श्वेताश्वतर उपनिषद्

प्रथम अध्याय

हरि ॐ

ब्रह्मवादी कहते हैं –

जगत का कारण ब्रह्म कौन है ? हम किससे उत्पन्न हुए हैं । किसके द्वारा जीवित हैं ? कहाँ स्थित हैं ? हे ब्रह्मविद ! किसके अधीन रहकर सुख-दुःख में व्यवस्था का अनुवर्तन करते हैं ?॥१॥

काल, स्वभाव, नियति, आकस्मिक घटना, भूत और पुरुष कारण हैं, इस पर विचार करना चाहिए । इनका संयोग भी कारण नही हो सकता, ये सभी आत्मा के अधीन हैं और आत्मा भी सुख-दुःख के हेतु के अधीन है ॥२॥

उन्होंने ध्यान-योग का अनुवर्तन कर अपने गुणों से ढकी हुई देवात्मशक्ति का साक्षात्कार किया । जो अकेले ही उन काल से लेकर आत्मा तक सम्पूर्ण कारणों पर शासन करता है ॥३॥

वह एक नेमि वाला, तीन घेरों वाला, सोलह सिरों वाला, पचास अरों वाला, बीस प्रति-अरों वाला, छः अष्टकों वाला, विश्वरूप एक ही पाश से युक्त, मार्ग के तीन भेदवाला, दो निमित्त का एक ही मोहरूपी कारण ॥४॥

पाँच स्रोतों से आने वाले जल से युक्त जो पाँच योनियों से उत्पन्न, उग्र और वक्र है, पाँच प्राण जिसकी तरंगें हैं, पाँच प्रकार के ज्ञान के आदिकारण, पाँच भँवरों से युक्त जो पाँच प्रकार के दुःखरूप ओघवेग वाली हैं और पाँच पर्वों से युक्त उस पचास भेदरूप को हम जानते हैं ॥५॥

जीवात्मा स्वयं को और प्रेरित करने वाले को अलग-अलग मानकर इस सर्व-आजीवक, सर्व-आश्रय और महान् ब्रह्मचक्र में घूमता रहता है, फिर उस अभिन्नरूप से स्वीकृत होकर, अमृतत्व को प्राप्त हो जाता है ॥६॥

यह वेदवर्णित परम् ब्रह्म ही उन तीनों लोकों की सुप्रतिष्ठा है और अविनाशी है । ब्रह्मवेत्ता इस अन्तः स्थित को जानकर, उसमे ही तत्पर हो, ब्रह्म में लीन हो जाते हैं, योनि से मुक्त हो जाते हैं ॥७॥

क्षर-अक्षर से संयुक्त और व्यक्त-अव्यक्तरूप इस विश्व का ईश्वर ही भरण-पोषण करता है । भोक्तृभाव के कारण बँधा हुआ वह अनीश आत्मा उस परम् देव को जानकर समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है ॥८॥

अज्ञ और सर्वज्ञ, असमर्थ और सर्वसमर्थ ये दोनों ही अजन्मा हैं और एक भोक्ता के भोग-अर्थों से युक्त अजन्मा प्रकृति है । विश्वरूप वह आत्मा तो अनन्त और अकर्ता ही है । जब इन तीनों को ही ब्रह्मरूप अनुभव कर लेता है ॥९॥

प्रकृति क्षर है और अमृत एवं अक्षर वह हर है । क्षर और आत्मा दोनों का शासक वह एक ही देव है । उसके चिन्तन, मनोयोग, और तत्व-भावना से अन्त में विश्वरूप माया की निवृत्ति हो जाती है ॥१०॥

उस परम् देव का ज्ञान होने पर समस्त बन्धनों का नाश हो जाता है क्लेशों के क्षीण हो जाने से जन्म-मृत्यु का अभाव हो जाता है । उसका ध्यान करने से शरीर को भेदकर, विश्व-ऐश्वर्यरूप तृतीय अवस्था करके, आप्तकाम हो, कैवल्य को प्राप्त हो जाता है ॥११॥

आत्मस्थित यह ही जानने योग्य है, इससे बढ़कर जानने योग्य और कुछ नहीं है । भोक्ता, भोग्य और प्रेरक को समस्तरूप से जानना चाहिए । यही त्रिविध रूप से कहा हुआ वह ब्रह्म है ॥१२॥

जिस प्रकार योनिगत अग्नि का न मूर्तरूप दिखाई देता है और न लिंग का ही नाश होता है और फिर चेष्टा करने पर ईंधनरूप से योनि में ग्रहण किया जा सकता है । उसी प्रकार वे दोनों शरीर में प्रणव के द्वारा ॥१३॥

