हंस गीता

युधिष्ठिरने पूछा- पितामह ! संसारमें बहुत से विद्वान् सत्य, इन्द्रिय-संयम, क्षमा और प्रज्ञा (उत्तम बुद्धि)-की प्रशंसा करते हैं। इस विषयमें आपका कैसा मत है?॥१॥ भीष्मजीने कहा- युधिष्ठिर! इस विषयमें साध्यगणोंका हंसके साथ जो संवाद हुआ था, वही प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुना रहा हूँ॥२॥ एक समय नित्य अजन्मा प्रजापति सुवर्णमय हंसका रूप धारण करके तीनों… Continue reading हंस गीता

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पाण्डव गीता

पाण्डवों ने कहा - प्रह्लाद, नारद, पराशर, पुण्डरीक, व्यास, अम्बरीष, शुकदेव, शौनक, भीष्म, दाल्भ्य, रुक्माङ्गद, अर्जुन (सहस्रार्जुन), वसिष्ठ और विभीषण आदि - इन पुण्य प्रदान करनेवाले परम भक्तोंको हम नमस्कार करते हैं॥१॥ लोमहर्षण ने कहा - युधिष्ठिरके (नाम, गुण, लीला और धामका) कीर्तन करनेसे धर्मको वृद्धि होती है, (इसी प्रकार) भीमसेनके कीर्तनसे सारे पाप नष्ट… Continue reading पाण्डव गीता

राम गीता

श्रीमहादेवजी बोले-हे पार्वति! तदनन्तर, रघुश्रेष्ठ भगवान् राम, संसारके मङ्गलके लिये धारण किये अपने दिव्यमङ्गल देहसे रामायणरूप अति उत्तम कीर्तिकी स्थापना कर पूर्वकालमें राजर्षि श्रेष्ठोंने जैसा आचरण किया है वैसा ही स्वयं भी करने लगे॥१॥ उदारबुद्धि लक्ष्मणजीके पूछनेपर वे प्राचीन उत्तम कथाएँ सुनाया करते थे। इसी प्रसङ्गमें श्रीरघुनाथजीने, राजा नृगको प्रमादवश ब्राह्मणके शापसे तिर्यग्योनि प्राप्त होनेका… Continue reading राम गीता

अवधूत गीता

पहला अध्याय महान् भय से रक्षा करने वाली अद्वैत की वासना मनुष्यों में, विप्रों में ईश्वर के अनुग्रह (कृपा) से ही उत्पन्न होती है॥२॥यह दृश्यमान सम्पूर्ण जगत जिस आत्मा द्वारा आत्मा से आत्मा में ही पूर्ण हो रहा है उस निराकार (ब्रह्म) का मैं किस प्रकार वन्दन करूँ क्योंकि वह (जीव से) अभिन्न है, कल्याण… Continue reading अवधूत गीता

भिक्षुक उपनिषद्

मोक्षार्थी भिक्षुओं की चार श्रेणियाँ होती हैं-कुटीचक, बहूदक, हंस और परमहंस॥१॥ कुटीचक-भिक्षु गौतम, भरद्वाज, याज्ञवल्क्य और वसिष्ठ आदि के समान अष्टग्रास भोजन लेकर योगमार्ग में (योग के माध्यम से) मोक्ष के लिए प्रयत्न करते हैं॥२॥ बहूदक-भिक्षु त्रिदण्ड, कमण्डलु, शिखा, यज्ञोपवीत और काषाय वस्त्र धारण करते हैं तथा मधु-मांस को छोड़कर ब्रह्मर्षि (किसी सदाचारी नैष्ठिक) के… Continue reading भिक्षुक उपनिषद्

अमृतबिन्दु (ब्रह्मबिन्दु) उपनिषद्

मन के दो प्रकार कहे गये हैं, शुद्ध मन और अशुद्ध मन । जिसमें इच्छाओं, कामनाओं के संकल्प उत्पन्न होते हैं,वह अशुद्ध मन है और जिसमें इन समस्त इच्छाओं का सर्वथा अभाव हो गया है,वही शुद्ध मन है॥१॥ मन ही सभी मनुष्यों के बन्धन एवं मोक्ष का प्रमुख कारण है। विषयों में आसक्त मन बन्धन… Continue reading अमृतबिन्दु (ब्रह्मबिन्दु) उपनिषद्

अथर्वशिरस् उपनिषद्

एक समय देवताओं ने स्वर्गलोक में जाकर रुद्र से पूछा- आप कौन हैं? रुद्र ने उत्तर दिया- मैं एक हूँ, भूतकाल हूँ, वर्तमान काल हूँ और भविष्यत्काल भी मैं ही हूँ। मेरे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। जो अन्तर के भी अन्तर में विद्यमान है, जो समस्त दिशाओं में सन्निविष्ट है, वह मैं ही… Continue reading अथर्वशिरस् उपनिषद्