केन उपनिषद्

प्रथम खण्ड

किसकी इच्छा से प्रेरित होकर मन गिरता है । किसके द्वारा नियुक्त होकर वह श्रेष्ठ प्रथम प्राण चलता है । किसकी इच्छा से इस वाणी द्वारा बोलता है । कौन देव चक्षु और श्रोत्र को नियुक्त करता है ॥१॥

जो श्रोत्र का भी श्रोत्र है । मन का भी मन है । वाणी का भी वाणी है । वही प्राण का भी प्राण है और चक्षु का भी चक्षु है । धीर पुरुष उसे जानकर, जीवन्मुक्त होकर,  इस लोक से जाकर जन्म-मृत्यु से रहित हो जाते हैं ॥२॥

न वहाँ चक्षु पहुँच सकता है । न वाणी जा सकती है । न मन ही पहुँच सकता है ।  न बुद्धि से जान सकते है । न औरों से सुनकर । उसे कैसे बतलाया जाय । वह विदित से भी परे है और अविदित से भी परे है । ऐसा ही हमने अपने पूर्व पुरुषों से सुना है । जिन्होंने हमारे प्रति उसकी व्याख्या की थी ॥३॥

जो वाणी से प्रकाशित नहीँ है, अपितु जिससे वाणी प्रकाशित होती है । उसी को तुम ब्रह्म जानो । उसे नहीं, जिसकी यह लोक उपासना करता है ॥४॥

जिसे मन द्वारा मनन नहीं किया जा सकता, अपितु मन जिससे मनन करता हुआ जाना जाता है । उसी को तुम ब्रह्म जानो । उसे नहीं, जिसकी यह लोक उपासना करता है ॥५॥

जिसे चक्षु के द्वारा नहीं देखा जा सकता, अपितु जिससे चक्षु देखता है । उसी को तुम ब्रह्म जानो । उसे नहीं, जिसकी यह लोक उपासना करता है ॥६॥

जिसे श्रोत्र के द्वारा नहीं सुना जा सकता, अपितु श्रोत्र जिससे सुनता है । उसी को तुम ब्रह्म जानो । उसे नहीं जिसकी यह लोक उपासना करता है ॥७॥

जो प्राण के द्वारा प्राणित नहीं है, अपितु प्राण जिससे प्राणित होता है । उसी को तुम ब्रह्म जानो । उसे नहीं जिसकी यह लोक उपासना करता है ॥८॥

 

द्वितीय खण्ड

यदि ऐसा मानते हो कि ‘मैं अच्छी तरह जानता हूँ’ । तो तुम निश्चय ही ‘ब्रह्म’ का थोड़ा सा ही रूप जानते हो । इसका जो स्वरुप तुझमे है और जो देवताओं में है, वह भी थोड़ा ही है । इसलिए तेरा ऐसा माना हुआ कि ‘जानता हूँ’ निःसंदेह विचारणीय है ॥१॥

न तो मैं यह मानता हूँ कि ‘जानता हूँ’ और न यह मानता हूँ कि ‘नहीं जानता’ । अतः जानता हूँ । जो उसे ‘न तो नहीं जानता हूँ’ और ‘न जानता ही हूँ’ इस प्रकार जानता है, वही जानता है ॥२॥

जो मानता है कि वह जानने में नहीं आता, उसका वह जाना ही हुआ है । जो मानता है कि वह जानता है, वह नहीं जानता । वह जानने वालों का नहीं जाना हुआ है और नहीं जानने वालों का जाना हुआ है ॥३॥

इस प्रतिबोध को जानने वाला ही वास्तव में जानता है । इससे ही अमृतत्व को प्राप्त होता है । उस आत्म से ही शक्ति प्राप्त होती है जबकि विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है ॥४॥

इस देह के रहते हुए जान लिया तो सत्य है । इस देह के रहते हुए नही जाना पाया तो महान विनाश है । धीर पुरुष सभी भूतों में उसे जानकर, इस लोक से प्रयाण कर अमर हो जाते हैं ॥५॥

 

तृतीय खण्ड

ब्रह्म ने ही देवताओं के लिए विजय प्राप्त की । ब्रह्म की उस विजय से देवताओं को अहंकार हो गया । वे समझने लगे कि यह हमारी ही विजय है । हमारी ही महिमा है ॥१॥

