सामवेद : भाग २

॥उत्तरार्चिकः॥ ॥अथ प्रथमोऽध्यायः॥ ॥प्रथमः खण्डः॥ हे याजको ! देव शक्तियों के निमित्त, यज्ञार्थ प्रयुक्त होने वाले, शुद्ध हुए इस सोम की स्तुति करो॥१॥ यह दिव्य रस देवों ने देव पुरुषों के लिए प्रकट किया है । इसे अथर्वा अषियों (विज्ञान-वेताओं) ने तुम्हारे (याको) लिए मधुर गो- दुग्ध के साथ मिलाया है॥२॥ हे कल्याणकारी सोम !… Continue reading सामवेद : भाग २

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सामवेद : भाग १

॥पूर्वार्चिक:॥ ॥आग्नेयं पर्व॥ ॥प्रथमः खण्डः॥ हे प्रकाशक एवं सर्वव्यापक अग्निदेव ! हवि को गति देने (वीति) के लिए आप पधारें । आपकी सब स्तुति करते हैं। यज्ञ में हम आपका आवाहन करते हैं; क्योंकि आप सब पदार्थों को प्रदान करने वाले हैं॥१॥ हे अग्ने ! आप सस्त देव शक्तियों को एकत्रित करते हैं, जिनकी उपस्थिति… Continue reading सामवेद : भाग १

यजुर्वेद : भाग-२

॥अथ एकविंशोऽध्यायः॥ हे वरुणदेव ! आप हमारी स्तुति को सुनकर प्रसन्न हों, हमको सब प्रकार के सुख प्रदान करें । हम अपनी रक्षा के निमित्त आपका आवाहन करते हैं॥१॥ हे वरुणदेव ! वेद मंत्रों से आपकी स्तुति करते हुए तथा आहुतियाँ समर्पित करते हुए यजमान पर आप प्रसन्न हों । हे बहुतों से प्रशंसित एवं… Continue reading यजुर्वेद : भाग-२

यजुर्वेद : भाग-१

॥अथ प्रथमोऽध्यायः॥ हे यज्ञ साधनो ! अन्न की प्राप्ति के लिए सवितादेव आपको आगे बढ़ाएँ । सृजनकर्ता परमात्मा आपको तेजस्वी बनने के लिए प्रेरित करें । आप सभी प्राण स्वरूप हों । सृजनकर्ता परमेश्वर श्रेष्ठ कर्म करने के लिए आपको आगे बढ़ाएँ। आपकी शक्तियाँ विनाशक न हों, अपितु उन्नतिशील हों । इन्द्र (देव-प्रवृत्तियों) के लिए… Continue reading यजुर्वेद : भाग-१

ऋग्वेद : दशम मण्डल

[सूक्त - १] प्रभात वेला में सर्वप्रथम अग्निदेव ऊर्ध्वमुखी (प्रज्वलित) होकर (यज्ञ में ) स्थित होते हैं। वे अन्धकार को दूर करके, तेजोमय होकर आगे आते हैं तथा अपने श्रेष्ठ तेज से सभी स्थानों को प्रकाशित करते हैं॥१॥ ये अग्निदेव द्यावा -पृथिवी के गर्भ में (गुप्त रूप से) रहते हैं । ओषधियों (अथवा काष्ठादि) से… Continue reading ऋग्वेद : दशम मण्डल

ऋग्वेद : नवम मण्डल

[सूक्त-१] हे सोमदेव ! आप इन्द्रदेव के लिए पान करने हेतु निकाले गये हैं, अत: अत्यन्त स्वादिष्ट, हर्ष प्रदायक धार के रूप में प्रवाहित हों॥१॥ दुष्टों का नाश करने वाले, मानवों के लिए हितकारी, सोमदेव शुद्ध होकर सुवर्ण पात्र (द्रोण कलश) में भरकर यज्ञ स्थल पर प्रतिष्ठित हो गये हैं॥२॥ हे सोमदेव ! आप महान्… Continue reading ऋग्वेद : नवम मण्डल

ऋग्वेद : अष्टम मण्डल

[सूक्त-१] हे मित्रों ! इन्द्रदेव को छोड़कर अन्य किसी देव की स्तुति उपादेय नहीं है। उसमें शक्ति नष्ट न करें। सोम शोधित करके, एकत्र होकर, संयुक्तरूप से बलशाली इन्द्रदेव की ही बार-बार प्रार्थना करें॥१॥ (हे स्तोतागण ! आप) सशक्त वृषभ (साँड़) के सदृश संघर्षशील जरारहित, शत्रुओं का विरोध और उनका संहार करने वाले, महान् दैविक… Continue reading ऋग्वेद : अष्टम मण्डल