शान्ति को उपलब्ध होता है ।1।

सबको बनाने वाले ईश्वर हैं अन्य कोई नहीं है, ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है वह पुरुष शान्त है । उसकी सब आशाएँ जड़ से नष्ट हो गयी हैं । वह कहीं भी आसक्त नहीं होता ।2।

विपत्ति और सम्पत्ति दैवयोग से ही समय पर आती है, ऐसा निश्चय वाला पुरुष सदा सन्तुष्ट हुआ, न कोई कामना करता है, न शोक करता है ।3।

सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु दैवयोग से ही होती है, ऐसा निश्चय वाला व्यक्ति साध्य कर्मों को देखता हुआ और निरायास कर्मों को करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता ।4।

चिन्ता से दुःख उत्पन्न होता है अन्यथा नहीं । ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह सुखी और शान्त है । सर्वत्र उसकी स्पृहा गलित है और चिन्ता से मुक्त है ।5।

मैं शरीर नहीं हूँ, देह मेरी नहीं है, मैं तो बोधस्वरूप हूँ, ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है वह पुरुष कैवल्य को प्राप्त होकर किये और अनकिये कर्म का स्मरण नहीं करता ।6।

ब्रह्म से लेकर तृणपर्यन्त ‘मैं ही हूँ’ ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह निर्विकार, शुद्ध, शान्त और प्राप्त-अप्राप्त से निवृत्त होता है ।7।

अनेक आश्चर्यों वाला वह विश्व कुछ भी नहीं है अर्थात मिथ्या है ऐसा जो निश्चयपूर्वक जानता है, वह वासनारहित, बोधस्वरूप पुरुष इस प्रकार शान्ति को प्राप्त होता है, मानो कुछ भी नहीं है ।8।

बारहवाँ प्रकरण

जनक ने कहा – “पहले मैं शारीरिक कर्मों का न सराहने वाला हुआ, फिर वाणी के विस्तृत कर्म का न सराहने वाला हुआ । इस प्रकार मैं स्थिर हूँ” ।1।

शब्द आदि ऐन्द्रिक विषयों के प्रति राग के अभाव से और आत्मा की अदृश्यता से प्राप्त विक्षेपों से जिसका मन मुक्त होकर एकाग्र हो गया – ऐसा ही मैं स्थित हूँ ।2।

सम्यक् अध्यास आदि के कारण विक्षेप होने पर ही समाधि का व्यवहार होता है । ऐसे नियम को देखकर मैं स्थित हूँ ।3।

हे ब्रह्मन् ! हेय और उपादेय के के वियोग से जो हर्ष और विषाद होता है उसके अभाव में अब मैं जैसा हूँ वैसा ही स्थित हूँ ।4।

आश्रम एवं अनाश्रम है, ध्यान है तथा चित्त का स्वीकार और वर्जन है । उन सबसे उत्पन्न हुए अपने विकल्प को देखकर मैं उन तीनों से मुक्त हुआ स्थित हूँ ।5।

जैसे कर्म का अनुष्ठान अज्ञान से है, वैसे ही उसके त्याग का अनुष्ठान भी अज्ञान से है । इस तत्व को भली भाँति जानकर मैं कर्म अकर्म से मुक्त हुआ अपने में स्थित हूँ ।6।

अचिन्त्य का चिन्तन करता हुआ भी वह पुरुष चिन्ता को ही भजता है । इसलिए उस भाव को त्यागकर मैं भावनामुक्त हुआ स्थित हूँ ।7।

जिसने साधनों से क्रियारहित स्वरूप अर्जित किया है – वह पुरुष कृतकृत्य है और जो ऐसा ही स्वभाव वाला है वह तो कृतकृत्य है ही, इसमें कहना ही क्या ।8।

तेरहवाँ प्रकरण

नहीं है कुछ भी – ऐसे भाव से पैदा हुआ जो स्वास्थ्य है वह कोपीन को धारण करने पर भी दुर्लभ है । इसलिए त्याग और ग्रहण दोनों को छोड़कर मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ ।1।

कहीं तो शरीर का दुःख है, कहीं वाणी दुःखी है, कहीं मन दुःखी होता है । इसलिए तीनों को त्यागकर मैं पुरुषार्थ में सुखपूर्वक स्थित हूँ ।2।

किया हुआ कर्म कुछ भी वास्तव में आत्मकृत नहीं होता । ऐसा यथार्थ विचारकर मैं जब जो कुछ कर्म करने को आ पड़ता है उसे करके सुखपूर्वक स्थित हूँ ।3।

कर्म और निष्कर्म के बन्धन से संयुक्त भाव वाले शरीर में आसक्त जो योगी है मैं इस देह के संयोग वियोग से सर्वदा पृथक होने के कारण सुखपूर्वक स्थित हूँ ।4।

मुझको ठहरने से, चलने से या सोने से अर्थ या अनर्थ कुछ भी नहीं है । इस कारण ‘मैं’ ठहरता हुआ, जाता हुआ और सोता हुआ भी सुखपूर्वक स्थित हूँ ।5।

सोते हुए मुझे हानि नहीं है, न यत्न करते हुए मुझे सिद्धि है । इसलिए मैं हानि-लाभ दोनों को छोड़कर सुखपूर्वक स्थित हूँ ।6।

इसलिए अनेक परिस्थितियों में सुखादि की अनित्यता को बारम्बार देखकर और शुभ और अशुभ दोनों को छोड़कर मैं सुखपूर्वक स्थित हूँ ।7।

चौदहवाँ प्रकरण

जो स्वभाव से ही शून्य चित्त है पर प्रमाद से विषयों की भावना करता है और सोता हुआ भी जागने के समान है – वह पुरुष संसार से मुक्त है ।1।

