कठ उपनिषद्

प्रथम अध्याय  

प्रथम वल्ली

प्रसिद्ध है कि फल के इच्छुक वाजश्रवा के पुत्र (उद्दालक) ने यज्ञ में अपना सारा धन दे दिया । उसका एक नचिकेता नाम का पुत्र था ॥१॥

जिस समय दक्षिणा के रूप में देने के लिए गौएँ ले जायी जा रही थीं, छोटा बालक होने पर भी उसमें श्रद्धा का आवेश हुआ । वह विचार करने लगा ॥२॥

जो जल पी चुकी हैं । जिनका घास खाना समाप्त हो गया है । जिनका दूध भी दुह लिया गया है । जिनमें प्रजनन शक्ति का अभाव हो गया है । ऐसी गौओं का दान करने वाला तो आनन्द-शून्य लोकों को प्राप्त होता है ॥३॥

वह अपने पिता से बोला ‘है तात ! आप मुझे किसको देंगे’ ?  इसी प्रकार दूसरी तीसरी बार भी पूछने पर पिता ने कहा ‘मैं तुझे मृत्यु को दूँगा’ ॥४॥

मैं बहुतों में प्रथम और बहुतों में मध्यम हूँ । यम का ऐसा क्या कार्य है जिसे पिता आज मेरे द्वारा सिद्ध करेंगे ॥५॥

पूर्वजों के व्यवहार पर विचार कीजिये तथा अन्य श्रेष्ठ लोगों को भी देखें । मनुष्य खेती की तरह पकता है । मरता है । खेती की ही भाँति फिर उत्पन्न होता है ॥६॥

(यमलोक में नचिकेता)

ब्राह्मण-अतिथि के रूप में स्वयं अग्नि ही घरों में प्रवेश करते हैं । अतः (हे यमदेव) उनकी शान्ति के लिए जल ले जाईये ॥७॥

जिसके घर में ब्राह्मण बिना भोजन किये रहता है उस अल्पबुद्धि पुरुष की आशाएँ, प्रतीक्षाएँ, उनके संयोग से प्राप्त होने वाले फल, प्रिय वाणी से होने वाले फल, यज्ञ दान आदि शुभ कर्मों के फल, पुत्र, पशु आदि को वह नष्ट कर देता है ।॥८॥

हे ब्राह्मण ! तुम्हें नमस्कार है । मेरा कल्याण हो । तुम नमस्कार योग्य अतिथि होकर भी मेरे घर में तीन रात्रि तक बिना भोजन किये रहे । अतः एक-एक रात्रि के लिए मुझसे तीन वर माँग लो ॥९॥

हे मृत्यो (यमदेव) ! जिस प्रकार भी गौतमवंशीय मेरे पिता मेरे प्रति शाँतसंकल्प, प्रसन्नचित्त, और क्रोधरहित हो जाएँ एवं आपके वापस भेजने पर वे मुझ पर विश्वास करके प्रेमपूर्वक बातचीत करें । तीन वरों में से यह पहला वर माँगता हूँ ॥१०॥

मुझसे प्रेरणा पाकर, तुमको मृत्यु के मुँह से छूटकर आया हुआ देखकर अरुण-पुत्र उद्दालक तुमको पूर्ववत् पहचान लेगा । और दुःख एवं क्रोध से रहित होकर शेष रात्रियों में सुख पूर्वक सोयेगा ॥११॥

हे मृत्युदेव ! स्वर्गलोक में किसी भी प्रकार का भय नही है । वहाँ आपका भी और जरा (वृद्धवस्था) का भय भी नहीं है । स्वर्गलोक में पुरुष भूख प्यास दोनों से पार होकर शोक रहित होकर आनन्द भोगते हैं ॥१२॥

हे मृत्यो ! आप स्वर्ग के साधन रूप अग्नि को जानते हैं । अतः आप मुझ श्रद्धालु के प्रति उसका वर्णन करें । स्वर्ग को प्राप्त हुए पुरुष अमृतत्व को प्राप्त होते हैं । यही मैं द्वितीय वर में माँगता हूँ ॥१३॥

हे नचिकेता ! स्वर्गदायिनी अग्नि को जानने वाला मैं तेरे प्रति उसे कहूँगा । तू भलीभाँति उसे समझ । तू इसे अनन्तलोक को प्राप्त कराने वाला, उसका आधार और बुद्धिरुपी गुहा में स्थित जान ॥१४॥

