तैत्तिरीय उपनिषद्

शीक्षावल्ली

प्रथम अनुवाक

मित्र हमारे लिए कल्याणप्रद हो, वरुण हमारे लिए कल्याणप्रद हो । अर्यमा हमारे लिए कल्याणप्रद हो । इन्द्र और बृहस्पति हमारे लिए कल्याणप्रद हों । विस्तृत पादविक्षेप वाले विष्णु हमारे लिए कल्याणप्रद हों । ब्रह्म को नमस्कार ! वायु तुम्हें नमस्कार ! तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हें ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूँगा । तुम्हें ही ऋत कहूँगा । और तुम्हें ही सत्य कहूँगा । वह मेरी रक्षा करे । वह उपदेशक की भी रक्षा करे । मेरी रक्षा करो । उपदेशक की भी रक्षा करो । ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ॥१॥

 

द्वितीय अनुवाक

हम शीक्षा की व्याख्या करते हैं । वर्ण, स्वर, मात्रा, बल, साम, सन्तान । इस प्रकार शीक्षा अध्याय कहा गया ॥१॥

 

तृतीय अनुवाक

हमें साथ-साथ यश प्राप्त हो । हमें साथ-साथ ब्रह्मतेज की प्राप्ति हो । अतः अब पाँच अधिकरणों में संहिता के उपनिषद की व्याख्या करेंगे । अधिलोक, अधिज्यौतिष, अधिविद्या, अभिप्रजा, अध्यात्म । इन्हें महासहिंता कहा जाता है ॥१॥

अब अधिलोक – पूर्वरूप पृथ्वी है, उत्तररूप द्युलोक है, आकाश संधि है और वायु संधान है । यह अधिलोक है ॥२॥

अब अधिज्यौतिष – पूर्वरूप अग्नि है, उत्तररूप आदित्य है, जल संधि है और विद्युत संधान है । यह अधिज्यौतिष है ॥३॥

अब अधिविद्या – पूर्वरूप आचार्य है, उत्तररूप शिष्य है, विद्या संधि है और प्रवचन संधान है । यह अधिविद्या है ॥४॥

अब अधिप्रजा – पूर्वरूप माता है, उत्तररूप पिता है, प्रजा संधि है और प्रजनन संधान है । यह अधिप्रजा है ॥५॥

अब अध्यात्म – नीचे का हनु (जबड़ा) पूर्वरूप है, ऊपर का हनु (जबड़ा) उत्तर रूप है, वाक् संधि है और जिह्वा संधान है । यह अध्यात्म है ॥६॥

इस प्रकार ये महासहिंताएँ हैं । जो इन व्याख्या की हुयी संहिताओं को इस प्रकार जानता है, वह प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज, अन्न और स्वर्गलोक से संयुक्त हो जाता है ॥७॥

 

चतुर्थ अनुवाक

जो वेद में ऋषभ एवं विश्वरूप है । जो वेद से प्रधानरूप और अमृतस्वरूप प्रकट हुआ । वह इन्द्र मुझे मेधा से संपन्न करे । हे देव ! मैं अमृत को धारण करने वाला होऊँ । मेरा शरीर योग्य हो । मेरी जिह्वा मधुमती हो । कानों से खूब श्रवण करूँ । ब्रह्म का कोष लौकिक बुद्धि से ढँका हुआ है । मेरे सुने हुए की रक्षा कर ॥१॥

मेरे लिए वस्त्र, गौ और अन्न-पान को सर्वदा शीघ्र ही ला देने वाली और उनका विस्तार करने वाली उस श्री को रोम वाले पशुओं सहित ले आ । स्वाहा ॥२॥

ब्रह्मचारी मेरे पास आये । स्वाहा । ब्रह्मचारी निष्कपट हों । स्वाहा । ब्रह्मचारी प्रमा युक्त हों । स्वाहा । ब्रह्मचारी दम युक्त हों । स्वाहा । ब्रह्मचारी शम युक्त हों । स्वाहा ॥३॥