अपनी देह को अरणि बनाकर और प्रणव को उत्तर अरणि करके, ध्यानरूप मंथन के अभ्यास से उस छिपे हुए परम् देव का दर्शन करे ॥१४॥

जिस प्रकार तिलों में तैल, दही में घी, स्रोतों में जल और अरणियों में अग्नि है । उसी प्रकार जो सत्य और तप के द्वारा इसे देखता है वह आत्मा में ही आत्मा को प्राप्त करता है ॥१५॥

दूध में घी की भाँति सर्वत्र व्याप्त आत्मा, और आत्मविद्या एवं तप का मूल ही वह उपनिषत् में कहा गया परम् ब्रह्म है । वह ही उपनिषत् में कहा गया परम् ब्रह्म है ॥१६॥

 

द्वितीय अध्याय

सविता देव पहले हमारे मन और बुद्धि को तत्त्व प्राप्ति हेतु अपने स्वरुप में नियुक्त करते हुए, अग्नि की ज्योति का अवलोकन कर उसे पृथ्वी से ऊपर स्थित करे ॥१॥

नियुक्त मन से और सविता देव की अनुज्ञा से हम स्वर्ग हेतु यथाशक्ति प्रयत्न करें ॥२॥

स्वर्ग तथा आकाश में गमन करने वाला, बृहद् प्रकाश करने वाला वह सविता देव मन तथा बुद्धि को देवों से संयुक्त करके उन्हें प्रेरित करे ॥३॥

जिसमें सभी ब्राह्मण आदि अपने मन तथा चित्त को लगाते हैं, जिसके निमित्त अग्निहोत्र आदि का विधान किया गया है, जो सभी प्राणियों के विचारों को जानता है, उस सविता देव की हम स्तुति करें ॥४॥

(हे मन और बुद्धि !) तुम्हारे और सबके आदि कारण ब्रह्म से मैं नमस्कार के द्वारा संयुक्त होता हूँ ॥५॥

जहाँ अग्नि का मंथन किया जाता है, जहाँ वायु का विधिवत निरोध किया जाता है और जहाँ सोम प्रखर रूप से प्रकट होता है, वहाँ मन सर्वथा शुद्ध हो जाता है ॥६॥

सविता के द्वारा प्रेरित होकर, आदिकारण ब्रह्म की आराधना करनी चाहिए । उसी का आश्रय ग्रहण करो । इससे तुम्हारे पूर्व कर्म विघ्नकारक नहीं होंगे ॥७॥

विद्वान मनुष्य को चाहिए कि वह तीन स्थानों (सिर, ग्रीवा, वक्षःस्थल) पर उभरे हुए शरीर को सीधा और स्थिर करके तथा समस्त इन्द्रियों को मन के द्वारा हृदय में सन्निविष्ट करके, ॐकार रूपी नौका द्वारा सम्पूर्ण भयावह प्रवाहों को पार कर जाए ॥८॥

आहार-विहार की क्रियाओं को विधिवत सम्पन्न करते हुए प्राणायाम के द्वारा जब प्राण क्षीण हो जाये, तब उसे नासिका से बाहर निकाल दे । दुष्ट घोड़ो से युक्त रथ को जिस प्रकार सारथी वश में करता है, विद्वान अप्रमत्त होकर इस मन को वश में किये रहे ॥९॥

कंकड़, अग्नि तथा बालू से रहित, समतल और शुद्ध, शब्द, जल एवं आश्रय आदि की दृष्टि से सर्वथा अनुकूल और नेत्रों को पीड़ा न देने वाले गुहा आदि वायुशून्य स्थान में मन को ध्यान में लगाए ॥१०॥

योग साधना प्रारम्भ करने पर ब्रह्म की अभिव्यक्ति स्वरूप सर्वप्रथम कोहरा, धुआँ, सूर्य, वायु, जुगनू, विद्युत, स्फटिक, चन्द्रमा आदि बहुत से दृश्य योगी के समक्ष प्रकट होते हैं ॥११॥

पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश – इन पाँचों महाभूतों का सम्यक् उत्थान होने पर, इनसे सम्बन्धित पाँच योग विषयक गुणों की सिद्धि हो जाने पर उसे योगाग्निमय शरीर प्राप्त हो जाता है, उसे न रोग है, न जरा है और न ही मृत्यु ॥१२॥

