धम्मपद

यमकवर्ग

सारे कार्यों का प्रारम्भ मन से होता है । मन श्रेष्ठ है । सारे कार्य मनोमय हैं । मनुष्य यदि दुष्ट मन से बोलता या कार्य करता है, तो दुःख उसका पीछा करता है, जिस प्रकार पहिया बैल के पैर का पीछा करता है ।1।

सारे कार्यों का प्रारम्भ मन से होता है । मन श्रेष्ठ है । सारे कार्य मनोमय हैं । मनुष्य यदि प्रसन्न मन से बोलता अथवा कार्य करता है, तो सुख उसका पीछा करता है, जिस प्रकार छाया मनुष्य का पीछा करती है, उसे छोड़ती नही ।2।

उसने मुझे अपशब्द कहे, उसने मुझे मारा, उसने मुझे हराया और उसने मेरा धन हरण किया । ऐसे विचारों को जो मन में रखता है, उसका वैर कभी शान्त नहीं होता ।3।

उसने मुझे अपशब्द कहे, उसने मुझे मारा, उसने मुझे हराया और उसने मेरा धन हरण किया । ऐसे विचारों को जो मन में नहीं रखता है, उसका वैर शान्त हो जाता है ।4।

वैर से वैर कभी शान्त नहीँ होता । अवैर से शान्त होता है । यह सनातन धर्म है ।5।

कुछ लोग नहीं जानते हैं कि हम संसार से मृत्यु को प्राप्त हो जावेंगे । और जो यह जान लेते हैं, उनके द्वन्द्व शान्त हो जाते हैं ।6।

जो मनुष्य सिर्फ शुभ को देखता हुआ विहार करता रहता है, इन्द्रियों में असयंत रहता है, भोजन में परिमाण को नहीं जानता और जो प्रमादी तथा वीर्यहीन है, उसे मार उसी प्रकार गिरा देता है जिस प्रकार हवा दुर्बल वृक्ष को गिरा देती है ।7।

जो मनुष्य अशुभ को देखता हुआ विहार करता है, इन्द्रियों में सुसयंत रहता है, भोजन में परिमाण को जानता है और जो श्रद्धायुक्त तथा वीर्यवान है, उसे मार नही गिरा सकता, जिस प्रकार हवा पर्वत को नहीं गिरा सकती ।8।

जो मलयुक्त है और काषाय वस्त्र धारण करता है, इन्द्रिय-दमन तथा सत्य से दूर हुआ वह मनुष्य काषाय धारण के योग्य नहीं है ।9।

जो मल-विहीन है, जो शील में रत है और जो इन्द्रिय-दमन तथा सत्य से युक्त है, वह मनुष्य काषाय धारण के योग्य है ।10।

जो असार में सार की बुद्धि रखते हैं और सार में असार को देखने वाले होते हैं, मिथ्या संकल्पों को देखने वाले वे लोग सार को प्राप्त नहीं करते ।11।

जो सार को सार और असार को असार जानते हैं, सम्यक् संकल्पों को देखने वाले वे लोग सार को प्राप्त करते है ।12।

जिस प्रकार वर्षा ठीक से न छाये गये मकान में प्रवेश कर लेती है, उसी प्रकार राग असंस्कृत चित्त में प्रवेश कर लेता है ।13।

जिस प्रकार वर्षा ठीक से छाये गये मकान में प्रवेश नहीं कर सकती है, उसी प्रकार राग सुसंस्कृत चित्त में प्रवेश नहीं कर सकता ।14।

यहाँ शोक करता है, परलोक में शोक करता है, पाप करने वाला दोनों लोक में शोक करता है । वह अपने कुत्सित कर्म को देखकर शोक करता है और दुःखित होता है ।15।

यहाँ आनन्दित होता है, परलोक में आनन्दित होता है, पुण्य करने वाला दोनों लोकों में आनन्दित होता है । वह अपने विशुद्ध कर्मों को देखकर आनन्दित होता है और प्रमोद करता है ।16।

यहाँ सन्तप्त होता है, परलोक में सन्तप्त होता है, पाप करने वाला दोनों लोकों में सन्तप्त होता है । मैंने पाप किया है – ऐसा विचार कर सन्तप्त होता है । दुर्गति को प्राप्त हुआ वह बार-बार सन्तप्त होता है ।17।

यहाँ आनन्दित होता है, परलोक में आनन्दित होता है, पुण्य करने वाला दोनों लोकों में आनन्दित होता है । मैंने पुण्य किया है – ऐसा विचार कर आनन्दित होता है । सद्गति को प्राप्त हुआ वह बार-बार आनन्दित होता है ।18।

यदि शास्त्रों का बहुत भाषण करता हुआ मनुष्य प्रमादी होकर उस पर आचरण करने वाला नहीं होता, तो वह दूसरों की गायें गिनने वाले ग्वाल के समान होता है । वह श्रमण बनने का भागीदार नहीं होता ।19।

यदि शास्त्रों का थोड़ा भी भाषण करता हुआ मनुष्य धर्म का उसके अनुसार आचरण करता है, राग, द्वेष और मोह का परित्याग करता है, सम्यक् प्रज्ञायुक्त हुआ चिन्ताविहीन चित्त वाला होता है तथा इहलोक व परलोक में आसक्तिरहित होता है, वह श्रमण बनने का भागीदार होता है ।20।

 

अप्रमादवर्ग

अप्रमाद अमृत का पद है और प्रमाद मृत्यु का । अप्रमाद करने वाले मृत्यु को प्राप्त नहीं होते और जो प्रमाद करने वाले हैं वे मरे हुओं के समान हैं ।1।

पण्डित लोग इस अप्रमाद को विशेष रूप से जानकर अप्रमाद में आनन्दित होते हैं और आर्यों के ज्ञान में लगे रहते हैं ।2।

जो लोग सदैव ध्यान करने वाले हैं, नित्य दृढ़ पराक्रम करने वाले हैं, वे धैर्यशाली लोग उत्तम कल्याण के स्वरूप निर्वाण का स्पर्श करते हैं ।3।

जो मनुष्य उत्थानशील है, स्मृतिमान है, पवित्र कार्य करने वाला है, विचारपूर्वक कार्य करता है, संयतयुक्त है, धर्मपूर्वक जीवन व्यतीत करता है तथा प्रमाद रहित है, उसका यश बढ़ता है ।4।

मेधावी मनुष्य उत्थान, अप्रमाद, संयम और दमन के द्वारा स्वयं को द्वीप बना ले, जिसे जल का प्रवाह घेर नहीं सकता ।5।

मूर्ख तथा दुर्बुद्धि मनुष्य प्रमाद में मन लगाते हैं । मेधावी मनुष्य अप्रमाद की रक्षा करता है, जिस प्रकार श्रेष्ठ धन की रक्षा की जाती है ।6।

प्रमाद में मन मत लगाओ । काम एवं वासना से परिचय मत बढ़ाओ । अप्रमादी मनुष्य ध्यान करता हुआ ही विपुल सुख को प्राप्त करता है ।7।

जब पण्डित अप्रमाद से प्रमाद को दूर कर देता है, तब वह प्रज्ञा के महल पर चढ़कर, शोकरहित होकर शोकयुक्त प्रज्ञा को इस प्रकार देखता है, जिस प्रकार पर्वत पर बैठा हुआ भूमि पर बैठे हुए को और धैर्यवान मनुष्य मूर्ख को देखता है ।8।

प्रमत्तों में अप्रमत्त होकर तथा सोये हुओं में जाग्रत होकर, बुद्धि द्वारा लाँघकर ऐसे चला जाता है जिस प्रकार शीघ्रगामी घोड़ा निर्बल घोड़े को लाँघ कर चला जाता है ।9।

इन्द्र अप्रमाद के द्वारा देवताओं में श्रेष्ठता को प्राप्त हुआ । सभी अप्रमाद की प्रशंसा करते हैं । प्रमाद सदैव निन्दनीय है ।10।

अप्रमाद में रत भिक्षु, प्रमाद में भय को देखने वाला, अपने सूक्ष्म तथा स्थूल बन्धनों को अग्नि की तरह जलाता हुआ जाता है ।11।

अप्रमाद में रत भिक्षु, प्रमाद में भय को देखने वाला, पतन के योग्य नहीं है । वह निर्वाण के समीप है ।12।

 

चित्तवर्ग

जिस प्रकार बाण को बनाने वाला अपने बाण को सीधा करता है, उसी प्रकार बुद्धिमान मनुष्य अपने निरन्तर विचलित रहने वाले, चपल, कठिनाई से रक्षा करने योग्य और कठिनाई से निवारण करने योग्यचित्त को सीधा करता है ।1।

जिस प्रकार जल रूपी घर से निकली हुई और स्थल पर फेंकी गई मछली तड़फड़ाती है, उसी प्रकार मार के बन्धन से निकलने के लिए यह चित्त तड़फड़ाता है ।2।

जो चित्त कठिनाई से निग्रह योग्य है, चञ्चल है, उस चित्त का दमन करना उत्तम है । दमन किया गया चित्त सुखकारी होता है ।3।

जो कठिनाई से देखे जाने योग्य है,बड़ा चतुर है और इच्छानुसार भागने वाला है, बुद्धिमान मनुष्य ऐसे चित्त की रक्षा करे । सुरक्षित चित्त सुखकारी होता है ।4।

जो मनुष्य दूर जाने वाले, अकेले विचरने वाले, अशरीरी और हृदय में छिपे हुए चित्त का संयमन कर लेंगे वे मार के बन्धन से छूट जावेंगे ।5।

जिसका चित्त अवस्थित नहीं है, जो सद्धर्म को नहीं जानता है, और जिसके मन की शान्ति विनष्ट हो गयी है, उसकी प्रज्ञा पूर्ण नहीं हो सकती ।6।

जिसका चित्त मलरहित है, जिसका मन अनाहत है, और जो पुण्य तथा पाप विहीन है, ऐसे सजग रहने वाले मनुष्य को भय नहीं है ।7।

इस शरीर को घड़े के समान जानकर, इस चित्त को नगर के समान बनाकर, प्रज्ञा रूपी शस्त्र से मार के साथ मनुष्य युद्ध करे । वह जीते हुए की रक्षा करे और आसक्ति रहित होकर रहे ।8।

अहो ! यह तुच्छ शरीर शीघ्र ही चेतना रहित होकर निरर्थक काष्ठ की भाँति पृथ्वी पर शयन करेगा ।9।

शत्रु शत्रु के प्रति, वैरी वैरी के प्रति जो बुराई करता है, कुमार्ग में लगा हुआ चित्त उससे अधिक बुराई करता है ।10।

माता, पिता और अन्य सम्बन्धी लोग जितनी भलाई नहीं कर सकते हैं, सन्मार्ग में लगा हुआ चित्त उससे अधिक  भलाई करता है ।11।

 

पुष्पवर्ग

इस पृथ्वी को और देवताओं सहित इस यमलोक को कौन जीतेगा ? कौन कुशल मनुष्य भली प्रकार उपदिष्ट धर्म के पदों का पुष्प की भाँति चयन करेगा ?।1।

शैक्ष इस पृथ्वी को और देवताओं सहित इस यमलोक को जीतेगा । कुशल शैक्ष भली प्रकार उपदिष्ट धर्म के पदों का पुष्प की भाँति चयन करेगा ।2।

इस शरीर को पानी के फेन के समान जानकर तथा मरीचिका के समान मानता हुआ, मार के पुष्पमय बाणों को काटकर, यमराज की अदृष्टि को प्राप्त हो जाओ ।3।

जिस प्रकार सोये हुए गाँव को बड़ा जलप्रवाह बहाकर ले जाता है, उसी प्रकार काम भोग रूपी फूलों का चयन करने वाले और आसक्त मन वाले मनुष्य को मृत्यु पकड़कर ले जाती है ।4।

काम भोग रूपी फूलों का चयन करने वाले, आसक्त मन वाले और काम वासनाओं में अतृप्त रहने वाले मनुष्य को मृत्यु अपने वश में कर लेती है ।5।

जिस प्रकार भ्रमर फूल के सौन्दर्य और गन्ध की हानि न करता हुआ उसके रस को लेकर भाग जाता है, उसी प्रकार मुनि ग्राम में विचरण करे ।6।

मनुष्य दूसरों के दोषों को और दूसरों के अच्छे और बुरे कार्यों को न देखे । उसे केवल अपने स्वयं के अच्छे और बुरे कार्यों को देखना चाहिए ।7।