जनता में यशस्वी होऊँ । स्वाहा । धनवानों में श्रेष्ठ होऊँ । स्वाहा ।  मैं उस भग में प्रविष्ट हो जाऊँ । स्वाहा । वह भग मुझमें प्रविष्ट हो जावे । स्वाहा । सहस्त्रशाखाओं से युक्त तुझ भग में मैं स्वयं को विशुद्ध करूँ । स्वाहा ॥४॥

जिस प्रकार जल नीचे की ओर एवं महीने संवत्सर में बहते हैं । उसी प्रकार हे धाता ! ब्रह्मचारी सब ओर से मेरे पास आवें । तू ही आश्रयस्थान है, मेरे प्रति प्रकाशित हो और मुझे प्राप्त हो । स्वाहा ॥५॥

 

पञ्चम् अनुवाक

भूः, भुवः, स्वः –  ये वे तीन व्याहृतियाँ हैं । उनमें से उस चौथी व्याहृति को महाचमस का पुत्र जानता था, जो कि ‘महः’ है । वही ब्रह्म है । वही आत्मा है । अन्य सब देवता उसके ही अंग हैं ॥१॥

भू: ही यह लोक है । भुवः ही अन्तरिक्ष है । स्वः ही स्वर्गलोक है । महः ही आदित्य है । आदित्य से ही समस्त लोक महिमान्वित होते हैं ॥२॥

भूः ही अग्नि है । भुवः ही वायु है । स्वः ही आदित्य है । महः ही चन्द्रमा है । चन्द्रमा से ही समस्त ज्योतियाँ महिमान्वित होती हैं ॥३॥

भूः ही ऋक है । भुवः ही साम है । स्वः ही यजुः है । महः ही ब्रह्म है । ब्रह्म से ही समस्त वेद महिमान्वित होते हैं ॥४॥

भूः ही प्राण है । भुवः ही अपान है । स्वः ही व्यान है । महः ही अन्न है । अन्न से ही समस्त प्राण प्राण महिमान्वित होते हैं ॥५॥

इस प्रकार ये ही वे चार व्याहृतियाँ हैं । चारों के चार-चार प्रकार हैं । जो इन्हें जानता है, वह ब्रह्म को जानता है । समस्त देव उसे बलि अर्पण करते हैं ॥६॥

 

षष्ट अनुवाक

यह जो हृदय के भीतर आकाश है, उसमें ही मनोमय अमृतस्वरूप हिरण्मय पुरुष रहता है ॥१॥

दोनों तालुओं के बीच, यह जो स्तन के सदृश लटक रहा है, जहाँ वह केशों का मूलस्थान स्थित है, शीर्ष के कपालों को भेद कर निकली वही इन्द्रयोनि है ॥२॥

भूः से अग्नि में, भुवः से वायु में, स्वः से आदित्य में और महः से ब्रह्म में प्रतिष्ठित होता है ॥३॥

स्वाराज्य को प्राप्त करता है । मन के स्वामित्व को प्राप्त करता है । इस प्रकार वह वाणी का स्वामी, चक्षु का स्वामी, श्रोत्र का स्वामी, विज्ञान का स्वामी हो जाता है ॥४॥

आकाशशरीर, सत्यस्वरूप, प्राणों का विश्राम, मन का आनन्द, शान्तिसंपन्न, अमृत ब्रह्म हो जाता है । हे प्राचीनयोग्य ! उसकी इस प्रकार उपासना कर ॥५॥

 

सप्तम अनुवाक

पृथ्वी, अंतरिक्ष, द्युलोक, दिशाएँ, दिशाओं का अन्तर । अग्नि, वायु, आदित्य, चन्द्रमा, नक्षत्र । जल, ओषधि, वनस्पति, आकाश, आत्मा । ये अधिभूत हैं ॥१॥

अब आध्यात्म – प्राण, व्यान, उदान, अपान, समान । चक्षु, श्रोत्र, मन, वाणी, त्वचा । चर्म, मांस, स्नायु, अस्थि, मज्जा ॥२॥

इस प्रकार विधान कर ऋषि ने कहा – ये सभी पाङ्क्त ही हैं । इस प्रकार  पाङ्क्त से ही पाङ्क्त को पूर्ण किया जाता है ॥३॥

 