यह जानकर वह (ब्रह्म) उनके सामने प्रादुर्भूत हुआ । और वे (देवता) उसको न जान सके कि ‘यह यक्ष कौन है’ ॥२॥

तब उन्होंने (देवों ने) अग्नि से कहा कि, ‘हे जातवेद ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । अग्नि ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ ॥३॥

अग्नि यक्ष के समीप गया । उसने अग्नि से पूछा – ‘तू कौन है’ ?  अग्नि ने कहा – ‘मैं अग्नि हूँ, मैं ही जातवेदा हूँ’ ॥४॥

‘ऐसे तुझ अग्नि में क्या सामर्थ्य है ?’ अग्नि ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे जलाकर भस्म कर सकता हूँ’ ॥५॥

तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे जला’ । अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को जलाने में समर्थ न होकर वह लौट गया । वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका ॥६॥

तब उन्होंने ( देवताओं ने)  वायु से कहा – ‘हे वायु ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । वायु ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ ॥७॥

वायु यक्ष के समीप गया । उसने वायु से पूछा – ‘तू कौन है’ । वायु ने कहा – ‘मैं वायु हूँ, मैं ही मातरिश्वा हूँ’ ॥८॥

‘ऐसे तुझ वायु में क्या सामर्थ्य है’ ? वायु ने कहा – ‘इस पृथ्वी में जो कुछ भी है उसे ग्रहण कर सकता हूँ’ ॥९॥

तब यक्ष ने एक तिनका रखकर कहा कि ‘इसे ग्रहण कर’ । अपनी सारी शक्ति लगाकर भी उस तिनके को ग्रहण करने में समर्थ न होकर वह लौट गया । वह उस यक्ष को जानने में समर्थ न हो सका ॥१०॥

तब उन्होंने (देवताओं ने)  इन्द्र से कहा – ‘हे मघवन् ! इसे जानो कि यह यक्ष कौन है’ । इन्द्र ने कहा – ‘बहुत अच्छा’ । वह यक्ष के समीप गया । उसके सामने यक्ष अन्तर्धान हो गया ॥११॥

वह इन्द्र उसी आकाश में अतिशय शोभायुक्त स्त्री, हेमवती उमा के पास आ पहुँचा, और उनसे पूछा कि ‘यह यक्ष कौन था’ ॥१२॥

 

चतुर्थ खण्ड

उसने स्पष्ट कहा – ‘ब्रह्म है’ । ‘उस ब्रह्म की ही विजय में तुम इस प्रकार महिमान्वित हुए हो’ । तब से ही इन्द्र ने यह जाना कि ‘यह ब्रह्म है’ ॥१॥

इस प्रकार ये देव – जो कि अग्नि, वायु और इन्द्र हैं, अन्य देवों से श्रेष्ठ हुए । उन्होंने ही इस ब्रह्म का समीपस्थ स्पर्श किया । उन्होंने ही सबसे पहले जाना कि ‘यह ब्रह्म है’ ॥२॥

इसी प्रकार इन्द्र अन्य सभी देवों से अति श्रेष्ठ हुआ । उसने ही इस ब्रह्म का सबसे समीपस्थ स्पर्श किया । उसने ही सबसे पहले जाना कि ‘यह ब्रह्म है’ ॥३॥

उस ब्रह्म का यही आदेश है । जो कि विद्युत के चमकने जैसा है । नेत्रों के झपकने सा है । यही उसका अधिदैवत रूप है ॥४॥

अब आध्यात्मिक रूप । वह मन ही है । जो उसकी ओर जाता है । निरन्तर स्मरण करता है । संकल्प करता है ॥५॥

वह यह बृह्म ही वन (वन्दनीय) है । वन नाम से ही उसकी उपासना करनी चाहिए । जो भी उसे इस प्रकार जान लेता है, समस्त भूतों का वह प्रिय हो जाता है ॥६॥

हे गुरु ! उपनिषद का उपदेश कीजिये । इस प्रकार कहने पर तुझसे  उपनिषद कह दी । यह निश्चय ही ब्रह्मविषयक उपनिषद है ॥७॥

तप, दम एवं कर्म ही उसकी प्रतिष्ठा हैं । वेद उसके सम्पूर्ण अंग हैं और सत्य उसका आयतन है ॥८॥

जो इस प्रकार इस उपनिषद को जान लेता है, वह पापों को नष्ट करके अनन्त और महान स्वर्गलोक में प्रतिष्ठित होता है, प्रतिष्ठित होता है ॥९॥

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