जिस प्रकार सुन्दर और वर्णयुक्त फूल गन्धहीन होने से निष्फल हो जाता है, उसी प्रकार आचरण में प्रयोग न करने वाले की सुभाषित वाणी निष्फल होती है ।8।

जिस प्रकार सुन्दर और वर्णयुक्त फूल गन्धयुक्त होने से सफल होता है, उसी प्रकार आचरण में प्रयोग करने वाले की सुभाषित वाणी सफल होती है ।9।

जिस प्रकार फूलों की राशि में बहुत सी मालाओं को बनाया जाता है, उसी प्रकार उत्पन्न हुए मनुष्य को बहुत से अच्छे कार्य करने चाहिए ।10।

फूल की गन्ध वायु के विरुद्ध नहीं जाती है और चन्दन, तगर या मल्लिका की की गन्ध भी वायु के विपरीत नहीं जाती है । किन्तु सज्जनों की गन्ध वायु के विरुद्ध जाती है । सत्पुरुष सब दिशाओं में व्याप्त होता है ।11।

चन्दन, तगर, कमल या जूही, इन सबकी सुगन्धों से सदाचार की सुगन्ध उत्कृष्ट होती है ।12।

तगर और चन्दन की यह जो गन्ध है, वह अल्प मात्र है । परन्तु जो सदाचारी मनुष्यों की गन्ध है, वह उत्तम गन्ध देवताओं में फैलती है ।13।

उन सदाचारी और अप्रमादयुक्त होकर विचरण करने वाले तथा सम्यक ज्ञान द्वारा मुक्त हुए मनुष्यों के मार्ग को मार नहीं प्राप्त कर सकता ।14।

जिस प्रकार कूड़ा करकट फेंके गए राजमार्ग पर निर्मल गन्ध वाला मनोरम कमल पुष्प उत्पन्न हो जाता है ।15।

इसी प्रकार कूड़े करकट से युक्त के समान अन्धे हुए मनुष्यों में सम्यक ज्ञान को प्राप्त हुआ संबुद्ध श्रावक प्रज्ञा से प्रकाशमान होता है ।16।

 

बालवर्ग

जागने वाले की रात्रि लम्बी होती है । थके हुए के लिए योजन लम्बा होता है । सद्धर्म को न जानने वाले मूर्खों के लिए सँसार लम्बा होता है ।1।

यदि मार्ग पर चलते हुए मनुष्य को अपने समान या अपने से श्रेष्ठ साथी न मिले तो दृढ़ता के साथ अकेला चलता जावे, परन्तु मूर्ख का साथ न करे ।2।

‘पुत्र मेरे हैं’, ‘धन मेरा है’, ऐसा विचारकर मूर्ख मनुष्य दुःख पाता है, जब आत्मा ही अपना नहीं है, तो पुत्र कहाँ का, धन कहाँ का ।3।

जो मूर्ख अपनी मूर्खता को जानता है, इससे वह बुद्धिमान हो जाता है । पर जो मूर्ख होकर भी अपने को बुद्धिमान मानता है, वस्तुतः वही मूर्ख कहा जाता है ।4।

यदि मूर्ख मनुष्य जीवन भर बुद्धिमान मनुष्य के साथ रहे, तो भी वह धर्म को नहीं जान सकता, जिस प्रकार कलछी सूप के रस को नहीं जानती ।5।

यदि विचारवान मनुष्य क्षण भर भी बुद्धिमान मनुष्य के साथ रहे, तो भी वह धर्म को जान लेता है, जैसे जीभ सूप के रस को जान लेती है ।6।

दुष्ट बुद्धि वाले मनुष्य अपने शत्रु बने हुए से घूमते रहते हैं, और पाप युक्त कार्य को करते हैं, जो कि कड़वे फल देने वाले होते हैं ।7।

किया हुआ वह कार्य अच्छा नहीं होता, जिसे करके मनुष्य को पश्चाताप होता है और जिसके परिणाम को आँसू बहाते हुए, रोते हुए भोगना पड़ता है ।8।

किया हुआ वह कार्य अच्छा होता है, जिसे करके मनुष्य को सन्ताप नहीं होता है और जिसके परिणाम को विश्वासपूर्वक प्रसन्न मन से भोगता है ।9।

जब तक पाप कर्म का परिपाक नहीं होता है, तब तक मूर्ख मनुष्य उसे मधु के समान जानता है । और जब पाप कर्म का परिपाक होता है, तब वह मूर्ख मनुष्य दुःख को प्राप्त होता है ।10।

यदि मूर्ख मनुष्य प्रतिमाह कुश की नोंक से भोजन करे, तो भी वह धर्म के जानकारों के सोलहवें भाग के भी बराबर नहीं ही सकता ।11।

किया हुआ पापकर्म शीघ्र ही विकार नहीं लाता, जैसे दूध । पर वह पाप कर्म भस्म से आवृत हुई अग्नि के समान मूर्ख का पीछा करता है ।12।

मूर्ख मनुष्य का जितना भी ज्ञान है, वह उसके अनर्थ के लिए होता है । वह ज्ञान उसके मस्तक को छिन्न-भिन्न करता हुआ उसके शुद्ध अंश का विनाश कर देता है ।13।

मूर्ख मनुष्य झूठी वस्तुओं की इच्छा करता है, भिक्षुओं के बीच में अग्रणी बनना चाहता है, निवास स्थलों में ऐश्वर्य की कामना करता है, और दूसरे कुलों में आदर सत्कार की अभिलाषा रखता है ।14।

मूर्ख मनुष्य का संकल्प होता है कि गृहस्थ और श्रमण दोनों ही मेरे किये हुए कार्य का अनुमोदन करें, किन्ही भी करने योग्य तथा न करने योग्य प्रत्येक कार्य में मेरे ही वशवर्ती रहें । इसी प्रकार मूर्ख मनुष्य की इच्छाएँ और अभिमान बढ़ते जाते हैं ।15।

सांसारिक लाभों को प्राप्त करने का और मार्ग है, तथा निर्वाण की ओर ले जाने का मार्ग और है – इस प्रकार जानकर बुद्ध का श्रावक भिक्षु सत्कार का अभिनन्दन न करे और विवेक को सुदृढ़ बनावे ।16।

 

पण्डितवर्ग

जो निधियों के बतलाने वाले के समान वर्जनीय बातों को बतलाने वाला है, जो निग्रहवादी और मेधावी है – ऐसे इस प्रकार के बुद्धिमान का साथ करना चाहिए । ऐसे मनुष्य का साथ करने वाले को पुण्य मिलता है, पाप नहीं ।1।

जो मनुष्य उपदेश देता है, अनुशासन करता है, तथा असभ्य आचरण से निवारण करता है, वह मनुष्य सत्पुरुषों को प्रिय होता है और असत्यपुरुषों को अप्रिय होता है ।2।

मनुष्य पापी मित्र का साथ न करे । वह अधम पुरुष का संग न करे । वह कल्याणकारी मित्र का साथ करे और उत्तम पुरुष का संग करे ।3।

धर्म का पालन करने वाला प्रसन्नचित्त हो सुख से सोता है । बुद्धिमान मनुष्य आर्यों के द्वारा प्रतिपादित धर्म में सदा रमण करता है ।4।

नहरों के निर्माणकर्ता पानी को ले जाते हैं । बाण बनाने वाले बाण को झुकाते हैं । बढ़ई लकड़ी को ठीक करते हैं । इसी प्रकार पण्डित लोग स्वयं का दमन करते हैं ।5।

जिस प्रकार ठोस पर्वत हवा से कम्पायमान नहीं होता, इसी प्रकार पण्डित लोग निंदा और प्रशंसा में विचलित नहीं होते ।6।

जिस प्रकार गहरा जलाशय निर्मल और स्वच्छ होता है, इसी प्रकार पण्डित लोग धर्मों को सुनकर सन्तुष्ट हो जाते हैं ।7।

सत्पुरुष लोग सर्वत्र चले जाते हैं । सन्त लोग कामनाओं की अभिलाषा करते हुए व्यर्थ का प्रलाप नहीं करते । चाहे सुख से उनका स्पर्श हो और चाहे दुःख से, पण्डित लोग अपने आचरण में ऊँच और नीच का विकार नहीं दर्शाते ।8।

जो मनुष्य न अपने लिए और न दूसरों के लिए पुत्र, धन और राज्य की अभिलाषा करता है, जो अधर्म द्वारा अपनी समृद्धि की इच्छा नहीं करता, वह शीलवान तथा धार्मिक व्यक्ति है ।9।

मनुष्य में ऐसे लोग कम ही हैं जो पार जाने वाले हैं । ये अन्य लोग तो किनारे ही किनारे दौड़ने वाले हैं ।10।

पर जो लोग भली प्रकार से उपदेश किये गए धर्म का अनुगमन करते हैं, वे अत्यंत कठिनाई से पर जाने योग्य, मृत्यु के राज्य के पार चले जायेंगे ।11।

बुद्धिमान मनुष्य कृष्ण धर्म का परित्याग करके शुक्ल धर्म का आचरण करे । वह गृहस्थ अवस्था को त्यागकर गृहविहीन अवस्था को प्राप्त करे, जिसमें विवेक की प्राप्ति कठिन होती है ।12।

वह बुद्धिमान मनुष्य कामनाओं को त्यागकर, अकिंचन बनकर, वहाँ रत रहने की इच्छा करे तथा इस प्रकार चित्त के क्लेशों से अपने आप को परिशुद्ध करे ।13।

जिनका चित्त सम्बोधि के अंगों में भली प्रकार से अभ्यस्त हो गया है, ग्रहण करने में अनासक्त होकर, परिग्रह के परित्याग में रत हैं, जिनके चित्त के मैल विनष्ट हो गए हैं और जो दीप्तिमान हैं, ऐसे मनुष्य संसार में निर्वाण को प्राप्त करते हैं ।14।

 

अर्हंतवर्ग

जिसका मार्ग समाप्त हो चुका है, जो शोक रहित तथा सर्वथा विमुक्त है, सब ग्रन्थियों से छूट चुका है, उसके लिए कोई सन्ताप नहीं है ।1।

स्मृतिमान लोग उद्योग करते हैं । वे गृह में रमण नहीं करते । जिस प्रकार हंस जलाशय का परित्याग करके चले जाते हैं, उसी प्रकार वे गृहों को त्याग देते हैं ।2।

जो संचय नहीं करते हैं, जिनका भोजन परिज्ञात है, जिन्हें शून्यता-स्वरूप तथा निमित्तरहित मोक्ष दिखाई पड़ता है, उनकी गति उसी प्रकार कठिनाई से जानने योग्य है, जिस प्रकार आकाश में पक्षियों की ।3।

जिसके चित्त के मैल क्षीण हो गए हैं, जो आहार में अनासक्त है, जिसे शून्यता-स्वरूप तथा निमित्तरहित मोक्ष दिखाई पड़ता है, उसकी गति उसी प्रकार कठिनाई से जानने योग्य है, जिस प्रकार आकाश में पक्षियों की ।4।

जिस प्रकार सारथी के द्वारा घोड़ों का दमन किया जाता है, उसी प्रकार जिसकी इन्द्रियाँ शान्ति को प्राप्त हो गयी हैं, ऐसे अभिमान रहित और आस्रव-विहीन मनुष्य की देवतागण भी चाह रखते हैं ।5।

जो पृथ्वी के समान क्षुब्ध नहीं होता, जो इन्द्र के स्तम्भ के समान व्रत में दृढ़ है, जो जलाशय के समान कीचड़ से शून्य है, उस मनुष्य के लिए सँसार नहीं होता ।6।

जो मनुष्य यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति से विमुक्त और उपशान्त हो गया है, ऐसे मनुष्य का मन शान्त हो जाता है, उसकी वाणी और कर्म शान्त होते हैं ।7।

जो मनुष्य श्रद्धा रहित है, जो अकृत को जानने वाला है, जो बन्धनों को काटने वाला है और जिसने तृष्णा का त्याग कर दिया है, वही उत्तम पुरुष है ।8।

जहाँ अर्हंत लोग विचरण करते हैं – चाहे वह ग्राम हो या अरण्य हो, नीचा स्थान हो या ऊँचा स्थान हो, वह भूमि रमणीक है ।9।

उन रमणीक अरण्यों में, जहाँ साधारण लोग रमण नहीं करते, वहाँ काम-वासनाओं के पीछे न भटकने वाले वीतराग जन रमण करेंगे ।10।

 

सहस्त्रवर्ग

निरर्थक पदों से युक्त सहस्त्र वचनों से भी सार्थक एक पद श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर शान्ति प्राप्त हो जाती है ।1।