यमराज ने लोकों की आदिकारणभूत अग्नि, उसके चयन की एवं ईंटों आदि की व्याख्या की । नचिकेता ने भी समझकर पुनः यमराज को वह सुनाया । इस पर मृत्यु (यमराज) संतुष्ट होकर बोले ॥१५॥

महात्मा यम ने प्रसन्न होकर कहा – ‘मैं तुझे एक वर और देता हूँ कि यह अग्नि तेरे नाम से ही प्रसिद्द होगा । और इस अनेक रूपवाली माला को भी ग्रहण करो’ ॥१६॥

इस त्रि-नचिकेता अग्नि का तीन बार चयन करने वाला तीनों से सम्बन्धित होकर, तीन प्रकार के कर्म करता हुआ जन्म-मृत्यु से पार हो जाता है । ब्रह्म से उत्पन्न, स्तुतियोग्य उस देव को जानकर, उसे अनुभव कर, इस अत्यन्त शान्ति को प्राप्त करता है ॥१७॥

जो विद्वान् इस त्रिनचिकेता अग्नि के त्रय को जानकर नचिकेत अग्नि का चयन करता है, वह मृत्यु के पाश को तोड़कर शोक से पार हो जाता है । और स्वर्गलोक में आनंदित होता है ॥१८॥

हे नचिकेत ! यही स्वर्ग साधनरूप अग्नि है जो मैंने तुम्हे द्वितीय वरस्वरूप कही । इस अग्नि को सब तेरे ही नाम से जानेंगे । हे  नचिकेता ! तीसरा वर माँगो ॥१९॥

‘कोई कहते हैं कि रहता है, कोई कहते हैं नहीं रहता’ । मरे हुए मनुष्य के विषय में यह जो सन्देह है, आपसे उपदेश पाया हुआ मैं यह जान सकूँ । यही वरों में तीसरा वर है ॥२०॥

हे नचिकेता ! दवेताओं को भी पूर्वकाल में इस विषय में सन्देह हुआ था । यह सूक्ष्मधर्म आसानी से जाननेयोग्य नहीं है । तू दूसरा वर माँग ले । मुझ पर दबाव न डाल । यह वर मुझे लौटा दे ॥२१॥

हे मृत्यो ! इस विषय में देवों को भी सन्देह हुआ । आप भी इसे सुविज्ञेय नही कहते । आपके जैसा कहने वाला भी कोई नहीं मिल सकता । इसके सामान अन्य कोई भी वर नहीं है ॥२२॥

हे नचिकेत ! सौ वर्ष की आयु वाले पुत्र-पौत्र माँग ले । बहुत से पशु, हाथी, स्वर्ण और अश्व माँग ले । विशाल भूमि माँग ले । स्वयं भी जितने वर्ष चाहे जीवित रह ॥२३॥

इसके सामान यदि कोई और वर मानता हो, या धन और चिरस्थायी जीविका माँग ले । हे नचिकेत ! तुम इस महान भूमि के सम्राट बन जाओ । मैं तुम्हे समस्त कामनाओं को भोगने का पात्र बना देता हूँ ॥२४॥

जो-जो भोग इस मृत्युलोक में दुर्लभ हैं उन सबको तुम स्वच्छंदतापूर्वक माँग लो । यहाँ रथ और बाजों के साथ ये रमणियाँ भी हैं । ऐसी स्त्रियाँ मनुष्य को प्राप्त होने योग्य नहीं हैं । मेरे द्वारा दी गयी इन स्त्रियों से तू अपनी सेवा करा । हे नचिकेत ! तू मुझसे मरण के सम्बन्ध में प्रश्न मत पूछ ॥२५॥

हे यमराज ! ये क्षणभंगुर भोग मरणधर्मा मनुष्य की संपूर्ण इंद्रियों के तेज को क्षीण कर देते हैं । यह समस्त जीवन भी बहुत थोड़ा ही है । ये वाहन, नृत्य-गीत इत्यादि आपके पास ही रहने दें ॥२६॥

मनुष्य को वित्त (धन) से तृप्त नहीं किया जा सकता है । जब आपका दर्शन पा लिया तो धन तो पा ही लेंगे । जब तक आपका शासन है तब तक हम जीवित भी रहेंगे । मेरे द्वारा माँगा हुआ वर तो वही है ॥२७॥

