साँख्यकारिका

तीन प्रकार के दुःखों के आघात से ही उनके निवारण के हेतु जिज्ञासा उत्पन्न होती है । लौकिक उपाय होने के कारण वह जिज्ञासा व्यर्थ है, ऐसा नहीं है, क्योंकि उनमें दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति नहीं है ।1।

लौकिक उपाय की तरह वेदोक्त उपाय भी अविशुद्ध, क्षरणशील और अतिशययुक्त हैं । इसके विपरीत व्यक्त-अव्यक्त और पुरुष का ज्ञान अधिक श्रेयस्कर है ।2।

मूल प्रकृति विकार नहीं है । महत् आदि सात तत्त्व कारण और विकार हैं । सोलह तत्त्व तो केवल विकार ही हैं । पुरुष न कारण है न विकार है ।3।

सभी प्रमाणों का अन्तर्भाव होने से प्रत्यक्ष, अनुमान और आप्तवचन – तीन प्रकार के प्रमाण ही इष्ट हैं । प्रमाण से ही प्रमेयसिद्धि होती है ।4।

विषय से सम्बद्ध इन्द्रिय पर आश्रित निश्चयात्मक ज्ञान ही प्रत्यक्ष है । साधन और साध्य पर आधारित वह अनुमान तीन प्रकार का कहा गया है । प्रामाणिक व्यक्ति से प्राप्त श्रुति ही आप्तवचन है ।5।

सामान्य विषयों का ज्ञान प्रत्यक्षप्रमाण से होता है । इन्द्रियातीत विषयों की प्रतीति अनुमान से होती है और उससे भी ज्ञात न होने वाले विषय की सिद्धि आगम प्रमाण से होती है ।6।

अत्यंत दूर, अत्यंत समीप, इन्द्रियों के विकार, मन की अनुपस्थिति, अत्यंत सूक्ष्मता, आवरण, व्यवधान, अन्य वस्तु से समानता और अनुत्पत्ति – इन कारणों से विषय की उपलब्धि नहीं होती ।7।

सूक्ष्म होने के कारण अव्यक्त प्रकृति की उपलब्धि नहीं होती, अभाव के कारण नहीं । उसके कार्य से उसकी उपलब्धि हो जाती है । महत् आदि उसके कार्य हैं और जो प्रकृति के समरूप और विषमरूप भी हैं ।8।

असत् को उत्पन्न नहीं किया जा सकता, कार्य को उत्पन्न होने के लिए उपादान ग्रहण करने की आवश्यकता होती है, सभी कारणों से सभी कार्यों की उत्पत्ति सम्भव नहीं होती, समर्थ कारण से ही समर्थ कार्य को उत्पन्न किया जा सकता है और कार्य एवं कारण की परस्पर अभिन्नता से सिद्ध है कि कार्य कारण में अव्यक्त रूप से विद्यमान होता है ।9।

व्यक्त कारण से युक्त, अनित्य, सीमित, सक्रिय, अनेक, आश्रित, लिंगरूप, अवयवों से युक्त तथा परतन्त्र है । अव्यक्त इसके विपरीत है ।10।

व्यक्त और प्रधान (अव्यक्त प्रकृति) – दोनों ही तीन गुणों से युक्त, विवेक रहित, ज्ञान के विषय, सामान्य, अचेतन और प्रसवधर्मी हैं । पुरुष इनके विपरीत है ।11।

गुण क्रमशः सुख, दुःख और मोहात्मक स्वरूप वाले होते हैं । प्रकाशित करना, गति प्रदान करना एवं नियमन करना इनसे सम्बद्ध कार्य हैं । ये तीनों परस्पर तिरस्कार, आश्रय, जनन और मिथुन स्वभाव वाले है ।12।

सत्व हल्का और प्रकाशित करने वाला, रज प्रेरक और क्रियाशील तथा तम भारी और नियामक माना गया है । ये तीनों गुण प्रयोजन के अनुसार दीपक की भाँति व्यवहार करते हैं ।13।