अष्टम अनुवाक

ओम् ही ब्रह्म है । ओम् ही यह सब कुछ है । ओम् ही वह प्रसिद्ध अनुकृति है, जिसे ‘ओ श्रावय’ कहकर श्रवण कराते हैं । ओम् को ही साम के रूप में गाते हैं । ओम् शोम् को ही शास्त्रों में पढ़ते हैं । ओम् से ही अध्वर्यु प्रतिगर-मन्त्र का उच्चारण करते हैं । ओम् से ही ब्रह्मा अनुज्ञा देता है । ओम् से ही अग्निहोत्र की आज्ञा देता है । अध्ययन के लिए उद्यत ब्राह्मण ओम् से ही ‘ब्रह्म को प्राप्त करूँ’ कहता हुआ ब्रह्म को प्राप्त करता है ॥१॥

 

नवम अनुवाक

ऋत एवं स्वाध्याय और प्रवचन । सत्य एवं स्वाध्याय और प्रवचन । तप एवं स्वाध्याय और प्रवचन । दम एवं स्वाध्याय और प्रवचन । शम एवं स्वाध्याय और प्रवचन । अग्नि एवं स्वाध्याय और प्रवचन । अग्निहोत्र एवं स्वाध्याय और प्रवचन । अतिथि एवं स्वाध्याय और प्रवचन । मानुष एवं स्वाध्याय और प्रवचन । प्रजा एवं स्वाध्याय और प्रवचन । प्रजनन एवं स्वाध्याय और प्रवचन । प्रजाति एवं स्वाध्याय और प्रवचन । सत्य ही श्रेष्ठ है – राथीतरपुत्र सत्यवचा ऋषि का मत है । तप ही श्रेष्ठ है – पौरुशिष्टिपुत्र तपोनित्य ऋषि का मत है । स्वाध्याय-प्रवचन ही श्रेष्ठ है – मुद्गलपुत्र नाक मुनि का मत है । वह ही तप है, वह ही तप है ॥१॥

 

दशम अनुवाक

मैं ही वृक्ष् का प्रेरक हूँ । कीर्ति मेरी पर्वतशिखर के समान है । उत्पादक शक्ति से युक्त वह ऊर्ध्वपवित्र अमृत मैं ही हूँ । द्रविण और प्रकाश से युक्त हूँ । श्रेष्ठ बुद्धि से युक्त और अमृत से सिंचित हूँ । यही त्रिशंकु ऋषि का वेद वचन है ॥१॥

 

एकादश अनुवाक

वेद कहकर आचार्य शिष्य को उपदेश देते हैं – सत्य बोलो । धर्म का आचरण करो । स्वाध्याय से प्रमाद न करो । आचार्य के लिए अभीष्ट धन प्रदान करो । सन्तान-परम्परा का उच्छेदन मत करो । सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए । धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए । कुशल कर्म से प्रमाद नही करना चाहिए । उन्नति के साधनों से प्रमाद नहीं करना चाहिए । स्वाध्याय-प्रवचन से प्रमाद नहीं करना चाहिए । देवकार्य और पितृकार्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए ॥१॥

मातृदेव हो । पितृदेव हो । आचार्यदेव हो । अतिथिदेव हो । जो निर्दोष कर्म हैं उन्हीं का सेवन करना चाहिए, अन्य का नहीं । हमारे जो शुभ आचरण हैं उन्हीं की उपासना करनी चाहिए, अन्य की नहीं । जो कोई भी हमसे श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उनको तुम आसन और विश्राम दो । श्रद्धापूर्वक दो । अश्रद्धापूर्वक मत दो । अपने ऐश्वर्य अनुसार दो । लज्जापूर्वक दो । भयपूर्वक दो । विवेकपूर्वक दो ॥३॥

अब यदि कर्म और आचार के विषय में तुझे कोई शंका उपस्थित हो । तो वहाँ जो विचारशील, परामर्श देने में कुशल, कर्मपरायण, स्निग्ध स्वभाव वाले, धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, वे जैसा व्यवहार करें वैसा ही व्यवहार करना चाहिए । इसी प्रकार दोषारोपित मनुष्य के विषय में वहाँ जो विचारशील, परामर्श देने में कुशल, कर्मपरायण, स्निग्ध स्वभाव वाले, धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, वे जैसा व्यवहार करें वैसा ही व्यवहार करना चाहिए ॥४॥