जीर्ण हो जाने वाले मनुष्य की मरणधर्मिता को जानने वाला कौन मनुष्य होगा जो ज़रा रहित अमर महात्माओं का संग पाकर भी वर्ण, रति और आमोद-प्रमोद का चिंतन करता हुआ भी अति दीर्घ जीवन में सुख मानेगा ? ॥२८॥

हे मृत्यो ! जिस महान परलोक सम्बन्धी विषय में यह शंका है । उसके विषय में जो भी निश्चित है वह हमसे कहिये । यही जो गूढ़ता में प्रविष्ट हुआ वर है इससे अन्य नचिकेता और कोई वर नहीं माँगता ॥२९॥
द्वितीय वल्ली

‘श्रेय’ अलग है और ‘प्रेय’ अलग है । भिन्न-भिन्न प्रयोजन वाले ये दोनों ही पुरुष को बाँधते हैं । दोनों में से श्रेय को ग्रहण करने वाला कल्याण को प्राप्त होता है । प्रेय का वरण करने वाला यथार्थ से पतित हो जाता है ॥१॥

श्रेय और प्रेय दोनों ही मनुष्य के समक्ष आते हैं । धीर पुरुष दोनों के स्वरूप पर विचार करके उन्हें पृथक-पृथक समझता है । वह धीर पुरुष प्रेय की अपेक्षा श्रेय का ही वरण करता है । मन्दबुद्धि पुरुष योगक्षेम के निमित्त से प्रेय का वरण करता है ॥२॥

हे नचिकेत ! तूने प्रिय और प्रियरूप भोगों का चिन्तन कर उन्हें त्याग दिया है । उस सम्पत्तिरूप श्रृंखला के बंधन को तू प्राप्त नहीं हुआ जिसमे बहुत से मनुष्य फँस जाते हैं ॥३॥

जो कि अविद्या और विद्या रूप से जानी जाती हैं । ये दोनों परस्पर विपरीत और भिन्न-भिन्न फल देने वाली हैं । तुझ नचिकेत को मैं विद्याभिलाषी मानता हूँ क्योंकि बहुत से लोभ भी तुझे नहीं लुभा सके ॥४॥

अविद्या के भीतर स्थित होकर स्वयं को धीर और पंडित मानने वाले मूढ़ पुरुष नाना योनियों में उसी प्रकार भटकते रहते हैं, जिस तरह अन्धे के नियंत्रण में अन्धे ॥५॥

धन से मोहित हुए और प्रमादी उस अज्ञानी को परलोकसाधन नहीं सूझता । यही लोक है परलोक नहीं है, ऐसा मानने वाला बार-बार मेरे वश को प्राप्त होता है ॥६॥

जो बहुतों को सुनने के लिए भी उपलब्ध नहीं है । बहुत जिसे सुनकर भी नहीं समझते । उसको कहने वाला भी आश्चर्यरूप है । उसको प्राप्त करने वाला अति-कुशल है । और उस कुशल द्वारा उपदेश किया हुआ उसका ज्ञाता भी आश्चर्यमय है ॥७॥

साधारण बुद्धि वाले मनुष्य के द्वारा कहे जाने से या बहुत चिंतन करने से वह सहज ही समझ आ जाये, ऐसा नहीं है । अन्य किसी पुरुष के कहे जाने से वहाँ गति नहीं होती । वह अत्यन्त सूक्ष्म से भी सूक्ष्म है । वह तर्क से परे है ॥८॥

हे प्रिय ! ज्ञान के निमित्त किसी ज्ञानी द्वारा कही गयी यह बुद्धि तर्क से प्राप्त नहीं होती, जिसे तुमने पाया है । तू सचमुच ही सत्य को धारण करने वाला है । हमें तेरे सामान ही प्रश्न करने वाला प्राप्त हो ॥९॥

मैं जानता हूँ कि यह कर्मफलरूप निधि अनित्य है । अध्रुव तत्वों से उस ध्रुव की प्राप्ति नहीं हो सकती । तब मेरे द्वारा नचिकेत अग्नि का चयन हुआ । उन अनित्य द्रव्यों से ही मैं नित्य को प्राप्त हुआ हूँ ॥१०॥