जब मेरी स्पृहा नष्ट हो गयी तब मेरे लिए कहाँ धन, कहाँ मित्र, कहाँ विषयीरूप चोर, कहाँ शास्त्र और कहाँ ज्ञान है ।2।

साक्षी पुरुष, परमात्मा, ईश्वर, आशा-मुक्ति तथा बन्ध-मुक्ति के जान लेने पर मुझे मुक्ति के लिए चिन्ता नहीं है ।3।

जो भीतर विकल्प से शून्य है और बाहर भ्रान्त हुए पुरुष की भाँति स्वछन्दचारी है । ऐसे पुरुष की भिन्न-भिन्न दशाओं को वैसी ही दशा वाले पुरुष जानते हैं ।4।

पंद्रहवाँ प्रकरण

अष्टावक्र कहते हैं – “सत्व बुद्धि वाला पुरुष थोड़े से उपदेश से ही कृतार्थ होता है । असत् बुद्धि वाला पुरुष आजीवन जिज्ञासा करके उसमें मोह को ही प्राप्त होता है” ।1।

विषयों में विरसता मोक्ष है, विषयों में रस बन्ध है । इतना ही विज्ञान है । तू जैसा चाहे वैसा कर ।2।

यह तत्व बोध वाचाल, बुद्धिमान और महाउद्योगी पुरुष को गूँगा, जड़ और आलसी कर जाता है । इसलिए भोग की अभिलाषा रखने वालों के द्वारा तत्व-बोध त्यक्त है ।3।

तू शरीर नहीं है, न तेरा शरीर है, तू भोक्ता और कर्ता भी नहीं है । तू वो चैतन्यरूप है, नित्य है, साक्षी है, निरपेक्ष है । तू सुखपूर्वक विचर ।4।

राग और द्वेष मन के धर्म हैं । तू कभी मन नहीं है । तू निर्विकल्प, निर्विकार, बोध-स्वरूप आत्मा है । तू सुखपूर्वक विचर ।5।

सब भूतों में आत्म को तथा सब भूतों में आत्मा को जानकर तू अहँकाररहित और ममता रहित है । तू सुखी हो ।6।

जिसमें यह संसार तरंगों की भाँति स्फुरित होता है वह तू ही है, इसमें सन्देह नहीं है । हे चैतन्य स्वरूप ! तू सन्तापरहित हो ।7।

हे तात ! श्रद्धा कर, श्रद्धा कर । इसमें मोह मत कर । तू ज्ञानस्वरूप, भगवान्-स्वरूप आत्मा है तथा प्रकृति से परे है ।8।

गुणों से लिप्त यह शरीर रहता है, आता है और जाता है । किन्तु आत्मा न जाने वाला है, न आने वाला । इसके लिए क्यों सोच करता है ।9।

देह चाहे अन्त तक रहे, चाहे वह अभी चली जाए, तुम चैतन्य-रूप वालों की कहाँ वृद्धि है, कहाँ नाश है ।10।

तुझ अनन्त महासमुद्र में विश्वरूप तरंग अपने स्वभाव से उदय और अस्त को प्राप्त होती है, किन्तु न तेरी वृद्धि है, न नाश है ।11।

हे तात ! तू चैतन्यरूप है, तेरा यह जगत तुझसे भिन्न नहीं है । इसलिये हेय और उपादेय की कल्पना किसकी, क्योंकर और कहाँ हो सकती है ।12।

तुझ एक निर्मल, अविनाशी, शान्त और चैतन्यरूप आकाश में कहाँ जन्म है, कहाँ कर्म है और कहाँ अहंकार ।13।

जिसको तू देखता है, उसमें एक तू ही भासता है । क्या कंगन, बाजूबन्द और नूपुर सोने से भिन्न भासते है ।14।

‘यह मैं हूँ’, ‘यह मैं नहीं हूँ’ ऐसे विभाग को छोड़ दे । ‘सब आत्मा है’ ऐसा निश्चय करके तू संकल्परहित हो, सुखी हो ।15।

तेरे ही अज्ञान से विश्व है । परमार्थतः तू एक है । तेरे अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं है । न संसारी है, न असंसारी है ।16।

यह विश्व भ्रान्तिमात्र है और कुछ नहीं है । ऐसा निश्चयपूर्वक जानने वाला वासनारहित और चैतन्यमात्र है । वह ऐसी शान्ति को प्राप्त है मानो कुछ नहीं है ।17।

संसाररूपी समुद्र में तू एक ही था और होगा । तेरा बन्ध और मोक्ष नहीं है । तू कृतकृत्य होकर सुखपूर्वक विचर ।18।

हे चिन्मय ! तू चित्त को संकल्प और विकल्पों से क्षोभित मत कर । शान्त होकर आनन्दपूरित अपने स्वरूप में सुखपूर्वक स्थित हो ।19।

सर्वत्र ध्यान को त्यागकर हृदय में कुछ भी धारण मत कर । तू आत्मा मुक्त ही है । तू विमर्श करके क्या करेगा ।20।

सोलहवाँ प्रकरण

हे तात ! अनेक शास्त्रों को अनेक प्रकार से तू कह अथवा सुन लेकिन सब के विस्मरण के बिना तुझे स्वास्थ्य नहीं मिलेगी ।1।

हे विज्ञ ! भोग, कर्म अथवा समाधि को तू चाहे साधे, तो भी तेरा चित्त स्वभाव से सभी आशयों से रहित होने पर भी अत्यधिक लोभायमान रहेगा ।2।