यही आदेश है । यही उपदेश है । यही वेद रहस्य है । यही अनुशासन है । इसी प्रकार उपासना करनी चाहिए । इसी प्रकार उपासना करो ॥५॥

 

द्वादश अनुवाक

मित्र हमारे लिए कल्याणप्रद हो, वरुण हमारे लिए कल्याणप्रद हो । अर्यमा हमारे लिए कल्याणप्रद हो । इन्द्र और बृहस्पति हमारे लिए कल्याणप्रद हों । विस्तृत पादविक्षेप वाले विष्णु हमारे लिए कल्याणप्रद हों । ब्रह्म को नमस्कार ! वायु तुम्हें नमस्कार ! तुम ही प्रत्यक्ष ब्रह्म हो । अतः तुम्हें ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहा है । तुम्हें ही ऋत कहा है । और तुम्हें ही सत्य कहा है । उसने मेरी रक्षा की है । उसने उपदेशक की भी रक्षा की है । मेरी रक्षा की है । उपदेशक की भी रक्षा की है । ॐ शान्ति शान्ति शान्ति ॥१॥

 

ब्रह्मानन्दवल्ली

प्रथम अनुवाक

ब्रह्मवेत्ता परम आत्मा को प्राप्त कर लेता है । इस प्रकार यह कहा गया है । ब्रह्म सत्य, ज्ञानस्वरूप और अनन्त है । जो हृदयगुहारुपी परम आकाश में निहित उसे जानता है, वह समस्त भोगों के साथ ब्रह्म को प्राप्त करता है ॥१॥

उस इस आत्मा से ही आकाश उत्पन्न हुआ । आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी, पृथ्वी से ओषधियाँ, ओषधियों से अन्न और अन्न से पुरुष उत्पन्न हुआ । वह यह पुरुष अन्न-रसमय ही है । उसका यह ही शिर है । यह दक्षिण पक्ष है । यह उत्तर पक्ष है । यह आत्मा है । यह पुच्छ प्रतिष्ठा है ॥२॥

 

द्वितीय अनुवाक

पृथ्वी के आश्रित जो कोई भी प्रजा है, वह अन्न से ही उत्पन्न होती है, फिर अन्न से ही जीवित रहती है और अन्त में इस अन्न में ही विलीन हो जाती है । अन्न ही समस्त भूतों में ज्येष्ठ है । इसीलिये सर्व-औषधरूप कहा जाता है । जो ‘अन्न ही ब्रह्म है’ इस प्रकार उपासना करते हैं, वे समस्त अन्न को प्राप्त करते हैं ॥१॥

अन्न ही समस्त भूतों में श्रेष्ठ है । इसलिए सर्व-औषध कहा जाता है । अन्न से ही समस्त भूत उत्पन्न होते हैं । उत्पन्न होकर अन्न से ही वृद्धि को प्राप्त होते हैं । अन्न भूतों द्वारा खाया जाता है और वह भी उन्हें खाता है । इसी कारण ‘अन्न’ कहा जाता है ॥२॥

उस इस अन्न-रसमय से भिन्न उसके भीतर रहने वाला प्राणमय आत्मा है । उसके द्वारा ही यह अन्न-रसमय शरीर व्याप्त है । वह भी पुरुषाकार है । उसकी पुरुषाकारता के अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । प्राण ही उसका शिर है । व्यान दक्षिण पक्ष है । अपान उत्तर पक्ष है । आकाश आत्मा है । पृथ्वी पुच्छ प्रतिष्ठा है ॥३॥

 

तृतीय अनुवाक

देव, मनुष्य और पशु प्राण से ही अनुप्राणित होते हैं । प्राण ही प्राणियों को आयु है । इसी कारण सर्व-आयुष कहा जाता है । जो प्राण की ब्रह्मरूप से उपासना करते हैं, वे समस्त आयु को प्राप्त होते हैं ॥१॥

प्राण ही सब भूतों की आयु है । अतः सर्व-आयुष कहा जाता है । उस पूर्वोक्त के शरीर का यही आत्मा है ॥२॥