हे नचिकेता !  तुमने भोगों से व्याप्त जगत की प्रतिष्ठा को, यज्ञ के अनन्त फल को, निर्भयता की अवधि को, स्तुत्य और महती प्रतिष्ठा जिसका वेद भी गान करते है, उसे धैर्य पूर्वक त्याग दिया है । तुम बुद्धिमान हो ॥११॥

कठिनता से दीख पड़ने वाले, गूढ़ता में अनुप्रविष्ट, हृदयरूप गुहा में स्थित, गहनता में रहने वाले उस पुरातन देव को धीर पुरुष आध्यात्मयोग की प्राप्ति द्वारा जानकर हर्ष और शोक को त्याग देता है ॥१२॥

जो मनुष्य इसे सुनकर, विचार करके और भलीभाँति ग्रहण कर उस सूक्ष्म और धर्ममय आत्मतत्व का अनुभव कर लेता है, वह उस आनन्दस्वरुप को पाकर आनन्द में ही मग्न हो जाता है । मैं मानता हूँ कि तुझ नचिकेता के लिए उसका द्वार खुला है ॥१३॥

यह जो धर्म से भी अन्य है । अधर्म से भी अन्य है । इस कार्य-कारण से भी परे है । भूत और भविष्य से भी परे है । ऐसा जिसे आप जानते हैं वह मुझसे कहिये ॥१४॥

सम्पूर्ण वेद जिस पद का प्रतिपादन करते हैं । समस्त तप जिसकी प्राप्ति के साधन है । जिसको चाहने वाले बृह्मचर्य का पालन करते हैं । उसे मैं संक्षेप में कहता हूँ । ‘ॐ’ ही वह है ॥१५॥

यह अक्षर ही बृह्म है । यह अक्षर ही पर है । इस अक्षर को जानकर ही, जो जिसको चाहता है, वह उसका हो जाता है ॥१६॥

यही श्रेष्ठ आलम्बन है । यही पर आलम्बन है । इस आलम्बन को जानकर पुरुष बृह्मलोक में महिमान्वित होता है ॥१७॥

यह ज्ञानस्वरुप न तो जन्मता है, न मरता है । न किसी अन्य कारण से हुआ है, न स्वतः ही हुआ है । यह अजन्मा, नित्य, शाश्वत और पुरातन है । शरीर का नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता ॥१८॥

यदि मारने वाला उसे मारा जाने वाला समझता है, और और मारा जाने वाला उसे मारा हुआ समझता है, तो वे दोनों ही उसे नहीं जानते । यह आत्मा न तो मारता है न मारा ही जाता है ॥१९॥

अणु से भी अणु और महान से भी महान यह आत्मा, जीव की हृदय गुफा में स्थित है । कामना रहित और शोकरहित पुरुष इन्द्रियों के प्रसाद से उस आत्म की महिमा को देखता है ॥२०॥

स्थित हुआ भी दूर चला जाता है । सोता हुआ भी सब ओर पहुँच जाता है । उस मद से युक्त और मद से रहित देव को मुझसे अन्य कौन जानने में समर्थ है ॥२१॥

अस्थिर शरीरों में रहकर भी शरीररहित हुआ स्थित है । उस महान सर्वव्यापी आत्मा को जानकर धीरपुरुष शोक नहीं करता ॥२२॥

यह आत्मा न प्रवचन से, न बुद्धि से और न बहुत सुनने से ही प्राप्त हो सकता है । जिसको यह स्वीकार कर लेता है उसके द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है । उसके प्रति वह आत्मा अपने स्वरुप को प्रकट कर देता है ॥२३॥

जो दुश्चरित्र से निवृत्त नहीं हुआ, जिसका चित्त शान्त और समाहित नहीं है तथा जिसका मन अशान्त है, वह प्रज्ञावान होने पर भी इसे प्राप्त नहीं कर सकता ॥२४॥

जिसके ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों ही भोजन हैं । यह मृत्यु भी जिसके लिए उपसेचन (शाक आदि) है । वह जहाँ है, जैसा है, उसे कौन जान सकता है ॥२५॥
तृतीय वल्ली

शुभ कर्मफलरूप उस लोक में ऋत का पान करते हुए, बुद्धिरूपी गुफा में प्रविष्ट, परम स्थान में वे दो छाया और धूप के सामान हैं । ऐसा बृह्मवेत्ता कहते हैं। पञ्चाग्नि संपन्न गृहस्थ और तीन नचिकेत अग्नियों वाले भी यही कहते हैं ॥१॥

