छान्दोग्य उपनिषद

प्रथम अध्याय प्रथम खण्ड ‘ॐ’ यह अक्षर ही उद्गीथ है, इसकी ही उपासना करनी चाहिए । ‘ॐ’ ऐसा ही उदगान करता है । उस की ही व्याख्या की जाती है ।1। इन भूतों का रस पृथ्वी है । पृथ्वी का रस जल है । जल का रस ओषधियाँ हैं, ओषधियों का रस पुरुष है, पुरुष… Continue reading छान्दोग्य उपनिषद

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समयसार

ध्रुव, अचल और अनुपम गति को प्राप्त हुए सर्व सिद्धों का वंदन करके अहो ! श्रुतकेवलियों के द्वारा कथित यह समयसार नामक प्राभृत कहूँगा ।1। जो जीव दर्शन, ज्ञान, चारित्र में स्थित हो रहा है उसे निश्चय से स्वसमय जानो और जो पुदगलकर्म के प्रदेशों में स्थित है उसे परसमय जानो ।2। एकत्वनिश्चय को प्राप्त… Continue reading समयसार

तत्त्वार्थसूत्र

प्रथम अध्याय सम्यक्-दर्शन, सम्यक्-ज्ञान और सम्यक्-चारित्र- ये मोक्ष का मार्ग है ।1। तत्त्व के स्वरूप सहित अर्थ की श्रद्धा करना सम्यग्दर्शन है ।2। वह स्वभाव से अथवा दूसरे के उपदेशादि से उत्पन्न होता है ।3। जीव, अजीव, आस्रव, बन्ध, संवर, निर्जरा और मोक्ष- ये सात तत्त्व हैं ।4। नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव से उनका… Continue reading तत्त्वार्थसूत्र

माण्डूक्यकारिका

आगम प्रकरण विभु विश्व बहिष्प्रज्ञ है, तैजस अन्तःप्रज्ञ है तथा प्राज्ञ घनप्रज्ञ है । इस प्रकार एक ही आत्मा तीन प्रकार से कहा जाता है ।1। दक्षिणनेत्ररूप द्वार में विश्व रहता है, तैजस मन के भीतर रहता है, प्राज्ञ हृदयाकाश में उपलब्ध होता है । इस प्रकार वह शरीर में तीन प्रकार से स्थित है… Continue reading माण्डूक्यकारिका

योगसूत्र

समाधि पाद अब योग विषयक अनुशासन ।1। चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है ।2। उस समय द्रष्टा की अपने स्वरूप में स्थिति होती है ।3। अन्य समय में स्वरूप वृत्ति के ही सदृश होता है ।4। क्लिष्ट और अक्लिष्ट रूप से वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं ।5। प्रमाण, विपर्यय, विकल्प, निद्रा, स्मृति… Continue reading योगसूत्र

भगवद् गीता

प्रथम अध्याय धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?॥1॥ संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखा और द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा॥2॥ हे आचार्य! आपके बुद्धिमान्‌ शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों… Continue reading भगवद् गीता

अष्टावक्र गीता

पहला प्रकरण जनक ने कहा - ज्ञान कैसे प्राप्त होता है ? मुक्ति कैसे होती है ? और वैराग्य कैसे प्राप्त होता है ? प्रभु ! यह मुझसे कहिये ।1। अष्टावक्र ने कहा - मुक्ति चाहता है तो विषयों को विष के समान छोड़ दे और क्षमा, दया, सरलता, सन्तोष और सत्य को अमृत के… Continue reading अष्टावक्र गीता