उस इस प्राणमय से भिन्न उसके भीतर रहने वाला मनोमय आत्मा है । उसके द्वारा ही यह प्राणमय शरीर व्याप्त है । वह भी पुरुषाकार है । उसकी पुरुषाकारता के अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । यजुः ही उसका शिर है । ऋक् दक्षिण पक्ष है । साम उत्तर पक्ष है । आदेश आत्मा है । अथर्वाङ्गिरस पुच्छ प्रतिष्ठा है ॥३॥

 

चतुर्थ अनुवाक

जहाँ से मन सहित वाणी उसे न पाकर लौट आते हैं, उस आनन्दस्वरुप ब्रह्म को जानने वाला विद्वान् कभी भय नहीं करता । उस पूर्वोक्त के शरीर का यही आत्मा है ॥१॥

उस इस मनोमय से भिन्न उसके भीतर रहने वाला विज्ञानमय आत्मा है । उसके द्वारा ही यह मनोमय शरीर व्याप्त है । वह भी पुरुषाकार है । उसकी पुरुषाकारता के अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । श्रद्धा ही उसका शिर है । ऋत दक्षिण पक्ष है । सत्य उत्तर पक्ष है । योग आत्मा है । महः पुच्छ प्रतिष्ठा है ॥२॥

 

पञ्चम अनुवाक

विज्ञान ही यज्ञ का विस्तार करता है और वह ही कर्मों का भी विस्तार करता है । समस्त देव उस ज्येष्ठ विज्ञान-ब्रह्म कक उपासना करते हैं । यदि विज्ञान को ब्रह्मरूप से जाने और उससे प्रमाद न करे तो शरीर में ही पापसमुदाय को छोड़कर समस्त भोगों का अनुभव करता है । उस पूर्वोक्त के शरीर का यही आत्मा है ॥१॥

उस इस विज्ञानमय से भिन्न उसके भीतर रहने वाला आनन्दमय आत्मा है । उसके द्वारा ही यह विज्ञानमय शरीर व्याप्त है । वह भी पुरुषाकार है । उसकी पुरुषाकारता के अनुसार ही यह भी पुरुषाकार है । प्रिय ही उसका शिर है । मोद दक्षिण पक्ष है । प्रमोद उत्तर पक्ष है । आनन्द आत्मा है । ब्रह्म पुच्छ प्रतिष्ठा है ॥२॥

 

षष्ट अनुवाक

यदि ‘ब्रह्म असत् है’ ऐसा समझता है, तो वह असत् ही हो जाता है । यदि ‘ब्रह्म है’ ऐसा समझता है तो उसे ही विद्वान् समझा जाता है । उस पूर्वोक्त के शरीर का यही आत्मा है ॥१॥

अब यहाँ से अनुप्रश्न हैं । क्या कोई अविद्वान भी मरकर उस लोक में जाता है ? अथवा कोई विद्वान् भी मरकर उस लोक को प्राप्त होता है या नहीं ?॥२॥

उसने कामना की कि मैं बहुत होकर प्रकट हो जाऊँ । उसने तप किया । उसने तप के द्वारा ही यह जो कुछ है उसकी रचना की । इसे रचकर वह इसी में प्रविष्ट हो गया । प्रविष्ट होकर वही मूर्त-अमूर्त, निरुक्त-अनिरूक्त, आश्रय-अनाश्रय, चेतन-अचेतन और सत्य-असत्यरूप भी हो गया । यह जो कुछ भी है उसे सत्य ही कहा जाता है ॥३॥

 

सप्तम अनुवाक

पहले यह असत् ही था । उससे ही सत् उत्पन्न हुआ । उसने स्वयं को स्वयं ही रचा । इसलिए वह सुकृत कहलाता है ॥१॥

वही जो सुकृत है, वही रस है । इस रस को प्राप्त करके ही वह आनन्दित होता है । कौन प्राण-क्रिया और कौन अन्य क्रियाएँ करता, यदि यह आकाशरुपी आनन्द न होता । यही तो आनन्दित करता है ॥२॥

