शुकरहस्य उपनिषद्

अब रहस्योपनिषद् का वर्णन किया जाता है॥१॥ एक बार देवर्षियों ने देव ब्रह्माजी की पूजा की और हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए उनसे निवेदन किया - भगवन् ! आप हमारे लिए रहस्योपनिषद् का उपदेश करें॥२॥ इस पर ब्रह्मा जी ने कहा-प्राचीनकाल में महातेजस्वी, तपोनिष्ठ, सम्पूर्ण वेदों के विग्रह स्वरूप श्री वेदव्यास जी ने पार्वती सहित… Continue reading शुकरहस्य उपनिषद्

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निरालम्ब उपनिषद्

उस कल्याणकारी (शिव) गुरु, सत्-चित् और आनन्द की मूर्ति को नमस्कार है। उस निष्प्रपञ्च, शान्त, आलम्ब (आश्रय) रहित, तेज:स्वरूप परमात्मा को नमन है। जो निरालम्ब (परमात्म तत्त्व) का आश्रय ग्रहण करके (सांसारिक) आलम्बन का परित्याग कर देता है, वह योगी और संन्यासी है, वही कैवल्य (मोक्ष) पद प्राप्त करता है॥१॥ इस संसार के अज्ञानी जीवों… Continue reading निरालम्ब उपनिषद्

गायत्री उपनिषद्

प्रथमा कण्डिका ग्यारह अक्षों (ज्ञान अथवा ज्ञानेन्द्रियों) वाले विद्वान् मौद्गल्य (मुद्गल वंशीय) के पास ग्लाव मैत्रेय (मित्रयु के शिष्य अथवा गोत्र वाले) आये। वे मौद्गल्य के आश्रम में निवासरत ब्रह्मचारियों को देखकर उनसे (उपहास करते हुए) कहने लगे- यह मौद्गल्य अपने ब्रह्मचारियों को क्या पढ़ाता है ?॥१॥ मौद्गल्य के ब्रह्मचारी ने यह बात सुनकर अपने… Continue reading गायत्री उपनिषद्

मान्त्रिक उपनिषद्

आठ चरणों वाले, पवित्र स्वरूप, हंस (परमात्मा) रूप, त्रिसूत्र (व्यष्टि, समष्टि, तदुभय) रूप, अतिसूक्ष्म, अव्यय और देदीप्यमान उस परमात्म चेतना को हम (भक्ति, ज्ञान, कर्म) तीन मार्गों से सर्वत्र अनुभव करते हैं; परन्तु देख नहीं पाते ॥ १ ॥ यद्यपि वह परमात्म चेतना निर्गुण है, तो भी वह गुण रूपी गुहा में समाया हुआ है।… Continue reading मान्त्रिक उपनिषद्

मुद्गल उपनिषद्

प्रथम खण्ड ‘पुरुष सूक्त' में प्रयुक्त 'सहस्र' शब्द अनन्त का बोध कराता है। इसी प्रकार यह ‘दशाङ्गुलम्' पद भी अनन्त योजनों (दूरी) की सूचना प्रदान करता है ॥ १ ॥ ‘पुरुष सूक्त' के इस प्रथम मन्त्र 'सहस्रशीर्षा०' में भगवान् विष्णु की सर्वव्यापी विभुता का विशद वर्णन किया गया है। पुरुष सूक्त का द्वितीय मन्त्र (पुरुषऽएवेदं०)… Continue reading मुद्गल उपनिषद्

प्रणव उपनिषद्

अब ब्रह्म स्वरूप भगवान् विष्णु के अद्भुत कर्मों से युक्त, (संचित कर्मों को भस्मसात् करने में समर्थ) अग्नि को धारण करने वाली ब्रह्मविद्या का रहस्य वर्णित किया जा रहा है ॥ १ ॥ ब्रह्मवेत्ताओं ने ॐकार को ही एक अद्वितीय, अविनाशी ब्रह्म कहा है, उसके शरीर, स्थान और कालत्रय (भूत, भविष्यत् और वर्तमान) का विवेचन… Continue reading प्रणव उपनिषद्

नादबिन्दू उपनिषद्

ॐ कार रूप हंस का 'अकार' दक्षिण पक्ष (दाहिना पंख) तथा 'उकार' उत्तर पक्ष (बायाँ पंख) कहा गया है। उसकी पूँछ ही 'मकार' है और अर्धमात्रा ही उसका शीर्ष भाग है॥ १ ॥ उस (ॐ कार रूप हंस) के दोनों पैर रजोगुण एवं तमोगुण हैं और (उसका) शरीर सतोगुण कहा गया है। धर्म (उसका) दक्षिण… Continue reading नादबिन्दू उपनिषद्