निरर्थक पदों से युक्त सहस्त्रों गाथाओं से भी एक गाथा पद श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर शान्ति प्राप्त हो जाती है ।2।

जो मनुष्य निरर्थक पदों से युक्त सौ गाथाओं को भी कहे, उससे धर्म का एक पद श्रेष्ठ है, जिसे सुनकर शान्ति प्राप्त हो जाती है ।3।

जो मनुष्य युद्ध में हजारों मनुष्यों को हजारों बार जीत लेवे, उससे बढ़कर युद्ध में जीतने वाला वह है जिसने स्वयं को जीत लिया है ।4।

इन अन्य प्रजाओं को जीतने की अपेक्षा अपने आप को जीतना श्रेष्ठ है । अपनी आत्मा को दमन करने वाले तथा नित्य संयत आचरण करने वाले पुरुष की – ।5।

विजय को – इस प्रकार के प्राणी की विजय को – न देवता, न गंधर्व, और न ब्रह्मा सहित मार पराजय में परिवर्तित कर सकते हैं ।6।

एक ओर यदि मनुष्य प्रतिमास हजारों की दक्षिणा सौ वर्ष तक यज्ञ करे और दूसरी ओर यदि वह परिशुद्ध मन वाले एक ही व्यक्ति का क्षण भर पूजन करे, तो सौ वर्ष तक किये गए यज्ञ से वह पूजन श्रेष्ठ है ।7।

एक ओर यदि मनुष्य सौ वर्ष तक वन में अग्नि की परिचर्या करे और दूसरी ओर यदि वह परिशुद्ध मन वाले एक ही व्यक्ति का क्षण भर पूजन करे, तो सौ वर्ष तक किये गए यज्ञ से वह पूजन श्रेष्ठ है ।8।

पुण्य की अभिलाषा करता हुआ मनुष्य लोक में वर्ष भर जो कुछ यज्ञ और हवन करता है, तो भी वह सरल वृत्ति वाले पुरुष के लिए की गई श्रेष्ठ अभिवादना के चौथाई भाग के बराबर नहीं है ।9।

जो अभिवादनशील है और जो सदा वृद्ध जनों की सेवा करने वाला है, उस मनुष्य की चार वस्तुएँ बढ़ती हैं – आयु, वर्ण, सुख, बल ।10।

दुराचारी और असंयत रहकर सौ वर्ष तक जीवित रहना निरर्थक है । पर सदाचारी रहकर एक दिन का जीवित रहना श्रेष्ठ है ।11।

दुर्बुद्धि और असंयत रहकर सौ वर्ष तक जीवित रहना निरर्थक है । पर बुद्धिमान और ज्ञानी रहकर एक दिन का जीवित रहना भी श्रेष्ठ है ।12।

आलसी और वीर्यहीन रहकर सौ वर्ष तक जीवित रहना निरर्थक है । पर वीर्ययुक्त और दृढ़तापूर्ण रहकर एक दिन का जीवित रहना भी श्रेष्ठ है ।13।

उत्पत्ति और विनाश को न देखते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहना निरर्थक है । पर उत्पत्ति और विनाश को देखते हुए एक दिन का जीवित रहना भी श्रेष्ठ है ।14।

अमृत के स्थान को न देखते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहना निरर्थक है । पर अमृत के स्थान को देखते हुए एक दिन का जीवित रहना भी श्रेष्ठ है ।15।

उत्तम धर्म को न देखते हुए सौ वर्ष तक जीवित रहना निरर्थक है । पर उत्तम धर्म को देखते हुए एक दिन का जीवित रहना भी श्रेष्ठ है ।16।

 

पापवर्ग

मनुष्य कल्याणकारी कार्य करने के लिए शीघ्रता करे और पाप से चित्त को निवारण करे । यदि मनुष्य पुण्यकारी कार्य को धीमी गति से करेगा तो उसका मन पाप में लग जायेगा ।1।

यदि मनुष्य पाप करता है तो उसे बार-बार न करे उस पाप में स्वच्छन्दतापूर्वक रत न होवे । पाप का संचय दुःखकारी होता है ।2।

यदि मनुष्य पुण्य करता है तो उसे बार-बार करे, उस पुण्य में स्वच्छन्दतापूर्वक रत होवे । पुण्य का संचय सुखकारी होता है ।3।

पाप करने वाला मनुष्य तब तक भलाई देखता है, जब तक कि पाप का परिणाम नहीं होता । जब पाप का परिणाम होता है, तब वह पापों को देखता है ।4।

भला करने वाला मनुष्य तब तक पाप को देखता है, जब तक कि भलाई का परिणाम नहीं होता । जब भलाई का परिणाम होता है, तब वह भलाई को देखता है ।5।

मनुष्य पाप की अवहेलना न करे कि वह मेरे पास नहीं आवेगा । पानी की बूँद-बूँद गिरने से जल का घड़ा भी भर जाता है । इसी प्रकार मूर्ख थोड़ा-थोड़ा भी संचय करते हुए पाप भर लेता है ।6।

मनुष्य पुण्य की अवहेलना न करे कि वह मेरे पास नहीं आवेगा । पानी की बूँद-बूँद गिरने से जल का घड़ा भी भर जाता है । इसी प्रकार धैर्यशाली मनुष्य थोड़ा-थोड़ा करते हुए पुण्य भर लेता है ।7।

जिस प्रकार बड़ी सम्पत्ति वाला व्यापारी थोड़े साथियों के होने के कारण भय युक्त मार्ग को त्याग देता है, इसी प्रकार जीने की इच्छा वाला मनुष्य पापों को विष के समान परित्याग कर दे ।8।

यदि मनुष्य के हाथ मे घाव न हो, तो वह हाथ से विष को उठा सकता है । विष घाव रहित अंग पर प्रभाव नहीं डालता । इसी प्रकार न करने वाले को पाप नहीं लगता ।9।

जो मूर्ख मनुष्य दोषरहित, शुद्ध और निर्मल पुरुष को दोष लगाता है, पाप उस मूर्ख का उसी प्रकार पीछा करता है, जिस प्रकार सूक्ष्म धूलि वायु के विपरीत फेंकी जाने पर पीछा करती है ।10।

कुछ लोग गर्भ में उत्पन्न होते हैं । पाप कर्म करने वाले लोग नरक में गिरते हैं । पुण्य कर्म करने वाले लोग स्वर्ग में जाते हैं और चित्त के मलों से रहित लोग निर्वाण को जाते हैं ।11।

न आकाश में, न समुद्र के मध्य में, न पर्वतों की गुफा में – जगत में कोई ऐसा प्रदेश विद्यमान नहीं है, जहाँ प्रवेश करके स्थित हुआ मनुष्य पाप कर्म से मुक्त हो सके ।12।

आकाश में, समुद्र के मध्य में अथवा पर्वतों की गुफा में कोई ऐसा प्रदेश विद्यमान नहीं है, जहाँ प्रवेश करके स्थित हुए मनुष्य को मृत्यु मार न सके ।12।

 

दण्डवर्ग

सब मनुष्य दण्ड से डरते हैं । सब मनुष्य मृत्यु से भय खाते हैं । अपने समान जानकर मनुष्य न किसी को मारे और न मारने को प्रेरित करे ।1।

सब मनुष्य दण्ड से डरते हैं । सब मनुष्यों को जीवन प्रिय है । अपने समान जानकर मनुष्य न किसी को मारे और न मारने को प्रेरित करे ।2।

जो मनुष्य सुख की कामना करने वाले प्राणियों को, अपने सुख की कामना करते हुए, दण्ड द्वारा मार डालता है, मरकर वह सुख प्राप्त नहीं करता है ।3।

जो मनुष्य सुख की कामना करने वाले प्राणियों को, अपने सुख की कामना करते हुए, दण्ड द्वारा नहीं मारता है, मरकर वह सुख को प्राप्त करता है ।4।

किसी से कठोर वचन मत कहो । कठोरता से बोले गए मनुष्य तुम्हें वैसा ही उत्तर देंगे । कठोर वचन दुःखदायी होते हैं और प्रतिहिंसा की भावना तुम्हें स्पर्श करेगी ।5।

यदि तुम अपने आप को टूटे काँसे के समान निःशब्द कर लो तो तुम निर्वाण को प्राप्त कर लोगे और तुम्हारे लिए प्रतिहिंसा की भावना नहीं रहेगी ।6।

जिस प्रकार ग्वाला डण्डे से गौवों को चारागाह में ले जाता है, इसी प्रकार वृद्धावस्था और मृत्यु प्राणियों की आयु को ले जाते हैं ।7।

पाप कर्म को करता हुआ मूर्ख मनुष्य उसे नहीं समझता । वह दुर्बुद्धि मनुष्य पाप कर्मों से इस प्रकार सन्तप्त हो जाता है, जिस प्रकार अग्नि से जला हुआ मनुष्य होता है ।8।

जो मनुष्य दण्ड के अयोग्य और निर्दोष लोगों को दण्ड से पीड़ित करता है, वह मनुष्य दस स्थितियों में से किसी एक को शीघ्र ही प्राप्त होता है ।9।

तीव्र वेदना, हानि, अंग-भंग, भारी बीमारी, अथवा पागलपन को प्राप्त करता है ।10।

अथवा राजा से दण्ड की प्राप्ति अथवा भयानक निन्दा, अथवा जाति बन्धुओं क् विनाश, अथवा भोग्य वस्तुओं का क्षय ।11।

अथवा इसके घरों को अग्नि जला देती है । वह दुष्ट बुद्धि वाला मनुष्य शरीर के छूटने पर नरक को प्राप्त होता है ।12।

जिस मनुष्य की आकांक्षाएँ समाप्त नहीं हो गयी हैं, उस मनुष्य की नंगा रहना, जटा बढ़ाना, कीचड़ लपेटना, उपवास रखना, कड़ी भूमि पर सोना, भस्म लगाना अथवा उकड़ूं बैठना आदि शुद्धि नहीं कर सकते ।13।

जो मनुष्य अलंकृत हुआ भी शान्तिपूर्वक विचरण करता है, शान्त, जितेन्द्रिय, संयम और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाला है, तथा सारे प्राणियों के प्रति दण्ड का त्याग कर चुका है, वह ब्राह्मण है, वह श्रमण है और वह भिक्षु है ।14।

क्या इस लोक में कोई ऐसा सलज्ज मनुष्य है, जो निन्दा को उसी प्रकार नहीं सहन करता जिस प्रकार अच्छा घोड़ा कोड़े को नहीं सहन करता है ?।15।

जिस प्रकार कोड़े पड़ा हुआ घोड़ा अच्छा हो जाता है, उसी प्रकार पश्चाताप करने वाले और संवेगवान बनो । तुम श्रद्धा, सदाचार, शक्ति, समाधि तथा धर्म के निश्चय से युक्त बनकर विद्या और आचरण से समन्वित हुए, पूर्णतया स्मृतिवान हुए इस महान दुःख को पार कर सकोगे ।16।

नहरों के निर्माण कर्ता पानी को ले जाते हैं । बाण बनाने वाले बाण को झुकाते हैं । बढ़ई लकड़ी को ठीक करते हैं । इसी प्रकार पण्डित लोग अपने स्वयं का दमन करते हैं ।17।

 

जरावर्ग

जब नित्य ही आग जल रही है, तो ये हँसी क्या है और आनन्द क्या है ? अन्धकार से घिरे हुए तुम लोग दीपक क्यों नहीं खोजते ?।1।

इस चित्र लिखे से शरीर को देखो जो वर्णों से युक्त है, फूला हुआ है, पीड़ित है और अनेकों संकल्प विकल्पों से भरा हुआ है तथा जिसकी स्तिथि स्थाई नहीं है ।2।

यह रूप जराजीर्ण है, रोगों का घर है और क्षण भंगुर है । दुर्गन्ध का ढेर यह शरीर खण्ड-खण्ड हो जाता है, क्योंकि मृत्यु पर्यन्त ही जीवन होता है ।3।

शरद काल की लौंकी के समान फेंक दी गयी इन कबूतर के रंग वाली हड्डियों को देखकर उनमें प्रेम कैसा ?।4।

यह हड्डियों का एक नगर बनाया गया है जो माँस और रक्त से लेपा गया है, जिसमें वृद्धावस्था, मृत्यु, अभिमान, और असूया का निवास है ।5।

जिस प्रकार राजाओं के चित्रित रथ जीर्ण हो जाते हैं, उसी प्रकार शरीर भी वृद्धावस्था को प्राप्त होता है । पर सज्जन पुरुषों का धर्म कभी वृद्धावस्था को प्राप्त नहीं होता है । सज्जन पुरुष सज्जन पुरुषों से ऐसा बतलाते हैं ।6।