शरीर का हल्कापन, आरोग्य, विषयासक्ति की निवृत्ति, वर्ण की उज्ज्वलता, स्वर की मधुरता, शुभ गन्ध का होना और मल-मूत्र कम जो जाना, योग की प्राथमिक सिद्धि है ॥१३॥

जिस प्रकार मिट्टी से लिप्त हुआ रत्न शोधित होने पर प्रकाशमय होकर चमकने लगता है, उसी प्रकार देहधारी जीव आत्मतत्त्व का साक्षात्कार करके शोकरहित, अद्वितीय और कृतकृत्य हो जाता है ॥१४॥

जब वह योगी दीपक के सदृश आत्मा के द्वारा ब्रह्मतत्त्व का साक्षात्कार करता है, तब वह अजन्मा, निश्चल, सम्पूर्ण तत्त्वों से विशुद्ध परमदेव को जानकर समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥१५॥

वही परमदेव समस्त दिशाओं-अवान्तर दिशाओं में अनुगत है । यही पहले उत्पन्न हुआ था, यही गर्भ के अंतर्गत है, यही उत्पन्न हुआ है और यही उत्पन्न होने वाला है । यही सम्पूर्ण जीवों में प्रतिष्ठित है और सब ओर मुख वाला है ॥१६॥

जो देव अग्नि में है, जो जल में है, जो समस्त लोकों में संव्याप्त है, जो ओषधियों में तथा वनस्पति में है, उस परमदेव को नमस्कार है, नमस्कार है ॥१७॥

 

तृतीय अध्याय

जो एक जालवान अपनी ईश्वरीय शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, जो अकेला ही सृष्टि की उत्पत्ति-विकास में समर्थ है, उसे जो जान लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ॥१॥

एक ही वह रुद्र है । वही अपनी शक्तियों द्वारा सम्पूर्ण लोकों पर शासन करता है, समस्त प्राणी उसी का आश्रय लेते हैं, अन्य किसी का नहीं । वही समस्त जीवों के अन्दर स्थित हैं । वह सम्पूर्ण लोकों की रचना करके उनका रक्षक होकर प्रलय काल में उन्हें समेट लेता है ॥२॥

वह सब ओर नेत्रों वाला, सब ओर मुखों वाला, सब ओर भुजाओं वाला और सब ओर पैरों वाला है । वह एकमात्र देव आकाश और पृथ्वी की रचना करता हुआ जीवों को भुजाओं और पँखों से युक्त करता है ॥३॥

जो रुद्र सम्पूर्ण देवों की उत्पत्ति और उनके विकास का कारण है, जो सबका अधिपति और महान् ज्ञानी है, जिसने सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ को उत्पन्न किया, वह हमें शुभ बुद्धि से संयुक्त करे ॥४॥

पर्वत पर वास करने वाले सुखप्रदाता हे रुद्र ! तुम्हारा कल्याणकारी, अघोर और पुण्य से प्रकाशमान जो रूप है, उस परम शान्त स्वरूप से तुम हमें देखो ॥५॥

हे गिरिशन्त ! जीवों की ओर फेंकने के लिए तुम अपने हाथ में जो बाण धारण किये रहते हो, हे गिरित्र ! उसे मंगलमय करो, किसी जीव या जगत की हिंसा मत करो ॥६॥

जो उस जीव जगत से परे, हिरण्यगर्भ रूप ब्रह्मा से भी अत्यन्त श्रेष्ठ है, जो अत्यन्त व्यापक है, किन्तु प्राणियों के शरीरों के अनुरूप उन सब प्राणियों में समाया हुआ है, सम्पूर्ण जगत को अपनी सत्ता से घेरे हुए उस महान् ईश्वर को जानकर ज्ञानीजन अमर हो जाते हैं ॥७॥

मैं इस अविद्यारूपी अन्धकार से दूर उस महान् पुरुष को जनता हूँ, उसे जानकर ही विद्वान मृत्यु के चक्र को पार कर जाते हैं । अमरत्व की प्राप्ति के लिए इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है ॥८॥

जिससे श्रेष्ठ और कुछ भी नहीं, न जिससे सूक्ष्म ही कोई है, न ही कोई बड़ा ही है । जो अकेला ही वृक्ष की भाँति निश्चल आकाश में स्थित है, उस परम पुरुष से ही यह सम्पूर्ण विश्व संव्याप्त है ॥९॥

जो उस से श्रेष्ठतम है, वह अरूप और दोषरहित है, जो इसे जानते हैं, वे अमर हो जाते हैं, अन्य लोग दुःख को प्राप्त होते हैं ॥१०॥