तीन गुणों के भाव के कारण अविवेक आदि की सत्ता सिद्ध है और अभाव में उनके विपरीत । ‘कार्य’ का ‘कारण’ गुणों के स्वभाव से युक्त होने से मूल प्रकृति (अव्यक्त) की सत्ता भी सिद्ध है ।14।

महत् आदि कार्यों के परिमित होने से, कारण के समान होने से, कारण की शक्ति से उत्पन्न होने से और कारण से ही कार्य के आविर्भूत होने और उसी में लीन होने से, विविध रूपों वाले सभी कार्यों का एक कारण अव्यक्त अवश्य है ।15।

यह अव्यक्त अपने तीनों गुणों के स्वरूप से और उनके मिश्रित स्वरूप से, एक-एक गुण के आश्रय से उत्पन्न भेद या वैशिष्ट्य के कारण, परिणामस्वरूप जलधारा के समान प्रवृत्त होता रहता है ।16।

संघातरूप वस्तुओं का दूसरों के लिए होने के कारण, तीन गुणयुक्त धर्मों से विपरीत धर्म वाले की अपेक्षा होने के कारण, अधिष्ठाता होने की अपेक्षा से, भोक्ता होने की अपेक्षा से और मोक्ष के लिए प्रवृत्ति होने से पुरुष की सत्ता सिद्ध है ।17।

जन्म-मरण और इन्द्रियों की व्यवस्था होने के कारण, एक साथ प्रवृत्ति का अभाव होने के कारण तथा तीनों गुणों के भेद के कारण पुरुषों की अनेकता सिद्ध होती है ।18।

और उनसे विपरीत होने के कारण इस पुरुष का साक्षित्व, कैवल्य, माध्यस्थ्य, द्रष्टत्व और अकर्तृत्व भी सिद्ध होता है ।19।

इसलिए उस पुरुष के संयोग से जड़ प्रकृति मानो चेतन के समान प्रतीत होती है । वैसा होने पर प्रकृति के प्रकृति के गुणों के कर्ता होने पर भी उदासीन पुरुष कर्ता के समान प्रतीत होता है ।20।

प्रकृति के दर्शन के लिए और पुरुष के कैवल्य के लिए दोनों का संयोग अंधे और लंगड़े के समान है । उस संयोग से ही सृष्टि है ।21।

मूल प्रकृति से महान् उत्पन्न होता है, उस महान् से अहंकार और अहंकार से सोलह पदार्थों का समूह प्रकट होता है । उस सोलह के समूह में पाँच से पाँच महाभूत उत्पन्न होते हैं ।22।

‘निश्चय’ बुद्धि है । धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य – ये उसके सात्विक रूप हैं और तामसिक रूप इनके विपरीत ।23।

‘अभिमान’ अहंकार है । उससे ही दो प्रकार की सृष्टि होती है – ग्यारह का समूह और पाँच तन्मात्राएँ ।24।

वैकृत अहंकार से ग्यारह इन्द्रियों का सात्विक समूह उत्पन्न होता है । भूतादि अहंकार से तमोगुणप्रधान तन्मात्राओं का समूह उत्पन्न होता है और तैजस अहंकार से दोनों ।25।

चक्षु-श्रोत्र-घ्राण-रसना-त्वक् नामक ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा वाक्-पाणि-पाद-पायु-उपस्थ नामक ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ कही गयी हैं ।26।

इन ग्यारह इन्द्रियों के बीच मन, संकल्प करने वाला तथा समान धर्मभाव के कारण इन्द्रिय, दोनों प्रकार का होता है । गुणों के परिणाम के भेद से एक ही अहंकार से नाना इन्द्रियाँ हो जाती और बाह्य भेद हो जाते हैं ।27।

पाँच ज्ञानेन्द्रियों का व्यापार रूपादि पाँच विषयों का प्रकाशन मात्र माना जाता है । पाँच कर्मेन्द्रियों का व्यापार वचन, ग्रहण, गमन, उत्सर्जन और आनन्दानुभूति माना जाता है ।28।

