ब्रह्मसूत्र (वेदान्तसूत्र)

॥अथ प्रथमाध्याये प्रथमः पादः॥ अथातो ब्रह्म जिज्ञासा॥१॥ सूत्रार्थ- अथ = अब (शास्त्रों के अध्ययन तथा पुण्यकर्मों के अनुष्ठान आदि से जिज्ञासु का अन्तःकरण शुद्ध हो जाने पर),अतः = यहाँ से, ब्रह्मजिज्ञासा = ब्रह्म को जानने की इच्छा का विवेचन किया जाता है। जन्माद्यस्ययतः॥२॥ सूत्रार्थ- जन्मादि = जन्म आदि अर्थात् (उत्पत्ति, स्थिति और प्रलय), अस्य =… Continue reading ब्रह्मसूत्र (वेदान्तसूत्र)

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प्रवचनसार

॥ज्ञानतत्त्व-प्रज्ञापन-अधिकार॥ जो सुरेन्द्रों, असुरेन्द्रों और नरेन्द्रों से वन्दित हैं तथा जिन्होंने घाति कर्म-मल को धो डाला है ऐसे तीर्थ-रूप और धर्म के कर्ता श्री वर्धमानस्वामी को नमस्कार करता हूँ॥१॥ और विशुद्ध सत्तावाले शेष तीर्थंकरों को सर्व सिद्ध-भगवन्तों के साथ ही, और ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार तथा वीर्याचार युक्त श्रमणों को नमस्कार करता हूँ॥२॥ उन उन… Continue reading प्रवचनसार

न्याय सूत्र

॥अथ प्रथमाध्याये प्रथमाह्निकम्॥ प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वा भासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः॥१॥ सूत्रार्थ-प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्क निर्णयवादजल्पवितण्डाहे त्वा भासच्छलजातिनिग्रहस्थानानाम् = प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति एवं निग्रह स्थान नामक सोलह पदार्थों के; तत्त्वज्ञानात् = यथार्थज्ञान से, निःश्रेयसाधिगमः = सर्वविध कल्याण अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है। दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तराऽपाये तदनन्तरापायादपवर्गः॥२॥ सूत्रार्थ- दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानाम् = दुःख, जन्म, प्रवृत्ति,… Continue reading न्याय सूत्र

वैशेषिक सूत्र

॥अथ प्रथमाध्यायेप्रथमाह्निकम्॥ अथातो धर्मं व्याख्यास्यामः॥१॥ सूत्रार्थ- अथ = अब, अतः = यहाँ से, धर्मम् = धर्म की , व्याख्यास्यामः = व्याख्या आरम्भ करते हैं। यतोभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः ॥२॥ सूत्रार्थ- यतः = जिससे, अभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः = लौकिक कल्याण तथा मोक्ष की प्राप्ति (होती है), स = उसे, धर्मः = धर्म (कहते) हैं। तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम् ॥ ३॥ सूत्रार्थ-… Continue reading वैशेषिक सूत्र

योगसूत्र

॥अथ समाधिपादः॥ अथ योगानुशासनम्॥१॥ सूत्रार्थ- अथ = अब, योगानुशासनम् = योग विषयक शास्त्र अथवा ग्रन्थ (योग-अनुशासन सम्बन्धी ग्रन्थ) का आरम्भ करते हैं। योगश्चित्त वृत्तिनिरोधः॥२॥: सूत्रार्थ- चित्तवृत्तिनिरोधः = चित्तवृत्तियों का सर्वथा रुक जाना अथवा नियन्त्रित हो जाना, योगः = योग है। तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥३॥ सूत्रार्थ- द्रष्टुः = देखने वाले (द्रष्टा) का, तदा = उस समय, स्वरूपे… Continue reading योगसूत्र

साँख्यसूत्र

॥अथ प्रथमोऽध्यायः॥ अथ त्रिविधदुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः॥१॥ सूत्रार्थ- अथ = प्रारम्भ सूचक मंगल शब्द, त्रिविध = तीन प्रकार के, दु:खात्यन्तनिवृत्तिः = दु:खों का पूर्णरूपेण अभाव, अत्यन्तपुरुषार्थः = मोक्ष (अन्तिम पुरुषार्थ) है॥ ॥१॥ न दृष्टात्तत्सिद्धिर्निवृत्तेऽप्यनुवृत्तिदर्शनात्॥२॥ सूत्रार्थ- दृष्टात् = दृश्य पदार्थों से, तत्सिद्धिः = उनकी सिद्धि, न = नहीं, निवृत्तेऽपिएक दु:ख के निवृत्त हो जाने पर भी, अनुवृत्ति = दु:ख… Continue reading साँख्यसूत्र

घेरण्ड संहिता

प्रथमोपदेश एक समय, योगाभ्यास करने की इच्छा वाले साधक चण्डकापालि नामक अधिकारी शिष्य ने श्रीघेरण्ड मुनि की कुटी पर जाकर नम्रता पूर्वक भक्ति से उन्हें प्रणाम करके योग-विषयों को पूछा ॥1॥ हे योगेश! तत्वज्ञान का कारण घटस्थयोग है, इस समय उसे ही मैं जानना चाहता हूँ। हे प्रभो, हे योगेश्वर, उसे कृपापूर्वक आप मुझसे कहें… Continue reading घेरण्ड संहिता