जो याजकों के लिए सेतु के सामान है, उस नचिकेत अग्नि को और उस पार जाने की इच्छा वाले लोगों के लिए अभय रूप किनारा है, उस परम बृह्म को जानने में हम समर्थ हों ॥२॥

आत्मा को रथी जानो और शरीर को रथ । बुद्धि को सारथी जानो और इस मन को लगाम ॥३॥

इन्द्रियाँ घोडों के सामान हैं । विषय उन घोड़ों के विचरने के मार्ग हैं । इन्द्रियों और मन के साथ युक्त हुआ वह आत्मा ही भोक्ता है । ऐसा ही मनीषी कहते हैं ॥४॥

जो विवेकहीन सदा ही सयंत मन से अयुक्त रहता है, उसकी इन्द्रियाँ सारथी के दुष्ट घोड़ों की भाँति ही वश में नहीं रहतीं ॥५॥

जो विवेकी सदा संयत मन से युक्त रहता है, उसकी इन्द्रियाँ सारथी के अच्छे घोड़ों की भाँति ही वश में रहती हैं ॥६॥

जो विवेकहीन सदा ही असंयमित तथा अपवित्र मन रहता है, वह उस पद को प्राप्त नहीं कर सकता, अपितु संसार को ही प्राप्त हो जाता है ॥७॥

जो विवेकी सदा संयमित तथा पवित्र मन रहता है, वह उस पद को प्राप्त हो जाता है, जहाँ से फिर नहीं जन्मता ॥८॥

विज्ञान अर्थात बुद्धि जिसकी सारथी है तथा मनरुपी लगाम जिसके वश में है, वह नर सँसार से पार होकर विष्णु के उस परम पद को प्राप्त हो जाता है ॥९॥

इन्द्रियों की अपेक्षा उनके विषय श्रेष्ठ हैं और विषयों से मन श्रेष्ठ है । मन से बुद्धि श्रेष्ठ है और बुद्धि से भी वह महान आत्मा (महत) श्रेष्ठ है ॥१०॥

महत से परे अव्यक्त (मूलप्रकृति) है और अव्यक्त से भी परे और श्रेष्ठ पुरुष है । पुरुष से परे कुछ नहीं । वह पराकाष्ठा है । वही परम गति है ॥११॥

यह आत्मत्त् सभी भूतों में छिपा हुआ भी प्रत्यक्ष नहीं होता । सूक्ष्मदर्शी पुरुष सूक्ष्म और तीक्ष्ण बुद्धि द्वारा उसे देखते हैं ॥१२॥

बुद्धिमान वाक् को मन में विलीन करे । मन को ज्ञानात्मा अर्थात बुद्धि में लय करे । ज्ञानात्मा बुद्धि को महत् में विलीन करे और महत्तत्व को उस शान्त आत्मा में लीन करे ॥१३॥

उठो, जागो ! श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा उस बोध को प्राप्त करो । ज्ञानी उस मार्ग को छुरे की तीक्ष्ण और दुस्तर धार के जैसा ही दुर्गम बताते हैं ॥१४॥

जो शब्दरहित, स्पर्शरहित, रूपरहित, रसरहित और गंधरहित है । अविनाशी, नित्य, अनादि, अनन्त है । महत् से भी परे और ध्रुव है । उसे जानकर पुरुष मृत्यु के मुख से छूट जाता है ॥१५॥

नचिकेता के प्रति मृत्यु द्वारा कहे गए इस सनातन उपाख्यान को कहकर और सुनकर बुद्धिमान पुरुष ब्रह्मलोक में महिमान्वित होते हैं ॥१६॥

जो पवित्रतापूर्वक इस परम गुह्य ज्ञान को ज्ञानियों की सभा में और श्राद्धकाल में सुनाता है, वह अनन्त फल के लिए योग्य होता है । अनन्त फल के लिए योग्य होता है ॥१७॥
द्वितीय अध्याय