अपने-अपने लक्षण ही तीनों अन्तःकरणों की वृत्तियाँ हैं । वे उनकी असाधारण वृत्तियाँ हैं और प्राणादि पाँच वायु उनकी साधारण वृत्तियाँ हैं ।29।

प्रत्यक्ष के सम्बन्ध में उन चार करणों की प्रवृत्ति क्रमशः एक साथ कही गयी है । अप्रत्यक्ष के सम्बन्ध में तीन अन्तःकरणों की प्रवृत्ति भी उसी प्रकार मानी गयी है ।30।

चारों करण आपस में अभिप्राय को समझने के कारण अपनी-अपनी वृत्ति को सम्पन्न करते हैं । इस विषय में पुरुष का प्रयोजन ही मुख्य है, अन्य किसी के द्वारा इन करणों से कार्य नहीं कराया जाता है ।31।

करण तेरह प्रकार के हैं । वे विषयों का व्यापन, धारण और प्रकाशन करते हैं । उनके आहार्य, धार्य और प्रकाश्य दस प्रकार के कार्य हैं ।32।

अन्तःकरण तीन प्रकार के हैं । तीनों के विषयों को प्रस्तुत करने वाले बाह्य करण दस प्रकार के हैं । बाह्य करण वर्तमान-विषयक होते हैं और अन्तःकरण त्रिकालविषयक होते हैं ।33।

उनमें पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ स्थूल और सूक्ष्म तत्त्वों को विषय बनाती हैं । वाणी शब्द के विषय में प्रवृत्त होती है और शेष कर्मेन्द्रियाँ तो पाँचों विषयों में प्रवृत्त होती हैं ।34।

क्योंकि अंतःकरणों के साथ बुद्धि सभी विषयों को व्याप्त करती है, इसलिए तीन प्रकार का अन्तःकरण प्रमुख है । अन्य तो द्वारों के समान ही हैं ।35।

एक दूसरे से विलक्षण, गुणविशिष्ट, दीपक के समान ये करण पुरुष के प्रयोजन को प्रकाशित करके बुद्धि को प्रदान करते हैं ।36।

क्योंकि पुरुष के सभी शब्दादि विषयों से सम्बन्धित उपभोगों को बुद्धि ही सम्पादित करती है, पुनः वही मूलप्रकृति एवं पुरुष के सूक्ष्म भेद को भी प्रकट करती है ।37।

पञ्चतन्मात्र सूक्ष्म विषय हैं । उनसे पञ्च महाभूत उत्पन्न होते हैं जो स्थूल तथा सुख-दुःख-मोहात्मक कहे गए हैं ।38।

सूक्ष्मशरीर, माता-पिता से उत्पन्न स्थूलशरीर एवं महाभूतों के साथ तीन प्रकार के ‘विशेष’ हैं । इनमें सूक्ष्मशरीर नियत होता है और माता-पिता से उत्पन्न स्थूल शरीर विनष्ट होता रहता है ।39।

प्रारम्भ में उत्पन्न, सर्वत्र गति करने में सक्षम, नियत, महत् आदि से लेकर सूक्ष्म पर्यन्त, भोगरहित, भावयुक्त लिंगशरीर गमनागमन करता है ।40।

जिस प्रकार आश्रय के बिना चित्र और स्तम्भ आदि के बिना छाया नहीं हो सकती । उसी प्रकार विशेष के बिना लिंगशरीर भी निराश्रय नहीं रह सकता ।41।

पुरुष के प्रयोजन को साधने वाला यह लिंगशरीर कार्य-कारण के प्रसंगरूप प्रकृति की विभुत्व शक्ति के योग से अभिनेता के समान विविध रूपों को धारण करता हुआ व्यवहार करता है ।42।