यह अल्प ज्ञान प्राप्त किया हुआ मनुष्य बैल की तरह बढ़ता है । उसका माँस बढ़ता है, पर उसकी प्रज्ञा नहीं बढ़ती है ।7।

मैं इस शरीर रूपी घर को बनाने वाले की खोज करता हुआ, अनेक जन्मों में जाता हुआ दौड़ता रहा । बार-बार जन्म लेना दुःखदायी है ।8।

हे घर को बनाने वाले ! मैंने तुम्हें देख लिया है । अब तुम फिर घर न बना सकोगे । तुम्हारी सब कड़ियाँ टूट गयीं हैं तथा घर का शिखर गिर गया है । मेरा चित्त संस्कार रहित हो गया है । तृष्णाओं का विनाश हो गया है ।9।

जिन लोगों ने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया है और युवावस्था में धन की प्राप्ति नहीं की है, वे लोग मछलियों रहित जलाशय में वृद्ध कौञ्च पक्षी के समान चिन्तायुक्त होते हैं ।10।

जिन लोगों ने ब्रह्मचर्य का पालन नहीं किया है और युवावस्था में धन की प्राप्ति नहीं की है, वे लोग टूटे हुए धनुषों के समान अतीत की बातों को कहते हुए पड़े रहते हैं ।11।

 

आत्मवर्ग

यदि मनुष्य आत्मा को प्रिय समझता है, तो इसकी अच्छी तरह से रक्षा करे । पण्डित मनुष्य रात्रि के तीन यामों में से एक में अवश्य जाग्रत रहे ।1।

बुद्धिमान मनुष्य पहले अपने स्वयं को ही उचित कार्य में लगा दे । इसके पश्चात दूसरे को उपदेश दे । इस तरह वह क्लेश को प्राप्त नहीं होगा ।2।

यदि मनुष्य अपने स्वयं को वैसा बना ले जैसा कि दूसरों को उपदेश देता है, तो स्वयं जितेन्द्रिय बना हुआ वह दूसरे का दमन करे, क्योंकि वास्तव में स्वयं का दमन करना ही कठिन है ।3।

आप ही अपना स्वामी है, दूसरा कौन स्वामी हो सकता है ? अपने स्वयं को भली प्रकार से दमन कर लेने पर मनुष्य दुर्लभ स्वामी को प्राप्त कर लेता है ।4।

अपने स्वयं से किया गया, अपने स्वयं से उत्पन्न हुआ एवं अपने स्वयं से पोषित किया गया पाप दुर्बुद्धि मनुष्य को उसी प्रकार मथित करता है, जिस प्रकार वज्र पत्थर की मणि को काट देता है ।5।

जिसका अत्यंत दुराचार उसे इस प्रकार घेरे हुए है, जिस प्रकार मालुवा नाम की लता शाल वृक्ष को घेरे रहती है । वह अपने को वैसा ही कर लेता है, जैसे कि उसका शत्रु उसे चाहता है ।6।

ऐसा कार्य करना सरल है जो बुरे हैं और अपने लिए अहित करने वाले हैं । जो कार्य हितकारी और अच्छा है, उसका करना बड़ा ही कठिन होता है ।7।

जो दुर्बुद्धि मनुष्य पापमयी दृष्टि का आश्रय लेकर धर्मनिष्ठ और आर्य पुरुष अर्हतों के शासन की निंदा करता है, वह बाँस के फलों के समान अपनी हत्या के लिए प्रफुल्लित होता है ।8।

मनुष्य अपने स्वयं से किये गए पाप से, अपने को मलिन करता है । अपने स्वयं से न किये गए पाप से स्वयं शुद्ध रहता है । शुद्धि और अशुद्धि प्रत्येक मनुष्य पर निर्भर है । कोई मनुष्य किसी दूसरे को शुद्ध नहीं कर सकता ।9।

मनुष्य पराये बड़े धर्म के लिए भी स्वधर्म का परित्याग न करे । वह अपने धर्म को अच्छी प्रकार से जानकर उस शुभ कार्य में लगा रहे ।10।

 

लोकवर्ग

हीनधर्म का सेवन नहीं करे । प्रमाद युक्त न रहे । झूठी दृष्टि न रखे तथा लोक में आने की वृद्धि न करे ।1।

उत्थानशील बने, प्रमादी न बने, सदाचार युक्त धर्म का आचरण करे । धर्म का आचरण करने वाला इस लोक में तथा दूसरे लोक में सुखपूर्वक रहता है ।2।

सदाचार युक्त धर्म का आचरण करे, बुरा आचरण न करे । धर्म का आचरण करने वाला इस लोक में तथा दूसरे लोक में सुखपूर्वक रहता है ।3।

जिस प्रकार मनुष्य पानी के बुलबुले को देखता है तथा जिस प्रकार मृगजल को देखता है, उसी प्रकार संसार को देखने वाले को यमराज नहीं देखता है ।4।

आओ, विचित्र तथा राजरथ के समान इस संसार को देखो, जहाँ मूर्ख लोग दुःखी होते हैं और ज्ञानी लोगों की आसक्ति नहीं होती ।5।

जो पहले प्रमाद करके भी पश्चात् प्रमाद नहीं करता है, वह इस लोक को इस प्रकार प्रकाशित करता है, जैसे कि बादलों से मुक्त हुआ चन्द्रमा प्रकाशित करता है ।6।

जिसका किया हुआ पापकर्म कुशल से ढक जाता है, वह इस लोक को इस प्रकार प्रकाशित करता है, जैसे कि बादलों से मुक्त हुआ चन्द्रमा प्रकाशित करता है ।7।

यह लोक अन्धा हो गया है । यहाँ कुछ ही लोग देखते हैं । जाल से मुक्त हुए पक्षी के समान कुछ ही लोग स्वर्ग को जाते हैं ।8।

हंस सूर्य के मार्ग पर जाते हैं । समृद्धिशाली लोग आकाश में जाते हैं । सेना सहित मार को जीतकर धैर्यशाली लोग इस लोक से ले जाये जाते हैं ।9।

धर्म का उल्लंघन करने वाले, झूठ बोलने वाले, परलोक के प्रति उदासीन रहने वाले प्राणी को ऐसा कोई पाप नहीं जो अकार्य हो ।10।

कृपण मनुष्य देवलोक को नहीं जाते हैं । मूर्ख मनुष्य दान की प्रशंसा नहीं करते हैं । धैर्यशाली मनुष्य दान का अनुमोदन करता हुआ, उसी से परलोक में सुख प्राप्त करता है ।11।

पृथ्वी के एकच्छत्र राज्य से, स्वर्ग में जाने से, और सब लोकों के आधिपत्य से स्रोतः आपत्ति का फल श्रेष्ठ है ।12।

 

बुद्धवर्ग

जिसका विजय किया हुआ पराजय में नहीं बदलता, जिसकी विजय को संसार मे कोई नहीं पहुँचता, उस अनन्त एवं अपद बुद्ध को किस उपाय से तुम अस्थिर कर सकोगे ।1।

जिसको जालयुक्त तथा विष से भरी तृष्णा कहीं नहीं ले जा सकती, उस अनन्त एवं अपद बुद्ध को किस उपाय से तुम अस्थिर कर सकोगे ।2।

जो ध्यान में लगे हुए हैं, धैर्यशाली हैं, निष्काम कर्म के द्वारा शान्ति प्राप्त करने में लगे हुए हैं, उन स्मृतियुक्त बुद्धों से देवतागण ईर्ष्या करते हैं ।3।

मनुष्यता की प्राप्ति कठिन है, मनुष्य का जीवन कठिन है, सद्धर्म का सुनना कठिन है और बुद्धों की उत्पत्ति कठिन है ।4।

सब प्रकार के पापों का न करना, अच्छे कार्यों की सम्पत्ति जुटाना तथा अपने चित्त को शुद्ध बनाना – यह बुद्धों का उपदेश है ।5।

क्षमाशीलता परमतप है, तितिक्षा परम निर्वाण है – ऐसा बुद्धों का कहना है । दूसरों का घात करने वाला प्रव्रजित नहीं होता तथा दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वाला श्रमण नहीं होता ।6।

किसी की निंदा न करना, किसी को चोट न पहुँचाना, प्रतिमोक्ष के नियमों का पालन करना, भोजन में निश्चित परिमाण का ज्ञान रखना, एकान्त स्थान में शयन तथा आसन रखना, चित्त को योगयुक्त रखना – यह बुद्धों का अनुशासन है ।7।

कार्षापण अर्थात सोने की मुद्राओं की वर्षा से भी कामनाओं की तृप्ति नहीं होती है । कामनाएँ थोड़े स्वाद वाली और दुःखपूर्ण होती हैं – यह जानकर पण्डित – ।8।

दिव्य कामनाओं में आसक्ति को प्राप्त नहीं होता । पूर्णरूपेण प्रबुद्ध हुआ श्रावक तृष्णा के क्षय में लगा रहता है ।9।

भय से दुःखी हुए मनुष्य पर्वत, वन, आराम, वृक्ष और चैत्यों की शरण में जाते हैं ।10।

यह क्षेमकारी शरण नहीं है और उत्तम शरण भी नहीं है । इस शरण में आकर सब दुःखों से नहीं छूटता है ।11।

और जो बुद्ध, धर्म और संघ की शरण में गया है, सम्यक् ज्ञान से वह मनुष्य चार आर्य सत्यों को देख लेता है ।12।

दुःख, दुःख की उत्पत्ति, दुःख का विनाश तथा दुःख के विनाश की ओर ले जाने वाला अष्टांगिक मार्ग ।13।

वास्तव में यह क्षेमकारी शरण है और उत्तम शरण है । इस शरण में आकर सब दुःखों से छूट जाता है ।14।

ज्ञानी पुरुष दुर्लभ है । वह सब जगह पैदा नहीं होता । जहाँ वह धैर्यशाली पैदा होता है, उस कुल में सुख की वृद्धि होती है ।15।

प्रबुद्ध पुरुष का जन्म लेना सुखद है, सद्धर्म का उपदेश सुखद है, संघ की समग्रता सुखद है, समग्रता युक्त पुरुषों का तप सुखद है ।16।

जो पूजा के योग्य लोगों की, बुद्ध की या श्रावकों की, संसार के प्रपंचों से दूर हुओं की तथा शोकसागर से पार जाने वालों की पूजा करते हैं ।17।

निवृत हुओं की एवं निर्भीक बने हुओं की जो इस प्रकार पूजा करते हैं, कोई भी उनके पुण्य का थोड़ा भी वर्णन नहीं कर सकता ।18।

 

सुखवर्ग

शत्रुओं में अशत्रुता क् व्यवहार करते हुए हम जीवित रहें । शत्रु मनुष्यों में हम अशत्रु बनकर रहें ।1।

आतुरों में अनातुर का व्यवहार करते हुए, हम सुखपूर्वक जीवित रहें । आतुर मनुष्यों में हम अनातुर बनकर रहें ।2।

उत्सुकों में अनुत्सुक का व्यवहार करते हुए हम सुखपूर्वक जीवित रहें । उत्सुक मनुष्यों में हम अनुत्सुक बनकर रहें ।3।

हम लोग जिनका कुछ नहीं है, सुखपूर्वक जीवित रहें । आभास्वर देवों के समान हम प्रीतिभक्षण करने वाले बनें ।4।

विजय शत्रुता को उत्पन्न करती है । पराजित हुआ मनुष्य दुःखी हुआ सोता है । विजय तथा पराजय को त्यागकर शान्त हुआ मनुष्य सुखपूर्वक सोता है ।5।

राग के समान अग्नि नहीं है । द्वेष के समान कलह नहीं है । शरीर धारण करने के समान दुःख नहीं है और शान्ति से बढ़कर सुख नहीं है ।6।

संग्रह की प्रवृत्ति परम रोग है, संस्कार परम दुःख है । इसे यथार्थ रूप से जानकर निर्वाण परम सुख है – ऐसा मानो ।7।

आरोग्य परम लाभ है, संतुष्टि परम धन है, विश्वास परम ज्ञाति है तथा निर्वाण परम सुख है ।8।

विवेक तथा शान्ति के रस को पीकर, धर्म के प्रीतिरस को पीता हुआ मनुष्य निर्भय और निष्पाप हो जाता है ।9।

आर्यों का दर्शन मंगलकारी है । उनके साथ निवास सदैव सुखद होता है । मूर्खों के न देखने से नित्य ही सुखी रहे ।10।