वह भगवान् सब ओर मुख, सिर और ग्रीवा वाला है । वह समस्त प्राणियों की हृदय गुहा में निवास करता है । वह सर्वव्यापी और सब जगह पहुँचा हुआ है ॥११॥

यह परम पुरुष महान्, सर्व समर्थ, सर्व नियन्ता, प्रकाश स्वरुप और अविनाशी है, अपनी अत्यन्त निर्मल कांति की प्राप्ति के निमित्त अन्तःकरण को प्रेरित करने वाला है ॥१२॥

अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला अन्तरात्मा सर्वदा मनुष्य के हृदय में सन्निविष्ट रहता है । जो विद्वान इस हृदय गुहा में स्थित मन के स्वामी का विशुद्ध मन से साक्षात्कार कर लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं ॥१३॥

वह पुरुष सहस्त्र सिर वाला, सहस्त्र नेत्रों वाला और सहस्त्र पैरों वाला है । वह भूमि को सब ओर से घेरकर दस अँगुल ऊपर स्थित है ॥१४॥

जो भूतकाल में हो चुका है, जो भविष्यकाल में होने वाला है और जो अन्न से पोषित होकर बढ़ रहा है, यह सम्पूर्ण परम पुरुष ही है और वही अमृतत्व का स्वामी है ॥१५॥

वह सब जगह हाथ-पैर वाला, सब जगह आँख, सिर और मुख वाला और सब जगह कानों वाला है, वही लोक में सबको व्याप्त करके स्थित है ॥१६॥

वह समस्त इन्द्रियों से रहित होकर भी समस्त इन्द्रियों के विषय-गुणों को जानने वाला है । सबका स्वामी-नियन्ता और सबका बृहद् आश्रय है ॥१७॥

सम्पूर्ण स्थावर और चर जगत को वश में रखने वाला वह प्रकाश रूप से नव द्वार वाले देहरूपी नगर में अन्तर्यामी होकर स्थित है और वही इस बाह्य जगत में लीला कर रहा है ॥१८॥

वह हाथ-पैर से रहित होकर भी वेगपूर्वक गमन करने वाला है । आँखों से रहित होकर भी देखता है और कानों से रहित होकर भी सुनता है । वह जानने वाली चीजों को जानता है । उसे जानने वाला अन्य कोई नहीं है । उसे ज्ञानीजन महान्, श्रेष्ठ आदि कहते हैं ॥१९॥

अणु से भी अणु है और महान् से भी महान् वह आत्मा इस जीव की हृदय गुहा में छिपा हुआ है । सबकी रचना करने वाले विधाता की कृपा से उस संकल्प रहित ईश्वर और उसकी महिमा को जो देख लेता है, वह शोकरहित हो जाता है ॥२०॥

जो जरा आदि से मुक्त है, सबसे पुरातन और सबका आत्मा है, सर्वत्र विद्यमान और अत्यन्त व्यापक है, जिसे ब्रह्मवेत्ता जन्म से रहित तथा नित्य बतलाते हैं, उसे मैं जानता हूँ ॥२१॥

 

चतुर्थ अध्याय

जो सृष्टि के आरम्भ में अकेले ही वर्ण से रहित होकर और बिना किसी प्रयोजन के अपनी विविध शक्तियों के प्रयोग द्वारा अनेक रूप धारण कर लेता है और अन्त में सम्पूर्ण विश्व को अपने में ही विलीन कर लेता है, वह परमदेव हमें शुभ बुद्धि से संयुक्त करे ॥१॥

वही अग्नि है, वही सूर्य है, वही वायु है, वही चन्द्रमा है, वही शुक्र है, वही ब्रह्म है, वही जल है और वही प्रजापति है ॥२॥

तू स्त्री है, तू पुरुष है, तू ही कुमार या कुमारी है और तू ही दण्ड के सहारे चलता है तथा तू ही उत्पन्न होने पर अनेकरूप हो जाता है ॥३॥

तू ही नीलवर्ण भ्रमर, हरे और लाल आँखों वाला, मेघ तथा ऋतु और समुद्र है । तू अनादि है और सर्वत्र व्याप्त होकर स्थित है तथा तुझ ही से सम्पूर्ण लोक उत्पन्न हुए हैं ॥४॥