जन्मजात, स्वाभाविक और अस्वाभाविक धर्म आदि भाव करण पर आश्रित होते हैं तथा कलल (रज-वीर्य) आदि भाव कार्य के आश्रित देखे गए हैं ।43।

धर्म से उर्ध्व गति होती है । अधर्म से अधोगति होती है । ज्ञान से मोक्ष और अज्ञान से बन्ध माना गया है ।44।

वैराग्य से प्रकृति में लय होता है । रजोमय राग से संसरण होता है । ऐश्वर्य से इच्छापूर्ति होती है और ऐश्वर्य के अभाव में उसके विपरीत ।45।

विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि, सिद्धि नामक यह बौद्धिक सर्ग है । गुणों की विषमता के कारण एक दूसरे के अभिभव से उसके पचास भेद हैं ।46।

विपर्यय के पाँच भेद होते हैं । करणों की विकलता के कारण होने वाली अशक्ति अट्ठाइस प्रकार की होती है । तुष्टि नौ प्रकार की और सिद्धि आठ प्रकार की होती है ।47।

विपर्यय के भेदों में तमस् और मोह के आठ प्रकार होते हैं । मोहामोह के दस प्रकार, तामिस्र के अठारह प्रकार और उसी प्रकार अन्धतामिस्र के अठारह प्रकार होते हैं ।48।

बुद्धि के उपघातों के साथ ग्यारह इन्द्रियों की विकलता अशक्ति कही गयी है । तुष्टि और सिद्धियों के विपर्ययभाव से बुद्धि के सत्रह उपघात होते हैं ।49।

प्रकृति, उपादान, काल, भाग नामक चार आध्यात्मिक और विषयों के प्रति वैराग्य के कारण पाँच बाह्य, इस प्रकार नौ तुष्टियाँ हैं ।50।

अध्ययन, शब्द, तर्क, सुहृत्प्राप्ति, दान और तीन प्रकार के दुःखों का विनाश, आठ प्रकार की सिद्धियां हैं । पूर्वोक्त तीन प्रकार का प्रत्ययसर्ग अंकुशरूप में सिद्धि का बाधक होता है । पुरुष का भोग-अपवर्ग रूप प्रयोजन ही पुरुषार्थ है तथा पुरुषार्थ की निष्पत्ति ही सिद्धि है ।51।

भाव के बिना लिंग नही होता और लिंग के बिना भाव नहीं होता । अतः लिंग और भाव नामक दो प्रकार की सृष्टि प्रवृत्त होती है ।52।

देव सृष्टि के के आठ प्रकार, तिर्यक् सृष्टि के पाँच प्रकार तथा मनुष्य सृष्टि एक प्रकार की होती है । संक्षेप में यही भौतिक सृष्टि है ।53।

ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सृष्टि में ऊर्ध्वलोक सत्व गुण प्रधान, अधोलोक तमोगुण प्रधान एवं मध्यलोक रजोगुण प्रधान होते हैं ।54।

उन योनियों में चेतन पुरुष लिंगशरीर के निवृत्त होने तक जरा मरण से उत्पन्न दुःख को प्राप्त करता है । इसलिए दुःख स्वभाव से ही माना गया है ।55।

इस प्रकार महत् आदि से लेकर स्थूलभूतों तक प्रकृति के द्वारा प्रत्येक पुरुष के मोक्ष के लिए किया हुआ यह कार्य, अपने लिए प्रतीत होता हुआ भी वस्तुतः दूसरे के लिए ही है ।56।

जिस प्रकार बछड़े के पोषण के लिए अचेतन दूध की प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार पुरुष के मोक्ष के निमित्त मूल प्रकृति की प्रवृत्ति होती है ।57।

जिस प्रकार लोक उत्सुकता की निवृत्ति के लिए क्रियाओं में प्रवृत्त होता है, उसी प्रकार प्रकृति पुरुष के मोक्ष के लिए प्रवृत्त होती है ।58।