प्रथम वल्ली

स्वयम्भू परमात्मा ने इन्द्रियों को बहिर्मुख ही बनाया है । इसलिए मनुष्य बाहर की ओर ही देखता है । अन्तरआत्मा को नहीं देखता । कोई धीर पुरुष ही, अमृतत्व की इच्छा करता हुआ, चक्षु आदि इन्द्रियों का संयम करके उस प्रत्यगआत्मा को देखता है ॥१॥

अल्पज्ञ पुरुष बाह्य भोगों का अनुसरण करते हैं । वे सर्वत्र फैले हुए मृत्यु के पाश में पड़ते हैं । किंतु धीर पुरुष ध्रुव अमृतत्व को जानकर अध्रुव तत्वों के लिए प्रार्थना नहीं करते ॥२॥

जिसके द्वारा रूप, रस, गंध, शब्द, स्पर्श और मैथुन को जाना जाता है और यह भी जाना जाता है कि यहाँ क्या शेष रह जाता है, वही यह है ॥३॥

स्वप्नावस्था और जाग्रत-अवस्था, इन दोनों को जिसके द्वारा देखा जाता है, उस महान विभु आत्मा को जानकर धीर पुरुष शोक नहीं करता ॥४॥

जो, मधुर रस पीने वाले इस जीवात्मा को समीप स्थित और भूत-भविष्य का शाशक जानता है, फिर वह घृणा नहीं करता । यही वह है ॥५॥

जो पहले तप से प्रकट हुआ, जो पहले जल से प्रकट हुआ, जो हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके सभी भूतों के साथ स्थित हुआ देखता है, यही वह है ॥६॥

जो देवतामयी अदिति प्राण के साथ उत्पन्न हुई है । और हृदयरूपी गुहा में प्रविष्ट होकर स्थिर हुयी है । यही वह है ॥७॥

गर्भिणी स्त्रियों के सुपोषित गर्भ की ही भाँति वह जातवेद अग्नि दो अरणियों के बीच स्थित है । जागने वाले और हवि अर्पण करने वाले मनुष्यों के द्वारा प्रतिदिन स्तुति योग्य है । यही वह है ॥८॥

जिससे सूर्य उदय होता है और जिसमे अस्त हो जाता है । जिसमे सब देवता समर्पित हैं । उसका कोई भी उल्लंघन नही करता । यही वह है ॥९॥

जो यहाँ है वही वहाँ है और जो वहाँ है वही यहाँ है । जो उसमे भेद को देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को ही प्राप्त होता है ॥१०॥

मन से ही यह जानने योग्य है । यहाँ भेद अथवा नानात्व कुछ भी नहीं है । जो यहाँ भेद देखता है, वह मृत्यु से मृत्यु को ही प्राप्त होता है ॥११॥

अंगुष्ठ-मात्र पुरुष वह आत्मा मध्य (अन्तःकरण) में स्थित है । उस भूत और भविष्य के शाशक को जाननेवाला पुरुष फिर घृणा नहीं करता । यही वह है ॥१२॥

भूत और भविष्य का स्वामी यह अंगुष्ठ-मात्र पुरुष धूमरहित ज्योति के समान है । यह जैसा आज है वैसा ही कल भी है । यही वह है ॥१३॥

जिस प्रकार ऊँचे शिखर पर बरसा हुआ जल पर्वत के चारो ओर दौड़ता है । उसी प्रकार धर्मों (स्वभाव) को पृथक देखने वाला उन्हीं के अनुसार दौड़ता है ॥१४॥

जिस प्रकार शुद्ध जल में डालने पर शुद्ध जल वैसा ही हो जाता है । हे गौतम (नचिकेता) ! उसी प्रकार जानने वाले मुनि का आत्मा भी हो जाता है ॥१५॥
द्वितीय वल्ली

उस सीधे सरल चित्तरूप वाले अजन्मा आत्मा का पुर ग्यारह द्वारों वाला है । उसके अनुष्ठान से मनुष्य शोक को प्राप्त नहीं होता अपितु बन्धनों से छूटकर मुक्त हो जाता है । यही वह है ॥१॥

स्वयंप्रकाश, शुद्धता में रहने वाला, सबका निवासक, अन्तरिक्ष में स्थित, दाता, वेदी पर स्थित, भ्रमण करने वाला, घर में रहने वाला, मनुष्यों में रहने वाला, श्रेष्ठों में रहने वाला, सत्य में रहने वाला, आकाश में रहने वाला, जल, पृथ्वी, यज्ञ और पर्वत से उत्पन्न होने वाला, वह महान सत्य है ॥२॥