जब वह इस अदृश्य, अशरीरी, अनिरूक्त और निराधार में अभय स्थिति प्राप्त करता है, तब वह अभय को ही प्राप्त होता है । जब वह इसमें थोड़ा सा भी भेद करता है, तो भय को प्राप्त हो जाता है । ब्रह्म ही अभिमानी विद्वान् के लिए भयरूप है ॥३॥

 

अष्टम अनुवाक

इसी के भय से वात चलता है । इसी के भय से सूर्य उदित होता है । इसी के भय से अग्नि, इन्द्र और पाँचवाँ मृत्यु दौड़ता है ॥१॥

अब इस आनन्द की मीमांसा करते है – युवा हो, साधुस्वभाव वाला युवा हो, वेद का अध्ययन किया हो, आशावान हो, दृढ़ हो, बलवान हो और उसी की यह समस्त धन से परिपूर्ण पृथ्वी हो, यह एक मानुष आनन्द है ॥२॥

ऐसे जो सौ मानुष आनन्द हैं, वह मनुष्य-गंधर्वों का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥३॥

ऐसे जो मनुष्य-गंधर्वों के सौ आनन्द हैं, वह देव-गंधर्वों का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥४॥

ऐसे जो देव-गंधर्वों के सौ आनन्द हैं, वह चिरलोकनिवासी पितृगणों का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥५॥

ऐसे जो चिरलोकनिवासी पितृगणों के सौ आनन्द हैं, वह आजानज नामक देवताओं का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥६॥

ऐसे जो आजानाज नामक देवताओं के सौ आनन्द हैं, वह कर्मदेव नामक देवताओं का एक आनन्द है, जो कि कर्म से देवत्व को प्राप्त हुए हैं । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥७॥

ऐसे जो कर्मदेव नामक देवताओं के सौ आनन्द हैं, वह देवताओं का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥८॥

ऐसे जो देवताओं के सौ आनन्द हैं, वह इन्द्र का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥९॥

ऐसे जो इन्द्र के सौ आनन्द हैं, वह बृहस्पति का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥१०॥

ऐसे जो बृहस्पति के सौ आनन्द हैं, वह प्रजापति का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥११॥

ऐसे जो प्रजापति के सौ आनन्द हैं, वह ब्रह्मा का एक आनन्द है । कामनारहित श्रोत्रिय को प्राप्त हैं ॥१२॥

वह जो इस पुरुष में है और जो उस सूर्य में भी है, वह एक है । जो इस प्रकार जानता है, वह इस लोक से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्मा को प्राप्त हो जाता है, इस प्राणमय आत्मा को प्राप्त हो जाता है, इस मनोमय आत्मा को प्राप्त हो जाता है, इस विज्ञानमय आत्मा को प्राप्त हो जाता है, इस आत्मा को प्राप्त हो जाता है ॥१३॥

 

नवम अनुवाक

जहाँ से मन सहित वाणी उसे न पाकर लौट आते हैं, उस आनन्दस्वरुप ब्रह्म को जानने वाला विद्वान् कभी भय नहीं करता । मैंने क्यों साधुकर्म न किया, क्यों पापकर्म किया –  वह इस प्रकार संतप्त नहीं होता । जो इन्हें इस प्रकार जाननेवाला है, वही आत्मा की रक्षा करने वाला है । जो इन दोनों को ही इस प्रकार जानता है, वही आत्मा की रक्षा करता है । यही उपनिषत् है ॥१॥

 

भृगुवल्ली

प्रथम अनुवाक

वरुण का पुत्र भृगु अपने पिता वरुण के समक्ष गया – ‘भगवन् ! ब्रह्म का उपदेश कीजिये’ । उससे यह कहा – ‘अन्न, प्राण, चक्षु, श्रोत्र, मन और वाक्’ । उससे फिर कहा – ‘ये सब भूत जिससे उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर जिससे जीवित रहते हैं और प्रयाण करते हुए जिसमें लीन हो जाते हैं, उसे ही विशिष्टरूप से जानने की इच्छा कर, वही ब्रह्म है’ । तब उसने तप किया ॥१॥

 