जिस प्रकार नर्तकी रंगशाला में नृत्य दिखाकर नृत्य से निवृत्त हो जाती है, उसी प्रकार प्रकृति पुरुष के समक्ष स्वयं को प्रकाशित करके निवृत्त हो जाती है ।59।

यह उपकारिणी और त्रिगुणात्मक प्रकृति उस उपकार न करने वाले और निर्गुण पुरुष के प्रयोजन को अनेक उपायों के द्वारा निःस्वार्थ भाव से सम्पादित करती है ।60।

प्रकृति से सुकुमार कुछ नहीं, ऐसा मेरा मत है । ‘जो मैं देख ली गयी हूँ’, यह जानकर फिर से पुरुष का दर्शन प्राप्त नहीं करती ।61।

इसलिए कोई पुरुष न बँधता है, न मुक्त होता है, न ही संसरण करता है । वस्तुतः अनेक आश्रयों वाली प्रकृति ही संसरण करती है, बँधती है और मुक्त होती है ।62।

प्रकृति सात रूपों के द्वारा ही अपने द्वारा अपने को बाँधती है, किन्तु वह प्रकृति ही पुरुषार्थ की सिद्धि के लिए एकरूप ज्ञान के द्वारा स्वयं को मुक्त करती है ।63।

‘न हूँ’, ‘न मेरा है’, ‘न मैं है’ । तत्त्वों के अभ्यास से इस प्रकार सम्पूर्ण संशय, भ्रम आदि से रहित होने से विशुद्ध कैवल्य ज्ञान उत्पन्न होता है ।64।

उस विशुद्ध ज्ञान के द्वारा स्थित हुआ तटस्थ पुरुष प्रयोजन सम्पन्न होने के कारण प्रसव से निवृत्त एवं सात भावों से पूर्णतया निवृत प्रकृति को द्रष्टा के समान देखता है ।65।

एक ‘मेरे द्वारा देख ली गयी’ ऐसा जानकर उपेक्षा करने वाला हो जाता है । दूसरी ‘मैं देख ली गयी’ ऐसा जानकर विरत हो जाती है । अतः दोनों का संयोग रहने पर भी सृष्टि का प्रयोजन नहीं रहता ।66।

सम्यक् ज्ञान की प्राप्ति से, धर्म आदि के अकारणत्व को प्राप्त होने पर पूर्व संस्कारों के कारण कुम्हार के चाक के घूमने के समान शरीर को धारण किये रहता है ।67।

प्रयोजनों के सिद्ध होने से, प्रकृति के निवृत्त होने पर, शरीरपात को प्राप्त होने पर पुरुष एकान्तिक, आत्यन्तिक और उभयरूप कैवल्य को प्राप्त करता है ।68।

जिस में प्राणियों की स्थिति-उत्पत्ति-प्रलय विचार किये जाते है, ऐसा गुह्य पुरुषार्थरूपी यह ज्ञान परमऋषि के द्वारा कहा गया ।69।

यह पवित्र ज्ञान कपिल मुनि ने कृपापूर्वक आसुरि को प्रदान किया । आसुरि ने पञ्चशिखाचार्य को दिया और उन्होंने इसका अनेक प्रकार से विस्तार किया ।70।

और शिष्य परम्परा द्वारा प्राप्त इस सारभूत तत्व सिद्धान्त को आचार्य ईश्वरकृष्ण ने अपनी सूक्ष्मतत्वदर्शिनी बुद्धि के द्वारा सम्यक् रूप से जानकर आर्याओं में संक्षिप्त रूप से प्रस्तुत किया ।71।

सत्तर कारिकाओं की संख्या से युक्त साँख्यकारिका में जो भी विषय निबद्ध किये गए है, वे सब निश्चय ही विशाल षष्टितन्त्र के हैं जो आख्यानों और मतमतान्तरों से रहित रखे गए हैं ।72।

छोटा दिखाई देता हुआ भी यह शास्त्र विषय की दृष्टि से, विशाल आकार वाले तन्त्र का, दर्पण में पड़े हुए प्रतिबिम्ब के समान ही है ।73।

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