मूर्ख की संगति में चलने वाला मार्ग में बहुत दुःखी होता है । मूर्खों के साथ निवास करना सदैव दुःखद होता है जैसे कि शत्रु के साथ रहना । धैर्यशाली के साथ रहना सुखद होता है जैसे कि जाति वालों का समागम सुखद होता है ।11।

जिस प्रकार चन्द्रमा नक्षत्र पद का अनुगमन करता है, उसी प्रकार मनुष्य धैर्यशाली, प्राज्ञ, विद्वान, कर्मठ, व्रतवान, आय तथा मेधाशाली सत्पुरुष का अनुगमन करे ।12।

 

प्रियवर्ग

अयोग्य में अपने को लगाता हुआ, तथा योग्य में अपने को न लगाता हुआ, अर्थ को त्यागकर प्रिय विषयों का ग्राही होता है, वह योग्य मार्ग पर चलने वालों से ईर्ष्या करता है ।1।

प्रियों के साथ मत जाओ, अप्रियों के साथ भी मत जाओ । प्रियों का न दिखना दुःखद है तथा अप्रियों का दिखना दुःखद है ।2।

इस कारण से प्रिय मत बनाओ । प्रिय का दूर होना कष्टकारी है । जिन के प्रिय तथा अप्रिय नहीं हैं उनके बन्धन नहीं होते ।3।

प्रिय से शोक उत्पन्न होता है । प्रिय से भय उत्पन्न होता है । प्रिय से मुक्त हुए को शोक नहीं होता, भय की तो बात ही क्या ।4।

प्रेम से शोक उत्पन्न होता है । प्रेम से भय उत्पन्न होता है । प्रेम से मुक्त हुए को शोक नहीं होता, भय की तो बात ही क्या ।5।

आसक्ति से शोक उत्पन्न होता है । आसक्ति से भय उत्पन्न होता है । आसक्ति से मुक्त हुए को शोक नहीं होता, भय की तो बात ही क्या ।6।

काम से शोक उत्पन्न होता है । काम से भय उत्पन्न होता है । काम से मुक्त हुए को शोक नहीं होता, भय की तो बात ही क्या ।7।

तृष्णा से शोक उत्पन्न होता है । तृष्णा से भय उत्पन्न होता है । तृष्णा से मुक्त हुए को शोक नहीं होता, भय की तो बात ही क्या ।8।

जो शील तथा ज्ञान से युक्त है, जो धर्मिष्ठ है, सत्यवादी है, जो अपना कार्य करने वाला है, उसे लोग प्रिय बनाते हैं ।9।

अवर्णनीय के प्रति जिसकी इच्छा उत्पन्न हो गयी है, जो मन में स्पष्ट हो गया है, जिसका चित्त कामनाओं में बँधा नहीं है, वह उर्ध्वस्रोता है – ऐसा कहा जाता है ।10।

दूर से कुशलता पूर्वक आये हुए, बहुत दिनों तक प्रवास में रहने वाले पुरुष का ज्ञाति वाले, मित्र एवं सुहृद वर्ग अभिनन्दन करते है ।11।

उसी प्रकार इस लोक से परलोक को गए हुए पुण्यवान पुरुष का भी आये हुए प्रिय ज्ञाति भाई के समान पुण्य कर्म स्वागत करते हैं ।12।

 

क्रोधवर्ग

क्रोध को त्याग दो, मान को त्याग दो, सब बन्धनों का अतिक्रमण कर दो । नाम और रूप में अनासक्त रहने वाले उस अकिञ्चन पर दुःख नहीं आते हैं ।1।

जो उठे हुए क्रोध को, भ्रान्त हुए रथ के समान रोक लेता है, उसे मैं सारथी कहता हूँ । अन्य तो लगाम पकड़ने वाले हैं ।2।

अक्रोध से क्रोध को जीते । साधुता से असाधु को जीते । दान से कृपण को तथा सत्य से झूठ बोलने वाले को जीते ।3।

सत्य बोले । क्रोध न करे । माँगे जाने पर थोड़ा भी देवे । इन तीन स्थानों से देवताओं के समीप जावे ।4।

जो अहिंसा – व्रतधारी तथा सदैव शरीर से संयत रहने वाले मुनि हैं, वे पतन न होने वाले स्थान को जाते हैं, जहाँ जाकर मनुष्य शोक नहीं करता ।5।

सदैव जाग्रत रहने वाले, दिन रात शिक्षित होने वाले तथा निर्वाण के प्रति प्रयत्न करने वाले मनुष्यों के चित्त के मल नष्ट हो जाते हैं ।6।

हे अतुल ! यह पुरानी बात है । यह आज के समान नहीं है । शान्त बैठने वाले की लोग निन्दा करते हैं और बहुत बोलने वाले की लोग निन्दा करते हैं । कम बोलने वाले की भी लोग निन्दा करते हैं । संसार में कोई ऐसा नहीं जो अनिन्दित हो ।7।

ऐसा मनुष्य न हुआ है, न होगा और न यहाँ विद्यमान है, जो पूरी तरह से निन्दित हो या पूरी तरह से प्रशंसित हो ।8।

जिस अविचलित चरित्र वाले, मेधावी तथा प्रज्ञा और शील से युक्त मनुष्य की, प्रतिदिन विचार करके विज्ञ लोग प्रशंसा करते हैं ।9।

सुवर्ण के समान उसकी कौन निन्दा कर सकता है ? देवता भी उसकी प्रशंसा करते हैं तथा वह ब्रह्मा से भी प्रशंसित है ।10।

शरीर के क्रोध की रक्षा करे, शरीर से संयत रहे, शरीर के दुश्चरित्र को त्याग कर, शरीर से अच्छे चरित्र का आचरण करे ।11।

वाणी के क्रोध की रक्षा करे, वाणी से संयत रहे, वाणी के दुश्चरित्र को त्याग कर, वाणी से अच्छे चरित्र का आचरण करे ।12।

मन के क्रोध की रक्षा करे, मन से संयत रहे, मन के दुश्चरित्र को त्याग कर, मन से अच्छे चरित्र का आचरण करे ।13।

जो धैर्यशाली शरीर से संयत हैं, वाणी से संयत हैं तथा मन से संयत हैं, वे वास्तव में सुसंयत हैं ।14।

 

मलवर्ग

अब तुम पीले पत्ते के समान हो । तुम्हारे पास यमराज के दूत भी उपस्थित हो गए हैं । तुम वियोग के मुख पर खड़े हो । पर तुम्हारे पास पाथेय भी नहीं है ।1।

तुम अपने को एक द्वीप बना लो, शीघ्र ही अभ्यास करो, पण्डित बन जाओ । धुले हुए मल वाले और निष्पाप हुए तुम दिव्य आर्य भूमि में जाओगे ।2।

तुम्हारी आयु अब समाप्त हो चुकी है । तुम यम के पास पहुँच चुके हो । बीच में तुम्हारा निवास स्थान भी नहीं है और तुम्हारे पास पाथेय भी नहीं है ।3।

तुम अपने को एक द्वीप बना लो । शीघ्र ही अभ्यास करो, पण्डित बन जाओ । धुले हुए मल वाले और निष्पाप हुए तुम जन्म और जरा को फिर से प्राप्त न होओगे ।4।

जिस प्रकार सुनार चाँदी के मैल को क्षण-क्षण क्रमशः थोड़ा-थोड़ा करके जलाता है, उसी प्रकार बुद्धिमान पुरुष क्रमशः क्षण-क्षण थोड़ा-थोड़ा करके अपने मल को दूर करे ।5।

जिस प्रकार लोहे से निकला हुआ मैल, उससे निकलकर उसी को खा जाता है, इसी प्रकार सदाचार का अतिक्रमण करने वाले को स्वयं के कर्म दुर्गति की ओर ले जाते हैं ।6।

स्वाध्याय न करना मंत्रों का मैल है, मरम्मत न करना घर का मैल है, आलस्य वर्ण का मैल है और प्रमाद रक्षक का मैल है ।7।

स्त्री का मैल दुराचार है, दानी का मैल मत्सर है और इस लोक में तथा परलोक में पापकर्म मैल है ।8।

इन सबसे बढ़कर अविद्या परम मैल है । हे भिक्षुओं ! इस मल को त्यागकर निर्मल बनो ।9।

निर्लज्ज, कौए के समान शूर, दूसरे का अहित करने वाले, पतित, प्रगल्भ और पापी का जीवन सुख से बीतता है ।10।

लज्जावान, नित्य पवित्रता की खोज करने वाला, आलस्य विहीन, मितभाषी, शुद्ध जीविका वाले, ज्ञानी पुरुष का जीवन कठिनाई से बीतता है ।11।

जो प्राणियों की हिंसा करता है, झूठ बोलता है, लोक में न दी गयी वस्तु को ले लेता है तथा परस्त्रीगमन करता है ।12।

जो मनुष्य मद्यपान में लगा रहता है, वह यहीं लोक में अपनी जड़ को खोदता है ।13।

हे पुरुष ! संयम रहित लोग इस प्रकार पाप करने वाले होते हैं – यह जान लो । तुम्हें लोभ और अधर्म चिरकाल तक दुःख में न जलाते रहें ।14।

मनुष्य अपनी श्रद्धा और प्रसन्नता के अनुसार दान देता है । वहाँ जो दूसरों के खान-पान में मूक बना रहता है, वह दिन या रात कभी भी शान्ति को प्राप्त नहीं करता ।15।

और जिसके यह विचार नष्ट हो गए हैं तथा जड़ से उखाड़ दिए गए हैं, वह दिन में या रात में शान्ति को प्राप्त करता है ।16।

राग के समान अग्नि नहीं है, द्वेष के समान ग्रह नहीं है, मोह के समान जाल नहीं है और तृष्णा के समान नदी नहीं है ।17।

दूसरों के दोष देखना सरल है, किन्तु अपने दोष देखना कठिन है । वह दूसरों के दोषों को भूसा की तरह फैलता है, परन्तु अपने दोषों को वैसे ही छुपाता रहता है, जैसे शठ जुआरी के पांसे को छुपाता है ।18।

दूसरे के दोषों को देखने वाले और सदैव दूसरों से चिढ़ने वाले मनुष्य के चित्त के मैल बढ़ जाते हैं । वह चित्त के मैलों के विनाश से दूर हटा हुआ है ।19।

आकाश में मार्ग नहीं है, बाहर के कर्मों से मनुष्य श्रमण नहीं बनता । सामान्य प्रजाजन सांसारिक प्रपंचों में लगे हुए हैं, किन्तु तथागत बुद्ध इन प्रपंचों से दूर हैं ।20।

आकाश में मार्ग नहीं है, बाहर के कर्मों से मनुष्य श्रमण नहीं बनता । संस्कार सदैव रहने वाले नहीं हैं और बुद्धों में अस्थिरता नहीं है ।21।

 

धर्मिष्ठवर्ग

जो मनुष्य एकाएक कोई कार्य करता है उससे वह परमात्मा नहीं हो जाता । जो अर्थ और अनर्थ दोनों का निश्चय करता है, वह पण्डित है ।1।

जो मनुष्य विचार पूर्वक समान धर्म से दूसरों का पथ प्रदर्शन करता है, जो धर्म द्वारा रक्षित है तथा मेधावी है, वह धर्मिष्ठ कहा जाता है ।2।

इससे कोई पण्डित नहीं होता कि वह बहुत बोलता है । जो क्षेम चाहने वाला है, शत्रुता से रहित है और निर्भय है – वह पण्डित कहा जाता है ।3।

इतने से कोई धर्मधर नहीं हो जाता कि वह बहुत बोलता है । जो थोड़ा भी सुन करके, शरीर के द्वारा धर्म का आचरण करता है और जो धर्म में प्रमाद नहीं करता, वही धर्मधर होता है ।4।

इससे कोई स्थविर नहीं होता कि उसका सिर सफेद हो गया है । उसकी आयु परिपक्व हो गयी है, पर वह व्यर्थ का वृद्ध कहा जाता है ।5।

जिसमें सत्य, धर्म, अहिंसा, संयम तथा दम है, वही मैल से रहित, धैर्यशाली तथा स्थविर कहा जाता है ।6।

केवल वक्ता होने के कारण अथवा वर्ण के सौंदर्य के कारण, ईर्ष्यालु, मत्सरयुक्त तथा शठ मनुष्य साधुरूप नहीं हो जाता ।7।

जिसके ये दोष नष्ट हो गए हैं तथा जड़ से उखड़ गए हैं, वह दोषरहित मेधावी मनुष्य ही साधुरूप कहा जाता है ।8।