प्रयास से सब लोग दुःखी हैं, इसको कोई नहीं जानता है । इसी उपदेश से भाग्यवान लोग निर्वाण को प्राप्त होते हैं ।3।

जो आँख के खोलने और ढकने के व्यापार से दुःखी होता है, वह आलसी-शिरोमणि का ही सुख है । दूसरे किसी का नहीं ।4।

यह किया गया है और यह नहीं किया गया, ऐसे द्वन्द्व से जब मन मुक्त हो तब वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के प्रति उदासीन हो जाता है ।5।

विषय का दोषी विरक्त है । विषयलोलुप रागी है । जो ग्रहण और त्याग दोनों से रहित है वह न विरक्त है, न रागवान है ।6।

जब तक स्पृहा जीवित है – जो कि अविवेक की दशा है – तब तक हेय और उपादेय भी जीवित है – जो कि संसाररूपी वृक्ष का अंकुर है ।7।

प्रवृत्ति से राग, व निवृत्ति से द्वेष पैदा होता है । इसलिए बुद्धिमान पुरुष द्वन्द्वमुक्त बालक के समान जैसा है, वैसा ही रहता है ।8।

रागी पुरुष दुःख से बचने के लिए संसार को त्यागना चाहता है लेकिन वीतरागी दुःखमुक्त होकर संसार के बीच भी खेद को प्राप्त नहीं होता ।9।

जिसका मोक्ष के प्रति अहंकार है और वैसी ही शरीर के प्रति ममता है, वह न तो योगी है, न ज्ञानी है । वह केवल दुःख का भागी है ।10।

यदि तेरा उपदेशक शिव है, विष्णु है अथवा ब्रह्मा है तो भी सबके विस्मरण के बिना तुझे स्वास्थ्य नहीं होगी ।11।

सत्रहवाँ प्रकरण

जो पुरुष तृप्त है, शुद्ध इन्द्रियों वाला है और सदा एकाकी रमण करता है उसी को ज्ञान और योगाभ्यास का फल प्राप्त होता है ।1।

हन्त ! तत्त्वज्ञानी इस जगत में कभी खेद को प्राप्त नहीं होता है क्योंकि उसी एक से यह ब्रह्माण्ड मण्डल पूर्ण है ।2।

जैसे सल्लकी के पत्तों से प्रसन्न हुए हाथी को नीम के पत्ते हर्षित नहीं करते हैं, वैसे ही ये विषय आत्मा में रमण करने वाले को कभी नहीं हर्षित करते हैं ।3।

जो भोगे हुए भोगों में वासना नहीं रखता तथा भोगे हुए विषयों के प्रति आकांक्षा नहीं रखता, ऐसा मनुष्य संसार में दुर्लभ है ।4।

इस संसार में भोग की इच्छा रखने वाले और मोक्ष की इच्छा रखने वाले दोनों देखे जाते हैं, लेकिन भोग और मोक्ष दोनों के प्रति निरकांक्षी विरल महाशय ही मिलेगा ।5।

कोई उदारचित्त ही धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, जीवन और मृत्यु के प्रति हेय-उपादेय का भाव नहीं रखता ।6।

जिसमें विश्व के विलय की इच्छा नहीं है और न उसकी स्थिति के प्रति द्वेष है, इसलिए वह धन्य पुरुष यथाप्राप्य आजीविका से सुखपूर्वक जीता है ।7।

इस ज्ञान से कृतार्थ अनुभव कर, गलित हो गयी बुद्धि जिसकी, ऐसा कृतकार्य पुरुष देखता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ सुखपूर्वक रहता है ।8।

जिसका संसार सागर क्षीण हो गया है, ऐसे पुरुष में न तृष्णा है, न विरक्ति है । उसकी दृष्टि शून्य हो गयी है, चेष्टा व्यर्थ हो गयी है और इन्द्रियाँ विफल हो गयी हैं ।9।

वह न जागता है, न मरता है, न पलक खोलता है, न पलक बन्द करता है । अहो ! मुक्तचेतस् की कैसी परम दशा होती है ।10।

मुक्त पुरुष सर्वत्र स्वस्थ, सर्वत्र विमल आशय वाला दिखाई देता है और सब वासनाओं से रहित सर्वत्र सुशोभित होता है ।11।

देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ, ग्रहण करता हुआ, बोलता हुआ, चलता हुआ, हित और अहित से मुक्त महाशय निश्चय ही जीवन मुक्त है ।12।

मुक्तपुरुष सर्वत्र रसरहित है । वह न निन्दा करता है, न स्तुति करता है, न हर्षित होता है, न क्रुद्ध होता है, न लेता है, न देता है ।13।

प्रीतियुक्त स्त्री और समीप में उपस्थित मृत्यु को देखकर जो महाशय अविचलमना और स्वस्थ रहता है, वह निश्चय ही मुक्त है ।14।

समदर्शी धीर के लिए सुख और दुःख में, नर और नारी में, सम्पत्ति और विपत्ति में कहीं भेद नहीं है ।15।

क्षीण हो गया है संसार जिसका, ऐसे मनुष्य में न हिंसा है, न करुणा है, न उद्दण्डता है, न दीनता, न आश्चर्य है, न क्षोभ ।16।

मुक्त पुरुष न विषयों से द्वेष करने वाला है, न विषयलोलुप है । सदा आसक्तिरहित मन वाला होकर प्राप्त और अप्राप्त वस्तु का उपभोग करता है ।17।

शून्यचित्त पुरुष समाधान और असमाधान के, हित और अहित के विकल्प को नहीं जानता है । वह तो कैवल्य जैसा स्थित है ।18।