जो प्राण को ऊपर उठाता है और अपान को नीचे धकेलता है । मध्य (हृदय) में आसीन उस वामन की सभी देवता उपासना करते हैं ॥३॥

एक शरीर से दुसरे शरीर में जाने वाले इस शरीरस्थ देहि के देह से निकल जाने पर यहाँ भला क्या शेष रह जाता है । यही वह है ॥४॥

कोई भी मरणधर्मा जीव न तो प्राण से, न ही अपान से जीवित रहता है । परंतु इन दोनों के इतर जिस पर ये दोनों ही आश्रित हैं उससे ही जीवित रहता है ॥५॥

हे गौतम ! गुह्य और सनातन बृह्म तथा मरण को प्राप्त हुआ यह आत्मा जिस प्रकार रहता है, यह मैं तुझे फिर बतलाता हूँ ॥६॥

अपने कर्म और श्रुतज्ञान के अनुसार कितने ही अन्य जीवात्मा तो शरीर धारण करने के लिए किसी योनि को प्राप्त होते हैं और कितने ही अन्य स्थावर भाव का अनुसरण करते हैं ॥७॥

यह जो सो जाने पर भी जागने वाला, काम और कामनाओं द्वारा पुरषों का निर्माण करता जाता है, वही शुक्र भी है, वही ब्रह्म है, वही अमृत भी कहा जाता है । उसीमें समस्त लोक आश्रित हैं, उसका अतिक्रमण कोई भी नहीं कर सकता । यही वह है ॥८॥

जिस प्रकार यह एक ही अग्नि समस्त भुवनों में प्रविष्ट होकर समस्त रूपों के अनुरूप हो रहा है । उसी प्रकार यह समस्त भूतों का एक ही अन्तरआत्मा और बाहर भी उनके समस्त रूपों के अनुरूप हो रहा है ॥९॥

जिस प्रकार यह एक ही वायु समस्त भुवनों में प्रविष्ट होकर समस्त रूपों के अनुरूप हो रहा है । उसी प्रकार यह समस्त भूतों का एक ही अन्तरआत्मा और बाहर भी उनके समस्त रूपों के अनुरूप हो रहा है ॥१०॥

जिस प्रकार सम्पूर्ण लोक का चक्षु होकर भी सूर्य चक्षु सम्बन्धी बाह्य दोषों से लिप्त नहीं होता । उसी प्रकार यह समस्त भूतों का एक ही अन्तरआत्मा और बाहर भी लोक के दुःखों से लिप्त नही होता ॥११॥

सबको वश में रखे वाला, यह समस्त भूतों का एक ही अन्तरआत्मा, एक रूप को ही कई रूपों में प्रकट करता है । जो धीर पुरुष उसे स्वयं में स्थित हुआ ही देखते है, उनका सुख शाश्वत है, औरों का नहीं ॥१२॥

नित्यों में भी नित्य, चेतनों में भी चेतन, अनेकों में एक, यही समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला है । जो धीर पुरुष उसे स्वयं में स्थित हुआ ही देखते है, उनकी शान्ति शाश्वत है, औरों की नहीं ॥१३॥

यह ही है वह जिसे अनिर्वचनीय परम सुख माना जाता है । उसे मैं कैसे जान सकूँगा । क्या वह प्रकाशित होता है अथवा नहीं ? ॥१४॥

वहाँ न सूर्य प्रकाशित होता है । न चंद्र और तारे प्रकाशित होते हैं । न यह विद्युत ही प्रकाशित होती है, फिर इस अग्नि की तो बात ही क्या । उसके प्रकाशित होने से ही ये सभी प्रकाशित होते हैं । उसी के प्रकाश से यह सम्पूर्ण जगत प्रकाशित होता है ॥१५॥
तृतीय वल्ली

ऊपर की ओर जड़ों वाला और नीचे की और शाखाओं वाला यह सनातन अश्वत्थ वृक्ष है । वही शुक्र भी है, वही ब्रह्म है, वही अमृत भी कहा जाता है । उसीमें समस्त लोक आश्रित हैं, उसका अतिक्रमण कोई भी नहीं कर सकता । यही वह है ॥१॥