अपने अनुरूप बहुत सी प्रजाओं को उत्पन्न करने वाली लोहित, शुक्ल एवं कृष्ण वर्ण वाली ‘अजा’ को एक ‘अज’ आसक्त हुआ भोगता है और दूसरा ‘अज’ उस उपभुक्त का परित्याग कर देता है ॥५॥

सदा साथ रहने वाले और परस्पर सखाभाव रखने वाले दो पक्षी एक ही वृक्ष का आश्रय लेकर रहते है । उनमें एक वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को भोगता है और दूसरा उन्हें न भोगता हुआ देखता रहता है ॥६॥

उस एक ही वृक्ष पर जीव डूबकर मोहग्रस्त हो दीनभाव से शोक करता है । जिस समय वह सेवित और देहादि से भिन्न ईश्वर और उसकी महिमा को देखता है, उस समय शोक रहित हो जाता है ॥७॥

जिसमें समस्त देवगण स्थित हैं, उस परमव्योम में ही समस्त वेद स्थित हैं । जो उसे नहीं जानते वे ऋचाओं द्वारा क्या कर लेंगे ? जो उसे जानते हैं वे तो उसी में कृतार्थ हुए स्थित हैं ॥८॥

वेद, यज्ञ, क्रतु, व्रत, भूत, भविष्य और वर्तमान तथा और भी जो कुछ वेद बतलाते हैं, वह सब मायावी ईश्वर इस अक्षर से ही उत्पन्न करता है, और उसमें ही माया से अन्य सा होकर बँधा हुआ है ॥९॥

प्रकृति को तो माया जानना चाहिए और महेश्वर को मायावी । उसी के अवयवभूत से सम्पूर्ण जगत व्याप्त है ॥१०॥

जो स्वयं अकेले ही प्रत्येक योनि का अधिष्ठाता है, जिसमें यह सब विलीन हो जाता है और विविध रूपों में पुनः प्रकट भी हो जाता है । उस नियामक सत्ता, वर प्रदाता, स्तुत्य परमदेव को जानकर आत्यन्तिक शान्ति को प्राप्त होता है ॥११॥

जो रुद्र, इन्द्रादि देवताओं की उतपत्ति और ऐश्वर्य प्राप्ति का हेतु है, विश्व का अधिपति और सर्वज्ञ है तथा जिसने सबसे पहले हिरण्यगर्भ को अपने से उत्पन्न देखा था वह हमें शुभ बुद्धि से संयुक्त करे ॥१२॥

जो देवताओं का अधिपति है, जिसमें सम्पूर्ण लोक आश्रित हैं और जो इस द्विपद एवं चतुष्पद प्राणिवर्ग का शासन करता है, उस आनन्दस्वरूप देव की हम हवि के द्वारा पूजा करें ॥१३॥

सूक्ष्म से भी अतिसूक्ष्म, हृदयगुहा के गुह्यस्थान में स्थित, सम्पूर्ण जगत के रचयिता, अनेकरूप धारण करने वाले, सम्पूर्ण जगत को अकेले ही परिव्याप्त करने वाले कल्याणकारी देव को जानकर शाश्वत शान्ति को प्राप्त करता है ॥१४॥

वही प्रत्येक काल में समस्त लोकों का रक्षक, सम्पूर्ण जगत का स्वामी और समस्त प्राणियों में स्थित है । जिसमें ब्रह्मर्षि और देवगण भी अभिन्नरूप से स्थित हैं, उसे इस प्रकार जानकर पुरुष मृत्यु के पाशों को काट डालता है ॥१५॥

घृत के समान ऊपर रहने वाले उसके सार भाग के समान अतिसूक्ष्म और समस्त प्राणियों में अधिष्ठित, कल्याणकारी तथा समस्त विश्व को सब ओर से घेर कर रखने वाले उस देव को जानकर पुरुष समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥१६॥

यह महात्मा देव जगतकर्ता और सर्वदा समस्त जीवों के हृदय में स्थित है । हृदय, बुद्धि और मन से ध्यान द्वारा योगयुक्त होकर जो इसे जान लेते हैं, वे अमृतत्व को प्राप्त होते है ॥१७॥

जिस समय अज्ञान नहीं रहता, उस समय न दिन रहता है न रात्रि और न सत् रहता है न असत्, एक मात्र शिव रह जाता है । वह अविनाशी और सविता का भी उपास्य है तथा उसी से पुरातन प्राज्ञ का प्रसार हुआ है ॥१८॥

उसे न ऊपर से, न इधर-उधर से अथवा मध्य से भी कोई ग्रहण नहीं कर सकता । जिसका नाम महाद्यश है, ऐसे उस ब्रह्म की कोई उपमा भी नहीं है ॥१९॥