भीतर से गलित हो गयी हैं आशाएँ जिसकी, और जो निश्चयपूर्वक जानता है कि कुछ भी नहीं है – ऐसा ममतारहित, अहंकारशून्य पुरुष कर्म करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होता ।19।

जिसका मन गलित हो गया है और जिसके मन में कर्म, मोह, स्वप्न और जड़ता सब समाप्त हो गए हैं, वह पुरुष कैसी अनिर्वचनीय अवस्था को प्राप्त होता है ।20।

अठारहवाँ प्रकरण

(आत्मज्ञान-शतक)

जिसके उदय होने पर समस्त भ्रान्ति स्वप्न के समान तिरोहित हो जाती है, उस एकमात्र आनन्दस्वरूप, शान्त और तेजोमय को नमस्कार है ।1।

सारे धन कमाकर मनुष्य अतिशय भोगों को पाता है । लेकिन सबके त्याग के बिना सुखी नहीं होता ।2।

कर्तव्य से पैदा हुए दुःखरूप सूर्य के ताप से जला अन्तर्मन जिसका, ऐसे पुरुष को शान्तिरूपी अमृतधारा की वर्षा के बिना सुख कहाँ है ।3।

यह संसार भावनामात्र है, परमार्थतः कुछ भी नहीं है । भावरूप और अभावरूप पदार्थों में स्थित स्वभाव का अभाव नहीं है ।4।

यह आत्मपद न तो दूर है, न संकोच से ही प्राप्त होता है । यह निर्विकल्प, निरायास, निर्विकार और निरञ्जन है ।5।

मोहमात्र से निवृत्त होने पर और अपने स्वरूप के ग्रहण मात्र से वीतशोक और निरावरण दृष्टि वाले पुरुष शोभायमान होते हैं ।6।

समस्त जगत कल्पना मात्र है और आत्मा मुक्त और सनातन है । ऐसा जानकर धीर पुरुष बालक के समान क्या चेष्टा करता है ।7।

आत्मा ब्रह्म है और भाव एवं अभाव कल्पित हैं । यह निश्चयपूर्वक जानकर निष्काम पुरुष क्या जानता है, क्या कहता है और क्या करता है ।8।

सब आत्मा है । ऐसा निश्चयपूर्वक जानकर शान्त हुए योगी की ऐसी कल्पनाएँ कि ‘वह मैं हूँ’ और ‘वह मैं नहीं हूँ’ क्षीण हो जाती हैं ।9।

अपशान्त हुए योगी के लिए न विक्षेप है और न एकाग्रता है, न अतिबोध है और न मूढ़ता है, न सुख है और न दुःख है ।10।

निर्विकल्प स्वभाव वाले योगी के लिए राज्य और भिक्षावृत्ति में, लाभ और हानि में, समाज और वन में फर्क नहीं है ।11।

यह किया है और यह अनकिया है इस प्रकार के द्वन्द्व से मुक्त योगी के लिए कहाँ धर्म है, कहाँ काम है, कहाँ अर्थ है, कहाँ विवेक है ।12।

जीवनमुक्त योगी के लिए कर्तव्यकर्म कुछ भी नहीं है और न हृदय में कोई अनुराग है । वह संसार में यथाप्राप्त जीवन जीता है ।13।

सम्पूर्ण संकल्पों के अन्त होने पर विश्रान्त हुए महात्मा के लिए कहाँ मोह और कहाँ संसार है, कहाँ वह ध्यान है, कहाँ मुक्ति है ।14।

जिसने जगत को देखा है वह भला उसे इनकार भी करे, लेकिन वासनारहित पुरुष को क्या करना है । वह देखता हुआ भी नहीं देखता है ।15।

जिसने पर-ब्रह्म को देखा है वह भला ‘मैं ब्रह्म हूँ’ का चिन्तन भी करे, लेकिन जो निश्चिन्त होकर दूसरा कोई नहीं देखता वह क्या चिन्तन करे ।16।

जो आत्मा में विक्षेप देखता है वह भला चित्त का निरोध करे, लेकिन विक्षेपमुक्त उदारपुरुष साध्य के अभाव में क्या करे ।17।

जो संसार की तरह बरतता हुआ भी संसार से भिन्न है । वह धीर पुरुष न अपनी समाधि को और न बन्धन को ही देखता है ।18।

जो ज्ञानी पुरुष तृप्त है, भाव-अभाव से रहित है, वासना-रहित है वह लोक-दृष्टि से कर्म करता हुआ भी कुछ नहीं करता है ।19।

धीर पुरुष प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति में दुराग्रह नहीं रखता । वह जब कभी भी कुछ करने को आ पड़ता है, उसको करके सुखपूर्वक रहता है ।20।

ज्ञानी पुरुष वासना-रहित, आलम्बन-रहित, स्वच्छन्द और बन्धन-रहित संसाररूपी वायु से प्रेरित होकर शुष्क पत्ते की भाँति व्यवहार करता है ।21।

संसारमुक्त पुरुष को न तो कभी हर्ष होता है, न विषाद । वह शान्तमना सदा विदेह की भाँति शोभता है ।22।

आत्मा में रमण करने वाले और शीतल तथा निर्मल चित्त वाले धीर पुरुष की न कहीं त्याग की इच्छा है, न कहीं ग्रहण की आशा है ।23।

स्वाभाविक रूप से जो शून्यचित्त है और सहजरूप से जो कर्म करता है, उस धीर पुरुष को सामान्यजन की तरह, न मान है और न अपमान है ।24।

यह कर्म शरीर से किया गया है, मुझ शुद्ध स्वरूप द्वारा नहीं । ऐसी चिन्तना का जो अनुगमन करता है, वह कर्म करता हुआ भी नहीं करता है ।25।