द्वितीय अनुवाक

उसने तप करके ‘अन्न ब्रह्म है’ इस प्रकार जाना । निश्चय ही अन्न से ये सभी भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर अन्न से ही जीवित रहते हैं और और प्रयाण करते हुए अन्न में ही लीन हो जाते हैं । इस प्रकार जानकर फिर अपने पिता वरुण के पास आया – ‘भगवन् ! ब्रह्म का उपदेश कीजिये’ । उससे कहा – ‘ब्रह्म को तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है’ । उसने तप किया ॥१॥

 

तृतीय अनुवाक

उसने तप करके ‘प्राण ब्रह्म है’ इस प्रकार जाना । निश्चय ही प्राण से ये सभी भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर प्राण से ही जीवित रहते हैं और और प्रयाण करते हुए प्राण में ही लीन हो जाते हैं । इस प्रकार जानकर फिर अपने पिता वरुण के पास आया – ‘भगवन् ! ब्रह्म का उपदेश कीजिये’ । उससे कहा – ‘ब्रह्म को तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है’ । उसने तप किया ॥१॥

 

चतुर्थ अनुवाक

उसने तप करके ‘मन ब्रह्म है’ इस प्रकार जाना । निश्चय ही मन से ये सभी भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मन से ही जीवित रहते हैं और और प्रयाण करते हुए मन में ही लीन हो जाते हैं । इस प्रकार जानकर फिर अपने पिता वरुण के पास आया – ‘भगवन् ! ब्रह्म का उपदेश कीजिये’ । उससे कहा – ‘ब्रह्म को तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है’ । उसने तप किया ॥१॥

 

पञ्चम् अनुवाक

उसने तप करके ‘विज्ञान ब्रह्म है’ इस प्रकार जाना । निश्चय ही विज्ञान से ये सभी भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर विज्ञान से ही जीवित रहते हैं और और प्रयाण करते हुए विज्ञान में ही लीन हो जाते हैं । इस प्रकार जानकर फिर अपने पिता वरुण के पास आया – ‘भगवन् ! ब्रह्म का उपदेश कीजिये’ । उससे कहा – ‘ब्रह्म को तप के द्वारा ब्रह्म को जानने की इच्छा कर, तप ही ब्रह्म है’ । उसने तप किया ॥१॥

 

षष्ट अनुवाक

उसने तप करके ‘आनन्द ब्रह्म है’ इस प्रकार जाना । निश्चय ही आनन्द से ये सभी भूत उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर आनन्द से ही जीवित रहते हैं और और प्रयाण करते हुए आनन्द में ही लीन हो जाते हैं । वह यह भृगु के द्वारा जानी हुई और वरुण के द्वारा उपदेश की हुयी विद्या परम आकाश में प्रतिष्ठित है । जो इस प्रकार जानता है, वह उसमें प्रतिष्ठित होता है । अन्नवान और अन्न का भोक्ता होता है । महान् होता है । प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज और कीर्ति के द्वारा भी महान् होता है ॥१॥

 

सप्तम अनुवाक

अन्न की निन्दा न करे । यह व्रत है । प्राण ही अन्न है । शरीर अन्न का भोक्ता है । प्राण शरीर में प्रतिष्ठित है और शरीर प्राण में प्रतिष्ठित है । इस प्रकार यह अन्न में ही अन्न प्रतिष्ठित हो रहा है । जो अन्न में ही अन्न की इस प्रकार प्रतिष्ठा को जानता है, वह उसमें प्रतिष्ठित होता है । अन्नवान और अन्न का भोक्ता होता है । महान् होता है । प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज और कीर्ति के द्वारा भी महान् होता है ॥१॥

 

अष्टम अनुवाक

अन्न की अवहेलना न करें । यह व्रत है । जल ही अन्न है । तेज अन्न का भोक्ता है । जल में तेज प्रतिष्ठित है और तेज में जल प्रतिष्ठित है । इस प्रकार यह अन्न में ही अन्न प्रतिष्ठित हो रहा है । जो अन्न में ही अन्न की इस प्रकार प्रतिष्ठा को जानता है, वह उसमें प्रतिष्ठित होता है । अन्नवान और अन्न का भोक्ता होता है । महान् होता है । प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज और कीर्ति के द्वारा भी महान् होता है ॥१॥

 