इसका स्वरूप नेत्रादि से ग्रहण करने योग्य स्थान में नहीं है । उसे कोई भी नेत्र द्वारा नहीं देख सकता । जो इस हृदयस्थित को भावपूर्ण हृदय और मन से इस प्रकार जान लेते हैं, वे अमृतत्व को प्राप्त हो जाते हैं ॥२०॥

हे रुद्र ! तुम अजन्मा हो, ऐसा जानकर कोई भीरु पुरुष तुम्हारे आश्रय में आता है । तुम्हारा जो दक्षिण मुख है, उससे मेरी सर्वदा रक्षा करो ॥२१॥

हे रुद्र ! तुम कुपित होकर हमारे पुत्र, पौत्र, आयु, गौ और अश्वों में क्षय न करो और हमारे वीर पुरुषों का वध न करो । हम हव्यसामग्री से युक्त होकर सर्वदा ही तुम्हारा आवाहन करते हैं ॥२२॥

 

पञ्चम अध्याय

ब्रह्मा से भी उत्कृष्ट, वह अनन्त-अविनाशी है, जिसमें विद्या और अविद्या दोनों निहित हैं और जो प्राणियों की हृदय गुहा में छुपा हुआ है । क्षर ‘अविद्या’ और अविनाशी ‘विद्या’ है । जो विद्या और अविद्या दोनों पर शासन करता है, वह इन दोनों से भिन्न है ॥१॥

जो अद्वितीय, प्रत्येक योनि का अधिष्ठाता है, जो सम्पूर्ण योनियों को विविध रूप प्रदान करता है । जिसने सबसे पहले उत्पन्न हुए कपिल मुनि को विशिष्ट ज्ञान-सम्पदा से सम्पन्न किया तथा उन्हें उत्पन्न होते हुए देखा था ॥२॥

इस संसारक्षेत्र में यह देव एक-एक जाल को अनेक प्रकार से विभक्त करता हुआ संहार करता है और प्रजापतियों को पुनः उत्पन्न कर सबका आधिपत्य करता है ॥३॥

जिस प्रकार सूर्य अकेले ही समस्त ऊपर-नीचे और तिर्यक दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ देदीप्यमान होता है, उसी प्रकार वह वरणीय परम देव भगवान् अकेला ही समस्त उत्पत्तिकरक शक्तियों पर अपना आधिपत्य रखता है ॥४॥

जो सम्पूर्ण जगत की उत्पत्ति का कारण है, जो समस्त तत्त्वों के स्वभाव को परिपक्व करता है, जो समस्त पकाये गए पदार्थों को विविध रूपों में परिणत करता है, जो सम्पूर्ण गुणों को उनके अनुरूप कार्यों में नियुक्त करता है, जो सम्पूर्ण जगत का अधिष्ठाता है ॥५॥

वह वेदों के गुह्यभाग उपनिषदों में निहित है, वेद के उत्पन्नकर्ता उस देव को ब्रह्मा जानता है । जो पुरातन देव और ऋषि उसे जानते थे, वे उसमें तन्मय होकर अमृतस्वरूप ही हो गए थे ॥६॥

जो गुणों से युक्त, फलप्राप्ति के उद्देश्य से कर्म करने वाला और किये गए कर्म के फल का उपभोग करने वाला है, विभिन्न रूपों को धारण करता हुआ, तीन गुणों से युक्त होकर, तीन मार्गों से गमन वाला है । वह प्राणों का अधिपति अपने कर्म के अनुसार गमन करता है ॥७॥

जो अंगुष्ठ मात्र परिमाण वाला, सूर्य के समान ज्योतिःस्वरूप, संकल्प और अहंकार से युक्त है । बुद्धि के गुणों के कारण और अपने गुणों के कारण ही आरे की नोंक सा सूक्ष्म, ऐसा अपर भी देखा गया है ॥८॥

एक बाल की नोंक के सौवें भाग के पुनः सौ भाग करने पर जो कल्पित भाग होता है, जीव का स्वरूप उसी के बराबर समझना चाहिए, परन्तु वही अनन्त रूपों में विस्तृत हो जाता है ॥९॥

यह न तो स्त्री है, न पुरुष है और न ही नपुंसक ही है । यह जिस-जिस शरीर को ग्रहण करता है, उसी-उसी से सम्बद्ध हो जाता है ॥१०॥