जीवन्मुक्त, उस सामान्यजन की तरह कर्म करता है, जो कहता कुछ और है और करता कुछ और है, तो वह मूढ़ नहीं होता है और वह सुखी श्रीमान् संसार में रहकर भी शोभायमान होता है ।26।

जो धीर पुरुष अनेक प्रकार के विचारों से थककर शान्ति को उपलब्ध होता है वह न कल्पना करता है, न जानता है, न सुनता है, न देखता है ।27।

महाशय पुरुष विक्षेप-रहित और समाधि-रहित होने के कारण न मुमुक्षु है, न गैर-मुमुक्षु होता है । वह निश्चयपूर्वक संसार को कल्पित देखकर ब्रह्मवत् रहता है ।28।

जिसके अन्तःकरण में अहंकार है, वह कर्म नहीं करते हुए भी कर्म करता है और अहंकार-रहित धीर पुरुष कर्म करते हुए भी नहीं करता है ।29।

मुक्तपुरुष का उद्वेग-रहित, संतोष-रहित, कर्तव्य-रहित, स्पन्द-रहित, आशा-रहित, सन्देह-रहित चित्त ही शोभायमान है ।30।

मुक्तपुरुष का चित्त ध्यान या चेष्टा में प्रवृत्त नहीं होता है । लेकिन वह निमित्त या हेतु के बिना ध्यान करता है और कर्म करता है ।31।

मन्दबुद्धि यथार्थत्व को सुनकर मूढ़ता को ही प्राप्त होता है । लेकिन कोई ज्ञानी मूढ़वत् होकर संकोच या समाधि को प्राप्त होता है ।32।

अज्ञानी चित्त की एकाग्रता अथवा निरोध का बहुत अभ्यास करता है लेकिन धीर पुरुष सोये हुए व्यक्ति की तरह अपने स्वभाव में स्थिर रहकर कुछ करने योग्य नहीं देखता है ।33।

अज्ञानी पुरुष प्रयत्न अथवा अप्रयत्न से निवृत्ति को प्राप्त नहीं होता है जबकि ज्ञानी पुरुष केवल तत्त्व को निश्चयपूर्वक जानकर ही निवृत्त हो जाता है ।34।

इस संसार में अभ्यास परायण पुरुष उस आत्मा को नहीं जान पाते जो शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, प्रपञ्च-रहित और दुःख-रहित है ।35।

अज्ञानी पुरुष अभ्यासरूपी कर्म से मोक्ष को प्राप्त नहीं होता है । जबकि क्रिया-रहित ज्ञानी पुरुष केवल ज्ञान के द्वारा मुक्त हुआ स्थिर रहता है ।36।

अज्ञानी जैसे ब्रह्म होने की इच्छा करता है वैसे ही ब्रह्म नहीं हो पाता है और धीर पुरुष नहीं चाहता हुआ भी निश्चित ही परब्रह्म स्वरूप को भजने वाला होता है ।37।

इस आधार-रहित, दुराग्रह-युक्त संसार का पोषक अज्ञानी पुरुष ही है । इस अनर्थ के मूल संसार का मूलाच्छेद ज्ञानियों द्वारा किया गया है ।38।

अज्ञानी जैसे शान्त होने की इच्छा करता है, वैसे ही वह शान्ति को नहीं प्राप्त होता है किन्तु धीर पुरुष तत्त्व को जानकर सदैव शान्त मन वाला है ।39।

उसको आत्मा का दर्शन कहाँ जो दृश्य का अवलम्बन करता है । धीर पुरुष दृश्य को नहीं देखते हैं । वे अविनाशी आत्मा को देखते हैं ।40।

जो हठपूर्वक चित्त का निरोध करता है, उस अज्ञानी को कहाँ चित्त का निरोध है । स्वयं में रमण करने वाले धीर पुरुष के लिए यह चित्त का निरोध स्वाभाविक है ।41।

कोई भाव को मानने वाला है और कोई ‘कुछ भी नहीं है’ ऐसा मानने वाला है । वैसे ही कोई दोनों को मानने वाला है । वैसे ही कोई दोनों को नहीं मानने वाला है और वही स्वस्थचित्त है ।42।

कुबुद्धि पुरुष शुद्ध अद्वैत आत्मा की भावना करते हैं लेकिन मोहवश उसे नहीं जानते हैं इसलिए जीवन भर सुखरहित रहते हैं ।43।

मुमुक्षु पुरुष की बुद्धि आलम्बन के बिना नहीं रहती । मुक्तपुरुष की बुद्धि सदा निष्काम और निरालम्ब रहती है ।44।

विषयरूपी बाघ को देखकर भयभीत हुआ मनुष्य शरण की खोज में शीघ्र ही चित्त के निरोध और एकाग्रता की सिद्धि के लिए पहाड़ की गुफा में प्रवेश करता है ।45।

वासना-रहित पुरुष-सिंह को देखकर विषयरूपी हाथी चुपचाप भाग जाते हैं या वे असमर्थ होकर चाटुकार की तरह उसकी सेवा करने लगते हैं ।46।

शंकारहित और मुक्त मन वाला पुरुष मुक्तिकारी योग को आग्रह के साथ नहीं ग्रहण करता है लेकिन वह देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ सुखपूर्वक रहता है ।47।

यथार्थ ज्ञान के सुनने मात्र से शुद्ध बुद्धि और स्वस्थ चित्त हुआ पुरुष न आचार को, न अनाचार को, न उदासीन को देखता है ।48।