नवम अनुवाक

अन्न को बढ़ावे । यह व्रत है । पृथ्वी ही अन्न है । आकाश अन्न का भोक्ता है । पृथ्वी में आकाश प्रतिष्ठित है और आकाश में पृथ्वी प्रतिष्ठित है । इस प्रकार यह अन्न में ही अन्न प्रतिष्ठित हो रहा है । जो अन्न में ही अन्न की इस प्रकार प्रतिष्ठा को जानता है, वह उसमें प्रतिष्ठित होता है । अन्नवान और अन्न का भोक्ता होता है । महान् होता है । प्रजा, पशु, ब्रह्मतेज और कीर्ति के द्वारा भी महान् होता है ॥१॥

 

दशम अनुवाक

घर आये हुए किसी का भी परित्याग न करे । यह व्रत है । अतः जिस किसी भी प्रकार से बहुत सा अन्न प्राप्त करना चाहिए । ‘भोजन तैयार है’ उससे ऐसा कहते हैं। इस प्रकार जो मुख्यवृत्ति से तैयार किया हुआ अन्न देता है, उसे मुख्यवृत्ति से ही अन्न प्राप्त होता है । जो मध्यमवृत्ति से तैयार किया हुआ अन्न देता है, उसे मध्यमवृत्ति से ही अन्न प्राप्त होता है । जो निकृष्टवृत्ति से तैयार किया हुआ अन्न देता है, उसे निकृष्टवृत्ति से ही अन्न प्राप्त होता है । वह इस प्रकार जानता है ॥१॥

वाणी में क्षेमरूप, प्राण-अपान में योगक्षेमरूप, हाथों में कर्मरूप, पैरों में गतिरूप, पायु में त्यागरूप है । इस प्रकार मानुषी समाज्ञा है ॥२॥

अब दैवीय समाज्ञा – वृष्टि में तृप्तिरूप, विद्युत में बलरूप, पशुओं में यशरूप, नक्षत्रों में ज्योतिरूप, उपस्थ में प्रजाति, अमृत एवं आनन्दस्वरुप और आकाश में सर्वरूप है ॥३॥

वह प्रतिष्ठा है – इस प्रकार उपासना करे तो प्रतिष्ठावान होता है । वह महः है – इस प्रकार उपासना करने से महान् होता है । वह मन है – इस प्रकार उपासना करे तो मनन शक्ति से संपन्न होता है । वह नमः है – इस प्रकार उपासना करने से समस्त भोग उसके प्रति विनम्र हो जाते हैं । वह ब्रह्म है – इस प्रकार उपासना करने से ब्रह्मवान हो जाता है । वह ब्रह्म का परिमर है – इस प्रकार उपासना करने से उसके प्रति द्वेष रखने वाले शत्रु मर जाते हैं और अप्रिय भ्रातृव्य भी ॥४॥

यह जो इस पुरुष में है और इस में आदित्य में है, वह एक ही है । जो इस प्रकार जानता है, वह इस लोक से निवृत्त होकर इस अन्नमय आत्मा से संक्रमण कर, इस प्राणमय आत्मा से संक्रमण कर, इस मनोमय आत्मा से संक्रमण कर, इस विज्ञानमय आत्मा से संक्रमण कर, इस आनन्दमय आत्मा से संक्रमण कर इन लोकों में इच्छानुसार भोगवाला और इच्छानुसार रूपवाला होकर विचरण करता हुआ यह सामगान करता रहता है ॥५॥

हावु हावु हावु ! मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ, मैं अन्न हूँ । मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ, मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ, मैं ही अन्न का भोक्ता हूँ । मैं ही इनका संयोगकर्ता हूँ, मैं ही इनका संयोगकर्ता हूँ, मैं ही इनका संयोगकर्ता हूँ । मैं ही इस ऋत का प्रथम उत्पन्न हूँ । देवताओं से भी पूर्व विद्यमान अमृत की नाभि हूँ । जो मुझे देता है, वह इस प्रकार मेरी रक्षा करता है । मैं अन्नस्वरूप होकर अन्न खानेवालों को निगल जाता हूँ । मैं समूर्ण भुवन का पराभव करता हूँ । मैं ही सुवर्णा ज्योति हूँ । जो इस प्रकार जानता है । यह उपनिषत् है ॥६॥

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