अन्न और जल के सेवन से जिस प्रकार शरीर परिपुष्ट होता है, उसी प्रकार संकल्प, स्पर्श, दृष्टि और मोह से जीवात्मा का जन्म और विस्तार होता है । जीवात्मा अपने किये गए कर्मों के फल के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थानों में भिन्न-भिन्न शारीरिक रूपों को ग्रहण करता है ॥११॥

अपने आन्तरिक गुणों के अनुसार स्थूल और सूक्ष्म बहुत से रूप धारण करता है । अपने क्रियात्मक गुणों तथा चेतनात्मक गुणों के अनुरूप शरीर धारण करने वाला कोई दूसरा हेतु भी देखा गया है ॥१२॥

इस घोर संसार में उस अनादि, अनन्त, विश्वसृजेता, अनेक रूपों वाले, सम्पूर्ण विश्व को अकेले ही अपनी सत्ता से आवृत करने वाले देव को जानकर समस्त बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥१३॥

भाव से प्राप्त होने वाले अशरीरी, सृष्टि और प्रलय करने वाले, कल्याणकारी स्वरूप वाले, कलाओं की रचना करने वाले, उस देव को जो जान लेता है, वह शरीर बन्धन को त्यागकर मुक्त हो जाता है ॥१४॥

 

षष्ठ अध्याय

कुछ विद्वान स्वभाव को जन्म चक्र का कारण बताते हैं । कुछ अन्य लोग काल को इसका कारण बताते हैं, ये सभी मोहग्रस्त स्थिति में हैं । वास्तव में यह उस परम देव की ही महिमा है, जिसके द्वारा इस लोक में यह ब्रह्मचक्र घुमाया जाता है ॥१॥

जिसके द्वारा यह समस्त जगत सदैव व्याप्त रहता है, जो ज्ञानस्वरूप, काल का भी काल, सर्वगुणसम्पन्न और सर्वज्ञ है, उसके ही अनुशासन में यह सम्पूर्ण कर्मचक्र घूम रहा है । पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश – इन पञ्चतत्त्वों का चक्र भी उसी के हाथ में है – ऐसा चिन्तन करते रहना चाहिए ॥२॥

उसने ही कर्मचक्र चला कर, उसका अवलोकन कर, चेतन तत्त्व से जड़ तत्त्व का संयोग कराकर जगत की रचना की अथवा एक, दो, तीन और आठ प्राकृतिक भेदों से तथा काल एवं सूक्ष्म आन्तरिक गुणों के संयोग से इस जगत की रचना की ॥३॥

जो पुरुष गुणों से व्याप्त कर्मों को आरम्भ करके उन्हें तथा उनके भावों को परमात्मा को अर्पित कर देता है, उन कर्मों का अभाव हो जाता है तथा पूर्वकृत कर्मों का भी नाश हो जाता है । ऐसा होने पर जीवात्मा जड़-जगत से भिन्न सत्ता को प्राप्त होता जाता है ॥४॥

वह आदि पुरुष संयोग कराने वाले के रूप में जाना गया है । यह त्रिकलातीत और समस्त कलाओं से परे है । पहले अपने अन्तःकरण में स्थित उस सर्वरूप एवं संसाररूप देव की उपासना करनी चाहिए ॥५॥

जिससे यह जगत प्रपञ्च में प्रवृत्त होता है, वह जगत वृक्ष, काल तथा आकार से परे एवं उस प्रपञ्च से भिन्न है । धर्म के विस्तारक, पाप का नाश करने वाले, उस ऐश्वर्य के स्वामी को जानकर पुरुष आत्म में स्थित उस अमृतस्वरूप, विश्वाधार विराट को प्राप्त हो जाता है ॥६॥

ईश्वरों के परम महेश्वर, देवताओं के परम देव, पतियों के परम पति, अव्यक्त से भी परे तथा विश्व के अधिपति उस स्तवनीय देव को हम जानते हैं ॥७॥

उसके शरीर और इन्द्रियाँ नहीं हैं, उसके समान और उससे बड़ा भी कोई नहीं है, उसकी पराशक्ति विविध प्रकार की सुनी जाती है और वह स्वभावजन्य ज्ञानक्रिया और बलक्रिया वाला है ॥८॥

इस जगत में कोई उसका स्वामी नहीं है, उसका कोई शासक नहीं है एवं उसका कोई लिंग भी नहीं है । वह सबका कारण है और इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीवों का अधिपति है । उसका न कोई उत्पत्तिकर्ता है न कोई अधिपति ॥९॥