धीर पुरुष जब कुछ शुभ या अशुभ करने को आ पड़ता है तो उसे सहजता के साथ करता है, क्योंकि उसका व्यवहार बालवत् होता है ।49।

धीर पुरुष स्वतंत्रता से सुख को प्राप्त होता है, स्वतंत्रता से परम को प्राप्त होता है, स्वतंत्रता से नित्यसुख को प्राप्त होता है और स्वतंत्रता से परमपद को प्राप्त होता है ।50।

जब मनुष्य अपनी आत्मा के अकर्त्तापन और अभोक्तापन को मानता है तब उसकी सम्पूर्ण चित्तवृत्तियों का नाश हो जाता है ।51।

धीर पुरुष की स्वाभाविक उच्छ्रंखल स्थिति भी शोभती है लेकिन स्पृहायुक्त चित्त वाले मूढ़ की बनावटी शान्ति भी नहीं शोभती ।52।

कल्पना-रहित, बन्धन-रहित और मुक्त बुद्धि वाले धीर पुरुष कभी बड़े-बड़े भोगों के साथ क्रीड़ा करते हैं और कभी पहाड़ की कन्दराओं में प्रवेश करते हैं ।53।

धीर पुरुष के हृदय में पण्डित, देवता और तीर्थ का पूजन करके तथा स्त्री, राजा और प्रियजन को देखकर कोई भी वासना नहीं होती ।54।

योगी नौकरों से, पुत्रों से, पत्नियों से, दोहित्रों और बान्धवों द्वारा हँसकर धिक्कारे जाने पर भी विकार को प्राप्त नहीं होता है ।55।

धीर पुरुष सन्तुष्ट होकर भी सन्तुष्ट नहीं होता है और दुःखी होकर भी दुःखी नहीं होता है । उसकी इस आश्चर्यमय दशा को वैसे ही ज्ञानी जानते हैं ।56।

कर्तव्य ही संसार है, उसे शून्याकार, निराकार, निर्विकार और निरामय ज्ञानी नहीं देखते हैं ।57।

अज्ञानी कर्मों को नहीं करता हुआ भी सर्वत्र विक्षोभ के कारण व्याकुल रहता है और ज्ञानी सब कर्मो को करता हुआ भी शान्तचित्त वाला ही होता है ।58।

शान्त बुद्धि वाला ज्ञानी व्यवहार में भी सुखपूर्वक बैठता है, सुखपूर्वक आता है और मर जाता है, सुखपूर्वक बोलता है और सुखपूर्वक भोजन करता है ।59।

जो ज्ञानी स्वभाव से व्यवहार में भी सामान्यजन की तरह नहीं व्यवहार करता है और महासरोवर की तरह क्लेशरहित है, वही शोभता है ।60।

मूर्ख मनुष्य की निवृत्ति भी प्रवृत्तिरूप हो जाती है । किन्तु धीर पुरुष की प्रवृत्ति भी निवृत्ति के समान फल देती है ।61।

मूढ़ पुरुष का वैराग्य परिग्रह से देखा जाता है । लेकिन देह में गलित हो गयी है आशा जिसकी, ऐसे ज्ञानी को कहाँ राग है, कहाँ वैराग्य ।62।

मूर्ख पुरुष की दृष्टि सदा भावना और अभावना में लगी रहती है । जबकि स्वस्थित पुरुष की दृष्टि भावना-अभावना से युक्त रहकर भी उनके प्रति अदृष्टि रूप ही रहती है ।63।

जो मुनि बालक के समान व्यवहार करता है एवं कामना-रहित रूप से सभी कर्मों का आरम्भ करता है, उस शुद्ध स्वरूप को क्रियमाण कर्म भी लिप्त नहीं करते हैं ।64।

वही आत्मज्ञानी धन्य है जो मन का निस्तरण कर गया है और जो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, खाता हुआ सब भावों में एकरस है ।65।

सदैव आकाश के समान निर्विकल्प ज्ञानी को कहाँ संसार है, कहाँ आभास है, कहाँ साध्य है, कहाँ साधन है ।66।

वही सन्यासी जय को प्राप्त होता है जो पूर्णानन्दस्वरूप है तथा जिसकी समाधि अविच्छिन्न रूप से विद्यमान रहती है ।67।

यहाँ बहुत कहने से क्या प्रयोजन है ? तत्त्व-ज्ञानी महाशय भोग और मोक्ष दोनों में निरकांक्षी, सदा और सर्वत्र रागरहित रहता है ।68।

महत्तत्व आदि जो द्वैत-जगत है वह नाम मात्र को ही भिन्न है । उसका त्याग कर देने के बाद शुद्ध बोध वाले का कौन सा कार्य शेष रह जाता है ।69।

यह समस्त जगत-प्रपञ्च कुछ नहीं है, ऐसा निश्चयपूर्वक जानकर अलक्ष्य की स्फुरण वाला शुद्ध पुरुष स्वभाव से ही शान्त होता है ।70।

दृश्यभाव को नहीं देखते हुए शुद्ध स्फुरणरूप का अनुभव करने वाले को कहाँ विधि है और कहाँ वैराग्य है । कहाँ त्याग है और कहाँ शान्ति है ।71।

और अनन्त रूपों में स्फुरित प्रकृति को नहीं देखते हुए ज्ञानी को कहाँ बन्ध है और कहाँ मोक्ष है । कहाँ हर्ष है और कहाँ शोक है ।72।

बुद्धिपर्यन्त संसार में जहाँ माया ही माया भासती है वहाँ ममतारहित, अहंकार-रहित और कामनारहित ज्ञानी ही शोभता है ।73।