व्रत रहित रहने वाला तथा झूठ बोलने वाला मनुष्य केवल मुण्डन करा लेने से श्रमण नहीं हो जाता । इच्छा तथा लोभ से भरा हुआ मनुष्य श्रमण कैसे बनेगा ।9।

जो छोटे तथा बड़े पापों को सर्वथा शमन करता है, पापों के शमन होने के कारण ही वह श्रमण कहलाता है ।10।

इतने से कोई भिक्षु नहीं हो जाता कि वह दूसरों से भिक्षा मांगता है । समस्त धर्मों को ग्रहण करके वह मनुष्य भिक्षु नहीं होता है ।11।

जो यहाँ पुण्य और पाप का परित्याग करके, ब्रह्मचारी रहता हुआ, ज्ञान मार्ग से लोक में विचरता है वह भिक्षु कहा जाता है ।12।

जो मनुष्य मूर्ख और अविद्वान है, वह केवल मौन धारण करने से मुनि नहीं हो जाता । जो मनुष्य तुला के समान ग्रहण करके अच्छे को ग्रहण करता है, वह पण्डित है ।13।

जो पापों का परित्याग करता है, वह मुनि है, और इसलिए वह मुनि है । जो दोनों लोकों का मनन करता है, वह मुनि कहा जाता है ।14।

इससे कोई मनुष्य आर्य नहीं होता कि वह प्राणियों की हिंसा करता है । सब प्राणियों की अहिंसा की वृत्ति रखने वाला मनुष्य आर्य कहा जाता है ।15।

केवल सदाचार और व्रत धारण करने से, सत्यवादिता, समाधिलाभ अथवा एकान्त में शयन करने से – ।16।

मैं अपृथग्जनों से सेवित नैष्कर्म्य सुख का अनुभव करता हूँ । हे भिक्षु, जब तक चित्त के मैल का विनाश न हो जावे, तब तक विश्वास मत करो ।17।

 

मार्गवर्ग

मार्गों में अष्टांगिक मार्ग श्रेष्ठ है, सत्यों में चार पद श्रेष्ठ हैं, धर्मों में वैराग्य श्रेष्ठ है और मनुष्यों में नेत्रधारी श्रेष्ठ है ।1।

यही वह मार्ग है । दर्शन की विशुद्धि के लिए दूसरा नहीं है । तुम इसी पर चलो । यह मार को मोहित करने वाला है ।2।

इस मार्ग पर चलकर तुम दुःखों का अंत कर लोगे । दुःखों के विनाश को जान करके, मैंने इस मार्ग का उपदेश दिया है ।3।

तुम्हें तपस्या करना है । तथागतों का कार्य तो उपदेश करना है । मार्ग पर चलने वाले तथा ध्यान करने वाले मार के बन्धन से मुक्त हो जावेंगे ।4।

सब बनी हुई वस्तुएँ अनित्य हैं – इस तरह प्रज्ञा से जब मनुष्य देखता है तब वह दुःखों से विरक्ति को प्राप्त होता है । यही मार्ग विशुद्धि का है ।5।

सब बनी हुई वस्तुएँ दुःखमय हैं – इस तरह प्रज्ञा से जब मनुष्य देखता है तब वह दुःखों से विरक्ति को प्राप्त होता है । यही मार्ग विशुद्धि का है ।6।

सब धर्म झूठ हैं – इस तरह प्रज्ञा से जब मनुष्य देखता है तब वह दुःखों से विरक्ति को प्राप्त होता है । यही मार्ग विशुद्धि का है ।7।

उठने के समय जो उठता नहीं है, युवा तथा बलवान होकर भी आलस्य से युक्त है, जिसके संकल्प और मन निर्बल हैं, ऐसा दीर्घसूत्री और आलसी आदमी प्रज्ञा के मार्ग को प्राप्त नहीं करता ।8।

वाणी की रक्षा करने वाला, मन से संयमी बने और शरीर से बुरा कार्य न करे । इन तीन कर्मपथों की शुद्धि करे और ऋषियों के बतलाये हुए मार्ग का सेवन करे ।9।

योगाभ्यास से ज्ञान उत्पन्न होता है । योगाभ्यास न करने से ज्ञान का क्षय होता है । लाभ और हानि के इन दो प्रकार के मार्गों को जानकर अपने को इस प्रकार लगावे, जिससे की ज्ञान में वृद्धि होवे ।10।

वन को काटो, वृक्ष को नहीं । वन से भय उत्पन्न होता है । वन तथा झाड़ी को काटकर हे भिक्षुओं ! तुम वन रहित हो जाओ ।11।

जब तक मनुष्य की स्त्रियों में अणुमात्र भी कामना रहती है और काटी नहीं जाती, तब तक दूध पीने वाला बछड़ा जैसे माता में आबद्ध रहता है, वैसे ही उसका मन बँधा रहता है ।12।

जिस प्रकार हाथ से शरद ऋतु के कुमुद को काट डालते हैं, उसी प्रकार अपने प्रति उपस्थित स्नेह को काट दो । शान्ति के मार्ग पर चलो । निर्वाण सुगत के द्वारा बतलाया गया है ।13।

यहाँ वर्षा ऋतु में निवास करूँगा, यहाँ हेमन्त और ग्रीष्म ऋतु में निवास करूँगा । मूर्ख इस प्रकार सोचता है और विघ्नों को नहीं जानता ।14।

जिस प्रकार सोये हुए गाँव को बड़ा जलप्रवाह बहाकर ले जाता है, उसी प्रकार पुत्र और पशुओं में लिप्त तथा आसक्त मन वाले मनुष्य को मृत्यु लेकर चली जाती है ।15।

मृत्यु से पकड़े गए मनुष्य की रक्षा के लिए न पुत्र हैं, न पिता है और न बन्धुगण हैं । जातिवालों में भी रक्षा नहीं हो सकती ।16।

इस बात को जानकर पण्डित और शीलवान मनुष्य शीघ्र ही निर्वाण की ओर जाने वाले मार्ग को साफ कर ।17।

 

प्रकीर्णवर्ग

यदि मनुष्य थोड़े से सुख के परित्याग से विपुल सुख की प्राप्ति को देखे, तो वह धैर्यशाली मनुष्य विपुल सुख को देखते हुए थोड़े से सुख का परित्याग कर दे ।1।

दूसरों को दुःख देने से जो मनुष्य अपने सुख की इच्छा करता है, वैर के संसर्ग में बड़ा हुआ वह वैर से नहीं छूटता ।2।

जो कर्तव्य है, उसे छोड़ देते हैं तथा अकर्तव्य को करते हैं, ऐसे बड़े हुए मैल वाले तथा प्रमत्त लोगों के आस्रव बढ़ जाते हैं ।3।

परन्तु जिनकी स्मृति शरीर कर प्रति सदैव बनी रहती है, जो अकर्तव्य को नहीं करते तथा सदैव कर्तव्य को करने वाले होते हैं, ऐसे स्मृतिमान और सचेत मनुष्यों के आस्रव अस्त हो जाते हैं ।4।

माता-पिता को, दो क्षत्रिय राजाओं को और प्रजा सहित राष्ट्र को मारकर ब्राह्मण निष्पाप होकर जाता है ।5।

माता-पिता को, दो श्रोत्रिय राजाओं को और पाँचवे व्याघ्र को मारकर ब्राह्मण निष्पाप होकर जाता है ।6।

जिनकी स्मृति दिन-रात बुद्धविषयक बनी रहती है, वे गौतम के शिष्य सदैव प्रबुद्ध होकर रहते हैं ।7।

जिनकी स्मृति दिन-रात धर्मविषयक बनी रहती है, वे गौतम के शिष्य सदैव प्रबुद्ध होकर रहते हैं ।8।

जिनकी स्मृति दिन-रात संघविषयक बनी रहती है, वे गौतम के शिष्य सदैव प्रबुद्ध होकर रहते हैं ।9।

जिनकी स्मृति दिन-रात शरीरविषयक बनी रहती है, वे गौतम के शिष्य सदैव प्रबुद्ध होकर रहते हैं ।10।

जिनका मन दिन-रात अहिंसा में रत रहता है, वे गौतम के शिष्य सदैव प्रबुद्ध होकर रहते हैं ।11।

जिनका मन दिन-रात भावना में रत रहता है, वे गौतम के शिष्य सदैव प्रबुद्ध होकर रहते हैं ।12।

संसार में संन्यस्त होना कठिन है, न रहने योग्य घर में रहना भी दुखदायी है, असमान लोगों के साथ रहना दुःखद है । मार्ग में गिरना दुःखद है । इसलिए मार्ग का चलने वाला न बने और न दुःख में गिरे ।13।

श्रद्धा और शील से सम्पन्न तथा यश और भोग से युक्त मनुष्य जिस-जिस देश में जाता है, वहीं-वहीं पूजित होता है ।14।

सन्त लोग बर्फीले पर्वतों के समान दूर से ही प्रकाशित होते हैं । असन्त लोग रात्रि में फेंके हुए बाणों के समान समीप में भी दिखाई नहीं देते ।15।

एक ही आसन रखने वाला, एक ही शय्या पर सोने वाले, अकेला ही विचरण करने वाला, आलस्य रहित होकर अपना दमन करता हुआ वन में रमण करे ।16।

 

निरयवर्ग

असत्य बोलने वाला मनुष्य नरक में जाता है और वह भी नरक में जाता है जो करके भी कहता है कि मैं नहीं करता । दोनों ही प्रकार के नीच कर्म करने वाले मनुष्य मरकर समान हो जाते हैं ।1।

कण्ठ में कषाय वस्त्र डालने वाले बहुत से पापी और असंयत होते हैं । वे पापी पाप कर्मों से नरक में पहुँचते हैं ।2।

दुराचारी तथा असंयत मनुष्य के लिए राष्ट्र का अन्न खाने की अपेक्षा अग्नि की शिखा के समान जलता हुआ लोहे का गोला खाना श्रेयस्कर है ।3।

परस्त्री गमन करने वाला प्रमत्त मनुष्य चार गतियों को प्राप्त करता है – अपुण्य लाभ, स्वेच्छापूर्ण निद्रा का अभाव, तीसरी निन्दा और चौथा नरक ।4।

ऐसे मनुष्य को अपुण्य लाभ, पाप की गति और भयभीत मनुष्य की भय से पीड़ित हुई स्त्री से थोड़ी सी प्रीति की प्राप्ति है, तथा राजा उसे बड़ा दण्ड देता है । अतएव मनुष्य को चाहिए कि पराई स्त्री का सेवन न करे ।5।

जिस प्रकार अच्छी तरह से न पकड़ा हुआ कुश हाथ को ही काट डालता है उसी प्रकार अच्छी तरह अभ्यास न किया गया श्रमणपन मनुष्य को नरक में ले जाता है ।6।

जो कार्य शिथिलता से किया जाता है, वह व्रत क्लेश से युक्त होता है, और जो ब्रह्मचर्य अशुद्ध है, – इन सबका महान फल नहीं होता ।7।

यदि करना है तो इसे करे और दृढ़ता पूर्वक इसे सम्पन्न कर डाले । शिथिल परिव्राजक बहुत धूल को ही फैलता है ।8।

पाप कार्य का न करना श्रेष्ठ है । पाप कार्य पीछे दुःख देता है । पुण्य कार्य करना श्रेष्ठ है, जिसे करके मनुष्य दुःखी नहीं होता ।9।

जिस प्रकार सीमान्त नगर की भीतर तथा बाहर से रक्षा की जाती है, इसी प्रकार मनुष्य स्वयं की रक्षा करे, क्षण भर भी न चुके । क्षण चूक जाने वाले लोग नरक में पड़े हुए शोक करते हैं ।10।

जो अलज्जा के योग्य कार्यों में लज्जा करते हैं और लज्जा के योग्य कार्यों में लज्जित नहीं होते, झूठी धारण को ग्रहण करने वाले वे प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।11।

जो भय रहित कार्यों में भय देखते हैं और भय युक्त कार्य मे भय नहीं देखते हैं, झूठी धारण को ग्रहण करने वाले वे प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।12।

जो दोष रहित कार्य मे दोष बुद्धि रखते हैं और दोष युक्त कार्य में अदोष को देखते हैं, झूठी धारण को ग्रहण करने वाले वे प्राणी दुर्गति को प्राप्त होते हैं ।13।

जो दोष युक्त कार्य को दोषयुक्त जानकर, तथा दोष रहित कार्य को दोष रहित जानकर यथार्थ धारणा ग्रहण करते हैं, वे प्राणी सद्गति को प्राप्त होते हैं ।14।

 