यह सम्पूर्ण प्राणरूप जगत उसी से निकला और उसी में ही चेष्टा कर रहा है । उस महाभयरूप, उठे हुए वज्र के समान को जानने वाले अमर हो जाते हैं ॥२॥

उसी के भय से अग्नि तपता है । उसी के भय से सूर्य तपता है । इंद्र, वायु और पाँचवाँ यह मृत्यु, सब उसी के भय से दौड़ते हैं ॥३॥

यदि शरीर का पतन होने से पूर्व ही यहाँ उसको न जान सका तब हीर अनेक कल्पों तक अनेक लोकों शरीर धारण करता है ॥४॥

जैसा दर्पण में, वैसा अन्तःकरण में दिखाई पड़ता है । जैसा स्वप्न में, वैसा पितृलोक में दिखाई पड़ता है । जैसा जल में, वैसा गंधर्वलोक में दिखाई पड़ता है । ब्रह्मलोक में छाया और धूप की भाँति अनुभव होता है ॥५॥

पृथक-पृथक रूपों में उत्पन्न इन्द्रियों के पृथक-पृथक भावों को तथा उनके उदय और अस्त को जानकर धीर पुरुष शोक नहीं करता ॥६॥

इन्द्रियों से परे मन है । मन से बुद्धि उत्तम है । बुद्धि से भी बढ़कर महत्तत्व है । महत्तत्व से अव्यक्त उत्तम है ॥७॥

अव्यक्त से भी परे पुरुष सर्वव्यापक एवं अलिंग है, उसे जानने वाला जीवआत्मा मुक्त हो जाता है और अमृतत्व को प्राप्त होता है ॥८॥

इसका रूप द्रष्टि में नहीं ठहरता । चक्षुओं से इसे कोई नही देख सकता । मन, हृदय और बुद्धि के द्वारा अनुभव में आता है । जो इसे जानते है वे अमर हो जाते हैं ॥९॥

जब पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ मन के सहित स्थिर होकर बैठ जाती हैं और बुद्धि भी  कोई चेष्टा नही करती, वह स्थिति ही परम गति है ॥१०॥

उस इन्द्रियों की स्थिर धारणा को ही योग कहा जाता है । उस समय पुरुष प्रमादरहित होता है क्योंकि योग ही उदय और अस्त होने वाला है ॥११॥

न तो वाणी से, न मन से, न नेत्रों से ही प्राप्त किया जा सकता है । वह ‘है’ – इस प्रकार कहने वाले के अन्यत्र किसे उपलब्ध हो सकता है ॥१२॥

वह ‘है’ – इस प्रकार ही उपलब्ध करने योग्य है, और तत्वभाव से भी । दोनों में से जिसे ‘है’ – इस प्रकार की उपलब्द्धि हो गयी है, तात्विक स्वरुप उसके अभिमुख हो जाता है ॥१३॥

जब इस हृदय के आश्रय में रहने वाली सभी कामनाएँ समूल नष्ट हो जाती हैं, तब मरणधर्मा अमर हो जाता है । यहीं पर ब्रह्मभाव को प्राप्त हो जाता है ॥१४॥

जब इस हृदय की समस्त ग्रंथियाँ टूटकर खुल जाती हैं, तब वह मरणधर्मा अमर हो जाता है । बस इतना ही वेदान्त का अनुशासन (उपदेश) है ॥१५॥

हृदय की एक सौ एक नाड़ियाँ हैं । उनमे से एक मूर्धा की और निकली हुई है । उसके द्वारा ऊपर की ओर जाने वाला अमृतत्व को प्राप्त होता है । शेष अन्य उत्क्रमण के समय विभिन्न गतियों की हेतु होती हैं ॥१६॥

अन्तरआत्मा वह अँगुष्ठमात्र पुरुष सदैव जीवों के हृदय में स्थित है । उसे मूँज से सींक की भाँति अपने शरीर से धैर्यपूर्वक पृथक करके देखे । उसी को शुक्ररूप और अमृतरूप समझे । उसी को शुक्ररूप और अमृतरूप समझे ॥१७॥

मृत्यु की कही इस विद्या और सम्पूर्ण योगविधि को सुनकर ब्रह्मभाव को प्राप्त हुआ । रज और मृत्यु से मुक्त हुआ । जो अन्य भी कोई आध्यात्म को इस प्रकार जानेगा, वैसा ही होगा ॥१८॥

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