अविनाशी और सन्तापरहित आत्मा को देखने वाले मुनि को कहाँ विद्या है और कहाँ विश्व । कहाँ देह है और कहाँ अहंता-ममता है ।74।

यदि जड़ बुद्धि मनुष्य निरोध आदि कर्मों को छोड़ता भी है तो वह तत्क्षण मनोरथों और प्रलापों को पूरा करने में प्रवृत्त हो जाता है ।75।

मन्द बुद्धि उस तत्त्व को सुनकर भी मूढ़ता को नहीं छोड़ता है । वह बाह्य प्रयत्न में निर्विकल्प होकर मन में विषयों की लालसा वाला होता है ।76।

ज्ञान से नष्ट हुआ है कर्म जिसका, ऐसा ज्ञानी लोक-दृष्टि में कर्म करने वाला भी है लेकिन वह न कुछ करने का अवसर पाता है, न कुछ कहने का ही ।77।

सर्वदा निर्भय और निर्विकार धीर पुरुष को कहाँ अन्धकार है, कहाँ प्रकाश है और कहाँ त्याग है । कहीं कुछ भी नहीं है ।78।

अनिर्वचनीय स्वभाव वाले स्वभावरहित योगी को कहाँ धीरता है, कहाँ विवेकिता अथवा कहाँ निर्भयता है ।79।

योगी को न स्वर्ग है, न नरक है, न जीवनमुक्ति ही है । इसमें बहुत कहने से क्या प्रयोजन, योग की दृष्टि से कुछ भी नहीं है ।80।

धीर पुरुष का चित्त अमृत से पूरित हुआ शीतल है । इसलिए न वह लाभ के लिए प्रार्थना करता है और न ही हानि के लिए कभी चिन्ता करता है ।81।

निष्काम पुरुष न तो शान्त पुरुष की प्रशंसा करता है, न दुष्ट को देखकर निन्दा करता है । वह सुख-दुःख को समान समझता हुआ तृप्त है ।82।

धीर पुरुष न संसार के प्रति द्वेष करता है और न आत्मा को देखने की इच्छा करता है । हर्ष और शोक से मुक्त वह, न मरे हुए जैसा है और न जीवित जैसा ।83।

पुत्र, स्त्री आदि के प्रति स्नेह न रखता हुआ और विषयों में कामनारहित हुआ, अपने शरीर की भी चिन्ता नहीं करता हुआ ज्ञानी पुरुष सभी आशाओं से मुक्त शोभा देता है ।84।

यथाप्राप्य से जीविका चलाने वाला, देशों में स्वच्छन्दता से विचरण करने वाला, जहाँ सूर्यास्त हो वहाँ शयन करने वाला धीर पुरुष सर्वत्र सन्तुष्ट है ।85।

जो निज स्वभाव रूपी भूमि में विश्राम करता है और जिसे संसार विस्मृत हो गया है, उस महात्मा को इस बात की चिन्ता नहीं है कि देह रहे या जाए ।86।

अकिञ्चन, स्वच्छन्द विचरण करने वाला, द्वन्द्वरहित, संशयरहित, आसक्तिरहित और अकेला बुद्ध पुरुष ही सब भावों में रमण करता है ।87।

जो ममता रहित है उसके लिए मिट्टी, पत्थर और सोना समान है । जिसके हृदय की ग्रन्थि टूट गयी है और जिसका रज-तम धुल गया है वह धीर पुरुष ही शोभता है ।88।

जो सर्वत्र व्यवधान से मुक्त उदासीन है और जिसके हृदय में कुछ भी वासना नहीं है । ऐसे तृप्त हुए मुक्तात्मा की किसके साथ तुलना हो सकती है ।89।

वासनारहित पुरुष के अतिरिक्त दूसरा कौन है जो जानता हुआ भी नहीं जानता है, देखता हुआ भी नहीं देखता है, बोलता हुआ भी नहीं बोलता है ।90।

जिसकी सब भावों में शोभन, अशोभन बुद्धि गलित हो गयी है और जो निष्काम है, वही शोभायमान है, चाहे वह भिखारी हो या भूपति ।91।

निष्कपट, सरल और यथार्थ चरित्र वाले योगी को कहाँ स्वच्छन्दता है, कहाँ संकोच है और कहाँ तत्त्व का निश्चय है ।92।

आत्मा में विश्राम कर तृप्त हुए आशारहित और शोकरहित ज्ञानी के अन्तस् में जो अनुभव होता है उसे कैसे और किसको कहा जाए ।93।

जो सोया हुआ भी सुषुप्त नहीं है, और न स्वप्न में भी सोया हुआ है, जाग्रत में भी नहीं जागा हुआ है, वही धीर पुरुष क्षण-क्षण तृप्त है ।94।

ज्ञानी चिन्तायुक्त भी चिन्तारहित है, इन्द्रियों सहित भी इन्द्रियों रहित है, बुद्धिसहित भी बुद्धिरहित है तथा अहंकारयुक्त भी अहंकाररहित है ।95।

ज्ञानी न सुखी है, न दुःखी है, न विरक्त है, न संगयुक्त है, न मुमुक्षु है, न मुक्त है, न किञ्चन है, न अकिञ्चन ।96।

धन्य पुरुष विक्षेप में भी विक्षिप्त नहीं होता, समाधि में भी समाधि वाला नहीं है, जड़ता में भी जड़ नहीं है, पाण्डित्य में भी पण्डित नहीं है ।97।

मुक्त पुरुष सब स्थितियों में स्वस्थ है, किये हुए और करने योग्य कर्म में तृप्त है, सर्वत्र समान है, तृष्णा के अभाव में किये और अनकिये कर्म को स्मरण नहीं करता है ।98।