तन्तुओं द्वारा मकड़ी के समान उस एक परमदेव ने स्वयं ही अपनी प्रधान शक्ति से अपने को आवृत कर लिया है । वह हमें अपने ब्रह्मस्वरूप से एकत्व प्रदान करे ॥१०॥

सम्पूर्ण प्राणियों में वह एक देव स्थित है । वह सर्वव्यापक, समस्त भूतों का अन्तरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बस हुआ, सबका साक्षी, पूर्ण चैतन्य, शुद्ध और निर्गुण है ॥११॥

जो बहुत से निष्क्रिय जीवों के एक बीज को अनेक रूप कर देता है, उस अद्वितीय अधीश्वर को जो धीर पुरुष अपने अन्तःकरण में स्थित देखते हैं, उन्हें ही शाश्वत सुख प्राप्त होता है, औरों को नहीं ॥१२॥

जो नित्यों में नित्य, चेतनों में चेतन और एक अकेला ही सम्पूर्ण प्राणियों को उनके कर्मों का भोग प्रदान करता है, उस साँख्य एवं योग द्वारा अनुभूतिगम्य, सबके कारणरूप देव को जानकर पुरुष सम्पूर्ण बन्धनों से मुक्त हो जाता है ॥१३॥

वहाँ न तो सूर्य प्रकाशित होता है न चन्द्रमा अथवा तारों का समूह, न ये बिजलियाँ ही प्रकाशित होती है, तो अग्नि कैसे प्रकाशित हो सकती है । उसके प्रकाशित होने से ही सब प्रकाशित होते है । उसके प्रकाश से ही ये सब प्रकाशित हैं ॥१४॥

इस भुवन के मध्य एक हंस है, वही जल में स्थित अग्नि है । उसी को जानकर पुरुष मृत्यु के पार हो जाता है । इससे भिन्न मोक्ष प्राप्ति का कोई और मार्ग नहीं है ॥१५॥

जो सम्पूर्ण विश्व का रचयिता, ज्ञानस्वरूप, सर्वज्ञ, स्वयं ही जगत की उत्पत्ति का केन्द्र, काल का भी काल, गुणों का समुच्चय और सर्वविद्यावान है । वह पुरुष और प्रकृति का प्रमुख अधिपति, सम्पूर्ण गुणों का नियन्ता, संसार चक्र के बन्धन, स्थिति और मुक्ति का कारण है ॥१६॥

वह तन्मय, अमृतस्वरूप, ईश्वर रूप से स्थित, ज्ञाता, सर्वगत और इस भुवन का रक्षक है, जो सर्वदा इस जगत का शासन करता है, क्योंकि इसका शासन करने के लिए कोई और समर्थ नहीं है ॥१७॥

जो सर्वप्रथम ब्रह्मा को उत्पन्न करता है और उन्हें वेदों का ज्ञान प्रदान करता है । मैं मोक्ष प्राप्ति की अभिलाषा से बुद्धि को प्रकाशित करने वाले उस देव की शरण ग्रहण करता हूँ ॥१८॥

जो कलाओं तथा क्रियाओं से रहित, सदा शान्त, निर्दोष, निर्मल, अमृतत्व का सेतुरूप, प्रदीप्त अग्नि के समान देदीप्यमान है ॥१९॥

जिस समय मनुष्यगण आकाश को चमड़े की भाँति लपेट सकेंगे, तब उस देव को जाने बिना भी दुःखों का अन्त हो सकेगा ॥२०॥

श्वेताश्वतर ऋषि ने तप के प्रभाव से और उस देव की ही कृपा से ब्रह्म को जाना तथा ऋषियों द्वारा सेवित उस परम पवित्र ब्रह्मतत्त्व का उन्होंने आश्रम के सुपात्रों को उपदेश दिया ॥२१॥

उपनिषदों में इस परम गुह्य ब्रह्मविद्या का पूर्वकल्प में उपदेश दिया गया था । जिसका अन्तःकरण रागादि से शान्त न हुआ हो, उसे तथा जो अपना पुत्र या शिष्य न हो, उसे यह गुह्य ज्ञान नहीं देना चाहिए ॥२२॥
जिसे पुरुष को उस परम देव में अत्यन्त भक्ति है तथा जैसी उस देव में है, वैसी ही गुरु में भी है, उस महान् आत्मा के हृदय में ही ये बताए हुए गूढ़ ज्ञान प्रकाशित होते हैं, ऐसे महात्मा में ही ये ज्ञान प्रकाशित होते हैं ॥२३॥

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