नागवर्ग

जिस प्रकार हाथी संग्राम में धनुष से गिरे हुए बाण को सहन करता है उसी प्रकार मैं कटु वाक्य को सहन करूँगा । दुष्ट लोग ही अधिक हैं ।1।

दमन किये गए हाथी को युद्घ में ले जाते हैं । दमन किये गए हाथी पर राजा आरोहण करता है, मनुष्यों में भी दमन करने वाला श्रेष्ठ है, जो कि कटु वाक्य को सहन करता है ।2।

दमन किये गए खच्चर, सिन्ध देश के कुटिल घोड़े और बड़े हाथी श्रेष्ठ हैं । पर अपने को दमन करने वाला मनुष्य उनसे भी श्रेष्ठ है ।3।

इन सवारियों से न जानी पहचानी हुई दिशा में मनुष्य नहीं जा सकता । संयमी मनुष्य अच्छी तरह दमन किये गए अपने द्वारा वहाँ जा सकता है ।4।

सेना को तितर-बितर करने वाला, दुर्धर्ष धनपालक नाम का हाथी बन्धन में पड़ जाने पर एक कौर नहीं खाता है और वह हाथियों के जंगल का स्मरण करता है ।5।

जब मनुष्य आलसी बन जाता है, ज्यादा खाने वाला हो जाता है, निद्रालु हो जाता है, करवट बदल-बदल कर सोता है, तब वह खा पीकर मोटे बने हुए सुअर के समान वह मूर्ख बार-बार जन्म लेता है ।6।

यह मेरा चित्त पहले अपनी इच्छा पूर्वक कामनाओं के अनुसार तथा सुखों के अनुसार विचरता रहा । जिस प्रकार अंकुश ग्रहण करने वाला महावत मतवाले हाथी को पकड़ता है, उसी प्रकार मैं आज इसे जड़ से पकडूँगा ।7।

अप्रमाद युक्त बनो । अपने चित्त की रक्षा करो । जिस प्रकार कीचड़ में फँसा हाथी अपना उद्धार करता है, उसी प्रकार कठिनाइयों से अपने आप को निकालो ।8।

उसे यदि परिपक्व बुद्धि वाला सहायक मिल जावे, जो साथ मे चले, जो साधुता से आचरण करता हो, और जो धैर्यशाली हो, तो सभी परिश्रयों को हटा करके सचेत और प्रसन्न मन के द्वारा उसके साथ विचरण कर ।9।

उसे यदि परिपक्व बुद्धि वाला सहायक न मिले, जो साथ में चले, जो साधुता से आचरण करता हो, जो धैर्यशाली हो तो जिस प्रकार से पराजित राष्ट्र को छोड़कर राजा चला जाता है और जिस प्रकार हाथी नागवन में अकेला विचरण करता है उसी तरह वह अकेला विचरण कर ।10।

अकेला विचरण करना श्रेष्ठ है, परन्तु मूर्ख को सहायक बनाना श्रेष्ठ नहीं । मनुष्य अकेला ही विचरण करे और पाप न करे । जिस प्रकार हाथी नागवन में अकेला विचरण करता है, उसी प्रकार कम उत्सुकता के लिए विचरण करे ।11।

काम पड़ने पर सहायक सुखकर होते हैं । चाहे जिस पदार्थ की प्राप्ति से जो सन्तोष होता है वह सुखकर है । जीवन के क्षय होने पर पुण्य सुखकारी है और सब दुःखों का विनाश सुखकारी है ।12।

संसार में माता बनना सुखकारी है, पिता बनना सुखकारी है, श्रमण बनना सुखकारी है तथा ब्राह्मण बनना सुखकारी है ।13।

वृद्धावस्था तक सदाचार का पालन करना सुखकारी है । स्थित हुई श्रद्धा सुखकारी है । प्रज्ञा का लाभ होना सुखकारी है । पाप का न करना सुखकारी है ।14।

 

तृष्णावर्ग

प्रमत्त होकर आचरण करने वाले मनुष्य की तृष्णा मालुवा लता के समान बढ़ती है । वन में फल की इच्छा करने वाले बन्दर के समान वह दिनोंदिन भटकता रहता है ।1।

यह जन्मते रहने वाली विषमयी तृष्णा संसार में जिसे घेर लेती है, उसके दुःख इस प्रकार बढ़ते हैं, जिस प्रकार वीरण नाम की घास बढ़ती है ।2।

इस जन्मते रहने वाली और दुस्त्याज्य तृष्णा को संसार में जो परास्त कर देता है, उसके दुःख इस प्रकार नष्ट हो जाते हैं, जिस प्रकार कमलपत्र से जल का बिन्दु गिरकर नष्ट हो जाता है ।3।

मैं तुमसे कहता हूँ । जितने तुम सब यहाँ आये हो, तुम्हारा कल्याण हो । तुम तृष्णा की जड़ को इस प्रकार खोद डालो जिस प्रकार खस को चाहने वाला वीरण घास को खोद डालता है । मार तुम्हें इस प्रकार नष्ट न कर दे, जिस प्रकार जल प्रवाह मृणाल को नष्ट कर देता है ।4।

जिस प्रकार जड़ के दृढ़ और स्थिर रहने पर, कटा हुआ वृक्ष भी फिर से बढ़ जाता है, उसी प्रकार तृष्णा के संस्कारों के नष्ट न हो जाने पर यह दुःख बार-बार वापिस आ जाता है ।5।

जिसकी तृष्णा के छत्तीस स्रोत प्रिय वस्तुओं की ओर बहते रहते हैं, राग से निकले हुए उसके संकल्प, उस मूर्ख मनुष्य को प्रवाह के समान बहाकर ले जाते हैं ।6।

तृष्णा के स्रोत सब ओर बहते हैं । इस कारण से लाता फूटकर खड़ी हो जाती है । उस उत्पन्न हुई लता को देखकर, प्रज्ञा से उसकी जड़ों को काट डालो ।7।

तृष्णा की नदियाँ स्निग्ध होती हैं और वे प्राणियों के चित्त को प्रसन्न करने वाली होती हैं । जो मनुष्य सुख की खोज करने वाले होते हैं और इन नदियों के प्रवाह में पड़े रहते हैं, वे जन्म और जरा के चक्कर में पड़े रहते हैं ।8।

तृष्णा के पीछे चलने वाले लोग, बँधे हुए खरगोशों की तरह चक्कर काटते हैं । बन्धनों में फँसे हुए लोग चिरकाल तक बार-बार दुःख पाते हैं ।9।

तृष्णा के पीछे चलने वाले लोग बँधे हुए खरगोशों की तरह चक्कर काटते हैं । इसलिए अपने वैराग्य की आकांक्षा करने वाले को तृष्णा को दूर करना चाहिए ।10।

जो वन में बन्धन से छूट जाता है और वन से मुक्त होकर वन की ही ओर दौड़ता है । उस मनुष्य को देखो जो मुक्त होकर फिर बन्धन की ही ओर दौड़ता है ।11।

धैर्यशाली मनुष्य उसे दृढ़ बन्धन नहीं कहते हैं, जो लोहे का बना हो, लकड़ी का बना है या रस्सी का बना हो । वास्तव में दृढ़ बन्धन तो धन में, मणि में, कुण्डल में, पुत्र में तथा स्त्री में आसक्त होना ही है ।12।

धैर्यशाली मनुष्य उसे दृढ़ बन्धन कहते हैं, जो नीचे खींचता है, जो शिथिल है और जो कठिनाई से छूटने योग्य है । निःस्पृह लोग इसे भी काटकर तथा काम सुख को छोड़कर संसार से विरक्त हो जाते हैं ।13।

जो राग में अनुरक्त हैं, वे तृष्णा के स्रोत में जा पड़ते हैं, जिस प्रकार मकड़ी स्वयं के बनाये हुए जाले में फँस जाती है । निःस्पृह और धैर्यशाली लोग इसे भी काटकर तथा सब दुःखों को छोड़कर संसार से विरक्त हो जाते हैं ।14।

भूत, भविष्य और वर्तमान के बन्धनों को त्याग दो और संसार के पार चले जाओ । जब तुम्हारा मन सब ओर से मुक्त हो जाएगा, तब फिर तुम फिर जन्म और जरा को प्राप्त न होवोगे ।15।

जो प्राणी सन्देह में फँसा हुआ है, जो तीव्र राग से युक्त है, जो शुभ वस्तुओं को ही देखने वाला है, उसकी तृष्णा और भी बढ़ जाती है । वह बन्धन को दृढ़ बनाता है ।16।

जो प्राणी सन्देह को शान्त करने में लगा हुआ है, जो सदा अशुभ की भावना करता है, वह मार के बन्धन को काट देगा और उसका विनाश कर देगा ।17।

जो निष्ठा को प्राप्त हो चुका है, जो निर्भय है, जो तृष्णा रहित है और जो दोष रहित है, उसने संसार के बन्धनों को काट लिया है और यह उसका अन्तिम शरीर है ।18।

जो तृष्णारहित है, जो परिग्रहरहित है, जो पदों की निरुक्ति करने में चतुर है, जो अक्षरों को पहले पीछे रखने को जनता है, वह निश्चय ही अन्तिम शरीर वाला और महाप्राज्ञ कहलाता है ।19।

मैं सबको परास्त करने वाला हूँ, मैं सबको जानने वाला हूँ, मैं सभी सभी धर्मों में अनुलिप्त हूँ, मैं सबका त्यागने वाला हूँ, तृष्णा के क्षीण होने से मैं विमुक्त हो गया हूँ – ऐसा स्वयं को जान लेने के पश्चात् मैं किसको अपना गुरु बतलाऊँ ।20।

धर्म का दान सब दानों को जीत लेता है । धर्म का रस सब रसों को जीत लेता है । धर्म के प्रति प्रेम सब प्रेमों को जीत लेता है और तृष्णा का विनाश सब दुःखों को जीत लेता है ।21।

यदि मनुष्य संसार से पार जाने की इच्छा नहीं करता, तो उस दुर्बुद्धि मनुष्य को विषय भोग नष्ट कर देते हैं । भोगों की तृष्णा के द्वारा वह दुर्बुद्धि मनुष्य अपनी हत्या कर लेता है, जैसे किसी दूसरे की हत्या करता है ।22।

खेतों का दोष तृण है और इस प्रजा का दोष राग है । इसलिए वीतराग महात्माओं को दिया हुआ दान महाफल वाला होता है ।23।

खेतों का दोष तृण है और इस प्रजा का दोष द्वेष है । इसलिए द्वेषविहीनों को दिया हुआ दान महाफल वाला होता है ।24।

खेतों का दोष तृण है और इस प्रजा का दोष मोह है । इसलिए मोहविहीनों को दिया हुआ दान महाफल वाला होता है ।25।

खेतों का दोष तृण है और इस प्रजा का दोष इच्छा है । इसलिए इच्छाविहीनों को दिया हुआ दान महाफल वाला होता है ।26।

 

भिक्षुवर्ग

आँखों का संयम अच्छा है । कानों का संयम अच्छा है । जीभ का संयम अच्छा है ।1।

शरीर का संयम अच्छा है । वाणी का संयम अच्छा है । मन का संयम अच्छा है । सर्वत्र संयम करना अच्छा है । जो भिक्षु सर्वत्र संयम करता है, वह सब दुःखों से छूट जाता है ।2।

भिक्षु उसको कहा जाता है, जो हाथ तथा पैरों का संयम करता है, जो वाणी का संयम करता है, जो उत्तम रूप से संयत है, जो अध्यात्म-रत है और जो समाधियुक्त, अकेला और सन्तुष्ट है ।3।

जो भिक्षु मुख से संयत है, जो मितभाषी और विनयशील है, वह अर्थ और धर्म को प्रकाशित करता है । उसका भाषण मधुर होता है ।4।

जो भिक्षु धर्म में रमण करने वाला है, धर्म में रत रहता है, धर्म का चिन्तन करता रहता है, वह सच्चे धर्म से च्युत नहीं होता ।5।

भिक्षु अपने लाभ की अवहेलना न करे । वह दूसरों से ईर्ष्या करता हुआ जीवन न बितावे । दूसरों से ईर्ष्या करता हुआ भिक्षु समाधि को प्राप्त नहीं होता ।6।

यदि अल्प लाभ हो तो भी भिक्षु अपने लाभ की अवहेलना नहीं करता है तो उस शुद्ध जीवन को व्यतीत करने वाले और आलस्य विहीन भिक्षु की देवता भी प्रशंसा करते हैं ।7।

नाम रूप वाले संसार में जिसकी बिल्कुल भी ममता नहीं है, जो वस्तु के न रहने पर शोक नहीं करता है, वह भिक्षु कहा जाता है ।8।