मुक्तपुरुष न स्तुति किये जाने पर प्रसन्न होता है, न निन्दित होने पर क्रुद्ध होता है । न मृत्यु में उद्विग्न होता है, न जीवन में हर्षित होता ।99।

शान्त बुद्धि वाला पुरुष न लोगों से भरे नगर की ओर भागता है, न वन की ओर ही । वह सभी स्थिति और सभी स्थान में समभाव से ही स्थित रहता है ।100।

उन्नीसवाँ प्रकरण

राजा जनक बोले – “मैंने आपके तत्त्वज्ञानरूपी संसी को लेकर हृदय और उदर से अनेक प्रकार के विचाररूपी बाणों को निकाल दिया है” ।1।

अपनी महिमा में स्थित मुझको कहाँ धर्म है, कहाँ काम है, कहाँ अर्थ है, कहाँ विवेकिता है, कहाँ द्वैत है और कहाँ अद्वैत है ।2।

नित्य अपनी महिमा में स्थित हुए मुझको कहाँ भूत है, कहाँ भविष्य है, कहाँ वर्तमान है अथवा देश भी कहाँ है ।3।

अपनी महिमा में स्थित हुए मुझको कहाँ आत्मा है और कहाँ अनात्मा अथवा कहाँ शुभ है, कहाँ अशुभ है, कहाँ चिन्ता है अथवा कहाँ अचिन्ता है ।4।

अपनी महिमा में स्थित हुए मुझको कहाँ स्वप्न, कहाँ सुषुप्ति, कहाँ जाग्रत और कहाँ तुरीय अवस्था का भय है ।5।

अपनी महिमा में स्थित मुझको कहाँ दूर है, कहाँ समीप है, कहाँ बाह्य है, कहाँ अभ्यन्तर है, स्थूल कहाँ है और सूक्ष्म कहाँ है ।6।

अपनी महिमा में स्थित हुए मुझको कहाँ मृत्यु है अथवा कहाँ जीवन है । कहाँ लोक है व कहाँ इसका लौकिक व्यवहार है । कहाँ लय है और कहाँ समाधि ।7।

अपनी आत्मा में विश्रान्त हुए मुझको त्रिवर्ग की कथा पर्याप्त है, योग की कथा भी पर्याप्त है, विज्ञान की कथा भी पर्याप्त है ।8।

बीसवाँ प्रकरण

मेरे निरञ्जन स्वरूप में कहाँ पंचभूत हैं, कहाँ देह है, कहाँ इन्द्रियाँ हैं अथवा कहाँ मन है, कहाँ शून्य है और कहाँ नैराश्य है ।1।

सदा द्वन्द्वरहित मुझको कहाँ शास्त्र, कहाँ आत्मविज्ञान है, कहाँ विषयरहित मन है, कहाँ तृप्ति है, कहाँ तृष्णा का अभाव है ।2।

स्व स्वरूप की कहाँ रूपिता है, कहाँ विद्या है और कहाँ अविद्या है, कहाँ ‘मैं’ है अथवा कहाँ ‘यह’ है, कहाँ ‘मेरा’ है, कहाँ बन्ध है अथवा कहाँ मोक्ष है ।3।

मुझ सदैव निर्विशेष को प्रारब्ध कर्म कहाँ अथवा कहाँ जीवन्मुक्ति है और कहाँ यह विदेह कैवल्य ही है ।4।

सदा स्वभावरहित मुझको कहाँ कर्त्तापन है और कहाँ भोक्तापन । कहाँ निष्क्रियता है और कहाँ स्फुरण है । कहाँ अपरोक्ष ज्ञान है अथवा कहाँ फल है ।5।

मुझ अद्वय स्वरूप को कहाँ लोक है अथवा कहाँ मुमुक्षु है । कहाँ योगी है, कहाँ ज्ञानवान है अथवा कहाँ बद्ध है और कहाँ मुक्त ।6।

मुझ अद्वय स्वरूप को कहाँ सृष्टि और कहाँ संहार । कहाँ साध्य है और कहाँ साधन है । कहाँ साधक है अथवा कहाँ सिद्धि है ।7।

सर्वदा विमालरूप मुझको कहाँ प्रमाता, कहाँ प्रमाण, कहाँ प्रमेय और कहाँ प्रमा है । कहाँ किंचित् है और कहाँ अकिंचित् है ।8।

सर्वदा क्रियारहित मुझको कहाँ एकाग्रता, कहाँ ज्ञान, कहाँ मूढ़ता, कहाँ हर्ष और कहाँ विषाद है ।9।

सदा निर्विकाररूप मुझको कहाँ यह व्यवहार है और कहाँ वह परमार्थता है । कहाँ सुख है अथवा कहाँ दुःख है ।10।

मुझ सदा विमलस्वरूप को कहाँ माया और कहाँ संसार है । कहाँ प्रीति है अथवा कहाँ विरति है । कहाँ जीव है और कहाँ ब्रह्म है ।11।

सर्वदा कूटस्थ, अखण्डरूप और स्वस्थ मुझको कहाँ निवृत्ति है, कहाँ मुक्ति है और कहाँ बन्ध है ।12।

उपाधिरहित शिवरूप मुझको कहाँ उपदेश है, कहाँ शास्त्र है, कहाँ शिष्य है, कहाँ गुरु है और कहाँ पुरुषार्थ है ।13।
कहाँ अस्ति है और कहाँ नास्ति । कहाँ एक है अथवा कहाँ दो है । इसमें बहुत कहने से क्या प्रयोजन, मुझको तो कुछ भी नहीं उठ रहा है ।14।

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