जो भिक्षु मैत्री भाव से जीवन यापन करता है, जो बुद्ध के उपदेश में प्रसन्न रहता है, वह संस्कारों को शमन करने वाले शान्त और सुखद पद को प्राप्त करता है ।9।

हे भिक्षु ! इस नाव के जल को उलीच दो । उलीचने पर तुम्हारे लिए हल्की हो जावेगी । तब तुम राग और द्वेष को काटकर निर्वाण को प्राप्त करोगे ।10।

पाँच को काट दो, त्याग दो, पाँच की भावना करो । पाँच का संग छोड़ने वाला भिक्षु ओघतीर्ण कहा जाता है ।11।

हे भिक्षु ! ध्यान करो, प्रमाद मत करो । तुम्हारा चित्त भोगों के चक्कर में न पड़े । प्रमत्त होकर तुम लोहे के गोले को मत निगलो । संसार की अग्नि में चलते हुए, ‘यह दुःख है’ ऐसा क्रन्दन मत करो ।12।

प्रज्ञाविहीन का ध्यान नहीं होता । ध्यान न करने वाले कि प्रज्ञा नहीं होती । जिसमें ध्यान और प्रज्ञा है, वह निर्वाण के समीप है ।13।

जो भिक्षु घर में अकेला रहता है, शान्त-चित्त है और सम्यक् धर्म का साक्षात्कार करता है, उसे अमानवीय आनन्द प्राप्त होता है ।14।

मनुष्य जैसे-जैसे शरीर के तत्वों की उत्पत्ति और विनाश पर विचार करता है, वैसे-वैसे वह ज्ञानियों के प्रेम और प्रमोद के अमृतमय आनन्द को प्राप्त करता है ।15।

यहाँ प्राज्ञ भिक्षु के लिए सर्वप्रथम आवश्यक है – इन्द्रिय संयम, सन्तोष, भिक्षु के आचरण में संयम ।16।

विशुद्ध जीविका वाले, आलस्य-विहीन और कल्याण करने वाले मित्रों की संगति कर । तू सेवा सत्कार की वृत्ति वाला बन और व्यवहार में कुशल बन । तब तू बहुत आनन्द को प्राप्त करके दुःख का अन्त कर लेगा ।17।

जिस प्रकार जूही अपने कोमल फूलों को गिरा देती है, उसी प्रकार हे भिक्षुओं ! तुम राग और द्वेष को छोड़ दो ।18।

उस भिक्षु को उपशान्त कहा जाता है, जो शरीर में शान्त होता है, जो वाणी में शान्त होता है, जो शान्तिमय और समाहित चित्त वाला होता है, और जिसने सांसारिक प्रलोभनों को त्याग दिया है ।19।

अपने द्वारा अपने को प्रेरित करो । अपने द्वारा अपने को संलग्न करो । इस प्रकार अपने द्वारा सुरक्षित किये गए और स्मृतियुक्त भिक्षु तुम सुख से विहार करोगे ।20।

आत्मा स्वयं ही आत्मा का स्वामी है और आत्मा स्वयं ही आत्मा की गति है, उसी प्रकार तुम अपनी आत्मा को संयत रखो ।21।

जो भिक्षु बहुत प्रमोद को प्राप्त करने वाला है, जो बुद्ध के उपदेश में प्रसन्न रहता है, वह शान्त, संस्कारों का उपशमन करने वाले तथा सुखकारी पद को प्राप्त करता है ।22।

जो भिक्षु युवावस्था में ही बुद्ध के उपदेश में संलग्न हो जाता है, वह इस संसार को इस प्रकार प्रकाशित करता है, जिस प्रकार बादलों से मुक्त हुआ चन्द्रमा प्रकाशित करता है ।23।

 

ब्राह्मणवर्ग

हे ब्राह्मण ! प्रयत्न करके तृष्णा के स्रोत को काट दो और कामनाओं को भगा दो । हे ब्राह्मण ! संस्कारों के विनाश को जानकर तुम अकृत को जानने वाले हो जाओगे ।1।

जब ब्राह्मण दोनों धर्मों में पारंगत हो जाता है, तब इस ज्ञानवान के सब बन्धन नष्ट हो जाते हैं ।2।

जिसके लिए न यह पार है और न वह पार है, दोनों ही पार नहीं है – उस निर्भय तथा अनासक्त मनुष्य को मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।3।

जो ध्यान करने वाला है, जो रजोगुण रहित है, जो स्थिर आसन है, जो कृतकृत्य है और जो चित्त के मैल से रहित है, उस उत्तम स्थिति को प्राप्त किये हुए मनुष्य को मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।4।

दिन में सूर्य तपता है, रात्रि में चन्द्रमा प्रकाशित होता है । कवचबद्ध हुआ क्षत्रिय तपता है और ध्यान करने वाला ब्राह्मण भी तपता है । और बुद्ध अपने तेज से दिन-रात तपता है ।5।

जिसने पाप को बहा दिया है वह ब्राह्मण है । जो समता का आचरण करता है वह श्रमण है । और जो अपने चित्त के मैल को हटाता है वह प्रव्रजित कहा जाता है ।6।

ब्राह्मण पर कोई प्रहार न करे और ब्राह्मण इस प्रहारकर्ता पर प्रहार न करे । ब्राह्मण पर प्रहार करने वाले को धिक्कार है और जो उस पर प्रहार करता है उसे भी धिक्कार है ।7।

ब्राह्मण के लिए यह बात कम श्रेयस्कर नहीं है, जो कि वह प्रिय वस्तुओं को मन से दूर कर लेता है । जहाँ-जहाँ से हिंसक मन निवृत हो जाता है, वहाँ-वहाँ से दुःख भी शान्त हो जाता है ।8।

जिसके शरीर, मन और वाणी से दुष्कृत नहीं होते और जो तीनों स्थानों पर संयत है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।9।

जिससे सम्यक् सम्बुद्ध द्वारा उपदिष्ट धर्म का ज्ञान प्राप्त करे, मनुष्य सत्कार करके उसे उसी प्रकार नमस्कार करे जिस प्रकार ब्राह्मण यज्ञ की अग्नि को नमस्कार करता है ।10।

न जटाओं से, न गोत्र से और न जन्म से मनुष्य ब्राह्मण होता है । जिसमें सत्य और धर्म है, वह शुद्ध है और वही ब्राह्मण है ।11।

हे दुर्बुद्धि ! तेरा जटाएँ धारण करने से तथा मृगचर्म पहिनने से क्या ? तेरा भीतर का भाग अन्धकार से पूर्ण है, बाहर क्या धोता है ।12।

जो फटे-पुराने वस्त्रों को धारण करता है, जो कृश है और जिसकी नसें दिखाई देती हैं, जो वन में अकेला ध्यान करता रहता है, मैं उसे ब्राह्मण कहता हूँ ।13।

केवल ब्राह्मण की योनि माता से उत्पन्न हुए मनुष्य को मैं ब्राह्मण नहीं कहता । वह संग्रह करने वाला है और ‘भो’ शब्द से संबोधन करने योग्य है । पर जो अकिञ्चन है और लेने की इच्छा नहीं करता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।14।

सब बन्धनों को काटकर जो कभी भयभीत नहीं होता है, जो विषयों की संगति से विमुक्त हो गया है और जो अनासक्त है, मैं उसे ब्राह्मण कहता हूँ ।15।

जिसने नन्दी, तृष्णा रूपी वरत्रा, सन्दान,हनुक्रम काट दिया है तथा जिसने संसार की श्रृंखला को फेंक दिया है, ऐसे प्रबुद्ध मनुष्य को मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।16।

जो मनुष्य बिना दूषित चित्त किये हुए अपशब्द, वध और बन्धन को सहन कर लेता है, क्षमा जिसका बल है, और वह जिसकी सेना है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।17।

जो क्रोध नहीं करता, जो व्रतवान है, जो शीलवान और बहुश्रुत है, जो जितेन्द्रिय है और जिसका यह अन्तिम शरीर है, मैं उसे ब्राह्मण कहता हूँ ।18।

जिस प्रकार कमल के पत्ते पर जल होता है, और जिस प्रकार आरे की नोंक पर सरसों का दाना होता है, उसी प्रकार जो कामनाओं में लिप्त नहीं होता, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।19।

जो अपने दुःख का विनाश जान लेता है, जिसने भार को उतार दिया है और जो आसक्ति रहित है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।20।

जो गंभीर प्रज्ञा वाला है, मेधावी है, मार्ग और अमार्ग का ज्ञाता है और जिसने उत्तम अर्थ को प्राप्त कर लिया है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।21।

जो गृहस्थों और गृहविहीनों दोनों से अनासक्त है, जो बिना ठिकाने के घूमता रहता है और जो कम इच्छाओं वाला है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।22।

जो चर और अचर प्राणियों में दण्ड का प्रयोग नहीं करता है, जो न मारता है और न मारने को प्रेरित करता है, उसे में ब्राह्मण कहता हूँ ।23।

जो विरोधियों के बीच विरोध नहीं करता, जो दण्डधारियों के बीच दण्ड नहीं उठाता और संग्रह करने वालों के बीच जो संग्रही नहीं है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।24।

जिसके राग, द्वेष, मान तथा दम्भ इस प्रकार गिरे हैं, जैसे आरे की नोंक से सरसों के दाने गिर पड़ते है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।25।

जो आकर्षक, ज्ञानवर्धक और सत्य वाणी बोलता है, जिससे किसी को पीड़ा नहीं पहुँचती, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।26।

जो इस संसार में न दी गयी वस्तु को, चाहे वह दीर्घ हो या हृस्व हो, चाहे वह स्थूल हो या सूक्ष्म हो, तथा चाहे वह शुभ हो या अशुभ हो, ग्रहण नहीं करता है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।27।

जिसकी इस लोक में तथा परलोक में आशाएँ नहीं हैं, जो आशारहित और अनासक्त है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।28।

जिसकी किसी वस्तु में संलग्नता नहीं है, जो जानकर संशय रहित हो गया है और जो अगाध अमृत को पा चुका है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।29।

जो यहाँ पुण्य और पाप दोनों के संग से अलग हो चुका है, जो शोकरहित, रजोगुण-रहित और शुद्ध है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।30।

जो चन्द्रमा के समान निर्मल, शुद्ध, प्रसन्न और निष्कलंक है और जिसकी सभी जन्मों की तृष्णा नष्ट हो गयी है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।31।

जिसने इस दुर्गम संसार के मोहपूर्ण उलटे रास्ते को पार कर लिया है, पार करके जो उस पार पहुँच गया है, जो ध्यान करने वाला है, पाप-रहित है और संशय विहीन है तथा जो अनासक्त और निवृत्त है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।32।

जो यहाँ कामनाओं का परित्याग करके गृहहीन होकर प्रव्रजित हो जाता है, जिसमें जन्म लेने की कामना क्षीण हो चुकी है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।33।

जो यहाँ तृष्णा का परित्याग करके गृहहीन होकर प्रव्रजित हो जाता है, जिसमें जन्म लेने की तृष्णा क्षीण हो चुकी है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।34।

जो मानुषिक वस्तुओं की आसक्ति को त्यागकर दिव्य वस्तुओं की आसक्ति से भी दूर हो गया है, जो सब प्रकार की आसक्तियों से छूट चुका है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।35।

जो अनुराग और विराग दोनों को त्यागकर शान्तस्वभाव हो चुका है, जो क्लेश रहित है और सब लोकों का विजेता वीर है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।36।

जो प्राणियों की उत्पत्ति और विनाश को अच्छी तरह जनता है, आसक्ति-रहित, सुगत और बुद्ध है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।37।

जिसकी गति को देवता, गंधर्व और मनुष्य नहीं जानते हैं, जिसके आस्रव क्षीण हो चुके हैं और जो अर्हत है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।38।

जिसके अतीत में, भविष्य में और वर्तमान में किसी वस्तु की आसक्ति नहीं है, जो अकिञ्चन है और अपरिग्रह है, उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।39।

जो मनुष्यों में श्रेष्ठ है, प्रवर है, वीर है, महर्षि है, वासनाओं का विजेता है, निष्पाप, स्नातक और बुद्ध है ,उसे मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।40।

जो अपने पूर्व जन्म को जानता है, जो स्वर्ग और नरक को देखता है, जिसके जन्म क्षय को प्राप्त हो चुके हैं, और जो अभिज्ञा में परायण है, ऐसे पूर्ण ज्ञान में पूर्णता को प्राप्त हुए मुनि को मैं ब्राह्मण कहता हूँ ।41।

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